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Sunday, May 8, 2016

मदर्स डे और मित्र प्रशांत श्रोत्रीय की कलम


मैं सुबह से देख ही रहा था - तमाम आये हुए संदेशों को ,वाट्सअप और फेसबुक पर -
तमाम दूसरे लोगों और समूहों को फॉरवर्ड कर हम समारोहपूर्वक मदर्स डे मना रहे
थे। ये हमारे फॉरवर्ड होने की निशानी भी कही जा सकती है। पर ऐसा करने में कोई
बुराई भी नहीं है। -- यहाँ  मेरा सवाल दूसरा है।  माँ के प्रति श्रद्धा व्यक्त
करने के लिए हमें ' दिवस विशेष ' की आवश्यकता कब से पड़ने लग गयी ? -- और अगर
पड़ने लग गयी है तो मान लीजिए , हमने माँ की ममता और प्यार को कमतर आंकना शुरू
कर दिया है। ये लगभग - लगभग उस प्रेम और वात्सल्य का अपमान है ,  जिसका
स्तुतिगान हमने अलसुबह से शुरू किया है और मध्यरात्रि तक जारी रखेंगे। मुझे एक
माँ और याद आ रही है , क्यों कि उनके बच्चे विश्व विद्यालयों में भूख हड़ताल पर
हैं। वो हमारे बच्चे नहीं हैं , इसलिए हम उस तकलीफ को उस  तरह से नहीं समझ
पाएंगे। सिर्फ उनकी माँ समझेगी। --- पहले नहीं थी , पर अब तो सरकार में
बाकायदा ' स्मृति ' है। तो कम से कम बे मन से सही , बच्चों से बात तो की जानी
चाहिए  थी - आज के दिन तो ।  पर नहीं।  ये राजनीति का गर्वीला स्वभाव है।  --
ये अजीब बात है कि लगातार बढ़ती शक्ति , सुनने की शक्ति को कमज़ोर कर देती है।
अगर ऐसा नहीं है , तो महज गाड़ी ओवरटेक कर लेने  पर किसी माँ को अपने बेटे की
लाश पर बिलखना नहीं पड़ता। मगर वो गाड़ी जिसे ओवरटेक किया गया - विधायक की थी।
भले ही बिहार में हो - विधायक के बेटे के पास राजनीतिक दम्भ था , गर्व था।
ये गर्वीली राजनीति हमें कहाँ ले कर  जा रही है , कि हमने भूखे बच्चों की
बातें सुनना भी बंद कर  दिया है।.... ये अजीब सी बात है कि माँ रोटी की बातें
तुरंत सुन लेती है।  जब चूल्हे अकाल और सूखे में भरभराकर निष्प्राण होने लगते
हैं, मां रोटी ढूंढती है।  मां और रोटी गहरे से जुड़े हैं। एक अकेली मेरी ही
मां तो नहीं जो चिंतित हो! प्रकृति की सारी माएं रोटी जुटाने के लिए प्रतिबद्ध
हैं।  अली सरदार जाफरी याद आ रहे हैं -- "चांद से दूध नहीं बहता है -  तारे
चावल हैं न गेंहू न ज्वार - वरना मैं तेरे लिए चाँद सितारे लाती - मेरे नन्हे,
मिरे मासूम - आ,कि मां अपने कलेजे से लगा ले तुझको - अपनी आगोश-ए-मुहब्बत में
सुला ले तुझको।  ----- प्रशांत श्रोत्रिय


my post about mother's day 6 years ago.

http://chetna-ujala.blogspot.in/2010/05/maan-ke-charno-me.html


Saturday, April 16, 2016

दो नावों पर चढऩे की कोशिश में फिसल ना जाना


 बीते दो दिन में बड़ा नाटक चला। राम नाम की नाव में सवार पार्टी इन दिनों अम्बेडकर के चरणों में ‘फूल’ चढ़ा रही थी। दूसरी ओर कभी पार्टी से बाहर करके बाद में बाबा साहब के अनुयायी रामजी को हाथ जोड़ते नजर आए। फिर कौन कह रहा है कि भारत असहिष्णु है। बाबा साहब तो राम, दुर्गा जैसी मूर्तिपूजक परम्पराओं वाले हिन्दू धर्म को छोडक़र बौद्ध हो गए और इसे सार्थक भी बताया। बाबा साहब पहले सिर्फ दलितों के दिल में थे। बाद में हाथ के छापे पर आ गए और अब कमल सवार हो गए। इधर लगातार कम होती टीआरपी और हिट्स के बीच अयोध्या में से रामजी भी देख रहे होंगे कि उनका वोट बैंक जरा कमजोर हो चला है। मैनफीस्टो से बाहर हुए प्रभु चिंतित है कि कहीं वे देश की जनता के दिल से ही बाहर हो जाएं।

खैर! अम्बेडकरजी की 125वीं वर्षगांठ बहुत कुछ कह गई। हाथ और कमल की तो छोडि़ए झाड़ू तक भुनाने से नहीं चूक रही। हो सकता है कि मैं लोगों को नकारात्मक लगूं लेकिन याद आ रहा है कि संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा थे। उनके निधन पर उपाध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अध्यक्ष बनाया गया था। अम्बेडकर सिर्फ प्रारूप समिति के अध्यक्ष भर थे। वे संविधान निर्माता कहलाए। यदि सिर्फ संविधान निर्माता के तौर पर ही मान दिया जाना है तो बीजेपी को डॉ. प्रसाद को भी इसी रूप में अपनाना चाहिए। परन्तु...। अफसोस...। कांग्रेस भी प्रसाद को वेटेज नहीं देती, जबकि वे पहले राष्ट्रपति भी रहे। कारण...। भई साफ है प्रसादजी के पीछे वोट बैंक नहीं है। केवल दलित ही नहीं बल्कि सवर्णों तक को समानता का अधिकार देकर गए बाबा साहब अम्बेडकर एक बड़े वोट बैंक का आधार है और अपना उल्लू सीधा करने के लिए सभी पार्टियां उनका इस्तेमाल एक सीढ़ी की तरह करना चाहती है।

बीते साल सिरोही जिले में था। आदिवासी जिला है। हाइवे से बीस किलोमीटर साइड उतरकर देखिए, आबूरोड के आसपास। हिन्दुस्तान आज भी वहीं खड़ा है, जहां उसे १९४७ में गोरे अंग्रेज छोडक़र गए थे। या उससे भी कहीं पीछे हैं। इलाज के अभाव में प्रसूताएं मर जाती है और कुपोषण से मासूम। शराबी और कुपोषित आदिवासी पुरुष पचास से बाहर की जिन्दगी नहीं जीते। बाल विवाह, अशिक्षा, दुष्कर्म, चोरी-चकारी जैसी कौनसी समस्या है जो वहां नहीं है। ढंग का रोजगार तक नहीं है।

क्या वे गरासिया आदिवासी पिछड़े नहीं है। दलितों में तीन-चार जातियां ही क्यों आगे बढ़ रही है। ये जातियां अपने से नीचे वालों को ऊपर तक नहीं आने दी जाती। आपस में एससी एसटी एक्ट लागू नहीं होता। परन्तु इस जिले में ऐसा देखा कि इस वर्ग में आपस में ही एक बड़ा जातिवाद है, जिसका कोई तोड़ नहीं है। गरीब आदिवासियों का हक और हिस्सा तक नहीं दिया जा रहा। विधानसभा में विधायक किरोड़ीलाल मीणा ने मुद्दा उठाया, लेकिन मुद्दा फिर बैठ गया है। पहले भी उठा, लेकिन हर बार दम तोड़ जाता है। रामजी भी इधर नहीं देख रहे और अम्बेडकरजी भी। जातियों, समाजों के बीच वैमनस्य बढ़ रहा है। जो राजा थे, उनके वंशज आज भी मौज उड़ा रहे हैं। आपस में वही लड़ रहे हैं, जिनके पेट खाली है। अपनी-अपनी भूख के लिए एक दूसरे को गरियाने का दौर जारी है। राजनीति आम आदमी की भूख पर भारी है।

ऐसे में लगता है कि संविधान की बातें करने वाले टीवी के माइक के आगे जगह पा जाते हैं और अम्बेडकर की बात करने वाले अच्छे वोट। हम राम को भी मान रहे हैं और अम्बेडकरजी को भी, लेकिन उनकी ही नहीं मान रहे। वे जो कह गए, उसे करना जरूरी है। परन्तु हम एक साथ अधिक नावों की सवारी करना चाहते हैं और अक्सर फिसल जाते हैं। आज के दौर में यही हो रहा है...। देखें दौर कहां जाकर थमता है।

Wednesday, April 13, 2016

जिन्दल तुम अभी जिन्दा हो क्या? और तुम कहां हो छलिए?


जिन्दल तुम तो मर ही गए होंगे...। नहीं...। फिर शर्म तो आई ही होगी..। क्या...! वह भी नहीं!!
क्यों, शर्म आने के लिए भी कोई मैनेजर-डाइरेक्टर रख लिया? जिस तरह किसी अबला की जमीन, आबरू और जीवन लूटने के लिए रखे हैं? तुम कौन हो, मैं नहीं जानता? जानना चाहता भी नहीं। तुम व्यक्ति हो या कंपनी, यह भी मुझे नहीं पता। तुम क्या हो, यह प्रश्न नहीं है। सवाल यह है कि तुम अब भी जिन्दा कैसे हो? डूब मरना चाहिए। अकेले नहीं, अपने चहेतों और सहकर्मियों को साथ लेकर।

एक आदिवासी की ज़मीन लूटने के लिए जो खेल चल रहा। वह रूह कंपाने वाला है, लेकिन जिम्मेदारों के कानों जूं तक नहीं रेंगी। नौकरशाह, वकील, उद्योगपति और इन सबकी मिलीभगत ने भारत में लोकतंत्र की जड़ें दिखाई हैं। कोई कुछ भी क्यों नहीं कर रहा?

यह द्रोपदी सिसक पड़ी, परन्तु किसके आगे? सरकार रूपी पाण्डव दांव में अपनी ज़मीन कब की भेंट कर चुके। यह महाभारत नहीं आज का भारत है और यहां कहानी थोड़ी आगे बढक़र है। सरकार जमीन सिर्फ राज की ही नहीं, जनता की भी दांव पर लगाती है। यह भी पता चला कि जमीन के साथ-साथ गरीबों की आजीविका, इज्जत-आबरू और सुख-चैन भी भेंट चढ़ाया जाता है। नजराना, भेंट, कटसी या और भी कुछ नाम दे देकर। इससे क्या होगा? आदिवासी विरोध भी करेंगे तो क्या...। ठोक देंगे...। आमने-सामने कौन? पुलिस या सीआरपीएफ...। मरेंगे तो सरकार का क्या बिगड़ेगा। नक्सली पैकेज की कौनसी ऑडिट होती है। हर कोई अपने-अपने राज्य में ऐसा खेल खेलने में लगा है। भारत के ऐसे हाल क्या किसी ने सोचे थे?

द्रोपदी लुट रही थी और भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोण, कृपाचार्य, विदुर, आमत्य वृषवर्मा देखन-समझने की कोशिश का नाटक कर रहे कि हो क्या रहा है? पाण्डव तो बिचारे पहले ही एमओयू करके चुप हो गए। महिला अधिकारों की झंडाबरदार भी महाभारत की सभा में मौजूद गांधारी जैसी स्थिति में हैं। विद्वजन बताते हैं कि तब की सभा में वह पैशाचिक कृत्य ‘महाभारत होने’ का प्रमुख कारण था। आज यदि यह पांचाली हरण रोजाना होता रहा तो कहीं ‘भारत के नहीं होने’ का कारण न बन जाए।

उस समय तो द्रोपदी को लूटने का प्रयास मात्र हुआ था। परन्तु आज तो वह रोजाना लूट ही ली जा रही है, किसी एक का भी खून नहीं खौलता। क्या रक्त जम गया... या हमारे द्वारा स्त्रियों को सम्मान दिए जाने का इतिहास मिथ्या है...। मिथ्या ही प्रतीत होता है...। हम इतने हिप्पोक्रेट जो हैं। कहते हैं वह नहीं करते...। कहते क्या, लिखते-पढ़ते-बोलते-सुनते-सुनाते
-गाते-गरियाते और शपथ लेते हैं। वह तक भी तो नहीं करते। एक ‘अच्छा’ तक चार तरह से कहते-करते हैं...। ‘बुरा’ करने के तो सैकड़ों-हजारों ही नहीं अनगिनत तरीके हैं। स्त्री के शील पर प्रहार का अर्थ है मानवता के मर्म पर प्रहार। परन्तु मानवता तो बची कहां? इस एमओयू की स्याही में उसी का गाढ़ा रक्त ही तो काम आया था।
यहां हस्तिनापुर की एक सभा समाप्त हो चुकी है। दूसरी जगह सभाएं जारी हैं। यहां भी फिर शुरू हो जाएगी। कहानी महाभारत से इतर है, लेकिन भारत की कहानी में पात्र तो वैसे ही है। बस पाण्डवों की आंख का पानी मर चुका है। पहला चीर दु:शासन ने नहीं इन्होंने ही भू-अधिग्रहण कानून बनाकर खींचा था। अल्पबुद्धि दु:शासन का कहना है कि वह तो यहां था भी नहीं। उसे दोष ही क्यों दें...। आजकल भारत में धृतराष्ट्र तब बात पहुंचने से पहले रजिस्ट्रार की अनुमति जरूरी है, लेकिन वहां इस पांचाली की चलती नहीं। सामने वाले के दर्जनों वकील भारी जो पड़ जाते हैं। भीष्म पितामह अपने महल में आराम फरमा रहे हैं... उनकी कोई नहीं सुनता और वे भी किसी की नहीं सुनते। राज्य को सुव्यवस्थित चलाने की नीति में विफल विदुर विदेश नीति बनाने में व्यस्त है। द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वश्वथामा को किसी यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर के जॉब के लिए दुर्योधन से सिफारिश में लगे हैं। कर्ण तो तब भी कुछ नहीं बोला था। अब वह अपने राज्य का मुखिया तो है, लेकिन हस्तिनापुर से गया राज्य प्रमुख उस पर भारी पड़ता है। उसे इस मुद्दे में वोट भी नजर नहीं आते। तब भाइयों से बगावत करने का वाला विकर्ण बोला तो था, लेकिन अब मौन है। मद्र देश के शल्य को अपनी सरकार के खिलाफ आए अविश्वास प्रस्ताव को अपने पक्ष में करने की कोशिश करनी है। कुन्ती बॉलीवुड के साथ-साथ संसद में दोहरी भूमिका में है। एकलव्य आजकल बड़ा वोट बैंक लिए है, इसलिए बिना अंगूठे के ही बड़ा शिकारी है...। अभिमन्यु को अपने कॅरियर की चिन्ता है...। सबके अपने-अपने काम है। अकेला बैठा सोच रहा हूं...। सामने द्रोपदी के वस्त्रों का ढेर पड़ा है और वह पता नहीं कहां है। केशव नहीं आए उसे बचाने। पता नहीं क्यों? चिन्ता जिन्दल के जिन्दा या मृत होने की नहीं है। समस्या उस छलिए केशव के गायब होने की है। परन्तु लगता है अब वह नहीं आएंगे। चार लाइनें याद आ रही हैं...।

उठो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब गोविंद ना आएंगे।
छोड़ो मेहंदी खडग़ संभालो, खुद ही अपना चीर बचालो। अब गोविंद ना आएंगे।

- प्रदीप बीदावत

(नोट : यह विचार राजस्थान पत्रिका छत्तीसगढ़ के साथी की खबर पर मेरे मन में आए। साथी की खबर पढऩे और पीडि़ता का ऑडियो सुनने के लिए क्लिक करें। राजस्थान पत्रिका के निम्न लिंक पर)

http://www.patrika.com/news/raipur/raigarh-jindal-group-tortures-tribal-woman-to-acquire-her-lands-in-chhattisgarh-1266650/


http://epaper.patrika.com/c/9664153

Thursday, November 27, 2014

दो मिनट हैं? यदि नहीं .... तो भी पढ़े...

मिनट हैं? यदि नहीं .... तो भी पढ़े...
 जो शहीद हुए वतन पर लिए बिना कोई मोल आंसू से लिख, कलम आज उनकी जय बोल मुम्बई लहुलूहान हुई थी इसलिए 26 नवम्बर 2008 भुलाए नहीं भूलता। पर कसाब को फांसी दिए जाने के बाद उन्हें और अन्य शहीदों को भुला दिया जाना कितना जायज? शहीद अशोक काम्टे, विजय सालस्कर, हेमन्त करकरे, mejor sandeep unnikrishnan, कसाब को पकड़ने वाला तुकाराम आदि कोई भी स्मृतियों से विलोपित होने जैसे तो नहीं थे। इस वर्ष यहां कोई कार्यक्रम नजर नहीं आया। एक माह पूर्व करकरे की पत्नी प्रोफेसर श्रीमती कविता का देहांत हुआ था। पति ने शहादत देकर दर्जनों जानें बचाई तो मौत के बाद भी कविता ने भी तीन लोगों को जीवन दिया। उनकी बेटी जुई, सयाली और बेटे आकाश ने कविता के अंगदान की स्वीकृति दी हैं। ये पोस्ट सिर्फ इसीलिए लिखी जा रही है कि भ्रष्ट, चोर-धूर्त और लम्पट राजनेताओं के पास चुनावी माहौल में पुण्यवेदी पर चढऩे वालों के लिए श्रद्धांजलि देने का समय नहीं है। इस मौके एक बेहतरीन लेखक गौरव सोलंकी की कविता भी उनके ब्लॉग से साभार प्रस्तुत हैं। हेमंत करकरे नाम का एक आदमी मर गया था एक आदमी दिखाता था अपना हाथ बार बार कैमरे के सामने जिसमें से चूता था टप टप खून, एक आदमी ने अपने कमरे की खिड़की के शीशे पर लिखा था, ‘हमें बचा लो’ कोलगेट के टूथपेस्ट या जिलेट की शेविंग क्रीम से। खिड़की पर ज़ूम होता था बार बार कैमरा। जाने कौनसा मॉडल था, बहुत बढ़िया था रिज़ोल्यूशन। दनादन गोलियाँ निकलती थीं चलती हुई जिप्सी में से, लोग लेट जाते थे लेटी हुई सड़क पर, हम सब लिहाफ़ों में लेटकर देखते थे टीवी, बदलते रहते थे चैनल, बार बार चाय पीते थे। समाचार वाली सुन्दर लड़कियाँ बताती थीं हमें और भी बहुत सारी नई बातें और जब हम सब कुछ भूल जाना चाहते थे उनकी छातियों पर नज़रें गड़ाकर तब सारी उत्तेजनाएँ जैसे किसी खानदानी दवाखाने की शिलाजीत की गोलियों में छिप जाती थी। उचककर छत से चिपककर फूट फूट कर रोने का होता था मन। नहीं आता था रोना भी। हेमंत करकरे नाम का एक आदमी मर गया था और नहीं जीने देता था हमें। ऐसे ही कई और साधारण नामों वाले आदमी मर गए थे जो नहीं थे सचिन तेंदुलकर, आमिर ख़ान या अभिनव बिन्द्रा, नहीं लिखी जा सकती थी उनकी जीवनियाँ बहुत सारे व्यावसायिक कारणों से। वह रात को देर से पहुँचने वाला था घर, फ़्रिज में रखा था शाही पनीर और गुँधा हुआ आटा, एक किताब आधी छूटी हुई थी बहुत दिन से, माँ की आती रही थीं शाम को मिस्ड कॉल, उसे भी करना था घर पहुँचकर फ़ोन, ढूंढ़ना था कोल्हापुर में कॉलेज के दिनों की एक लड़की को, बस एक बार देखना था उसका अधेड़ चेहरा, उसके बच्चे, अपने बच्चों के साथ देखनी थी पच्चीस दिसम्बर को गजनी। गजनी माने आमिर ख़ान। एक दिशा थी जहाँ से आने वाले सब लोग भ्रमित हो जाते थे, एक प्यारा सा चमकीला शहर था जिसका दुखता था पोर पोर, जबकि वह एक से अधिक पिताओं का दौर था, खेलते-सोते-पढ़ते-तुनकते-ठुनकते पचासों बच्चे रोज हो जाते थे अनाथ, हमें आता था क्रोध और हम सो जाते थे। कमज़ोर याददाश्त और महेन्द्र सिंह धोनी के इस समय में यह हर सुबह गला फाड़कर उठती हुई हूक, हेमंत करकरे, अशोक काम्टे, विजय सालस्कर और बहुत सारे साधारण लोगों को बचाकर रख लेने की एक नितांत स्वार्थी कोशिश है, इसे कविता न कहा जाए।" जो शहीद हुए वतन पर लिए बिना कोई मोल आंसू से लिख, कलम आज उनकी जय बोल मुम्बई लहुलूहान हुई थी इसलिए 26 नवम्बर 2008 भुलाए नहीं भूलता। पर कसाब को फांसी दिए जाने के बाद उन्हें और अन्य शहीदों को भुला दिया जाना कितना जायज? शहीद अशोक काम्टे, विजय सालस्कर, हेमन्त करकरे, mejor sandeep unnikrishnan, कसाब को पकड़ने वाला तुकाराम आदि कोई भी स्मृतियों से विलोपित होने जैसे तो नहीं थे। इस वर्ष यहां कोई कार्यक्रम नजर नहीं आया। एक माह पूर्व करकरे की पत्नी प्रोफेसर श्रीमती कविता का देहांत हुआ था। पति ने शहादत देकर दर्जनों जानें बचाई तो मौत के बाद भी कविता ने भी तीन लोगों को जीवन दिया। उनकी बेटी जुई, सयाली और बेटे आकाश ने कविता के अंगदान की स्वीकृति दी हैं। ये पोस्ट सिर्फ इसीलिए लिखी जा रही है कि भ्रष्ट, चोर-धूर्त और लम्पट राजनेताओं के पास चुनावी माहौल में पुण्यवेदी पर चढऩे वालों के लिए श्रद्धांजलि देने का समय नहीं है।


इस मौके एक बेहतरीन लेखक गौरव सोलंकी की कविता भी उनके ब्लॉग से साभार प्रस्तुत हैं।


हेमंत करकरे नाम का एक आदमी मर गया था

एक आदमी दिखाता था अपना हाथ बार बार
कैमरे के सामने
जिसमें से चूता था टप टप खून,
एक आदमी ने अपने कमरे की खिड़की के शीशे पर
लिखा था, ‘हमें बचा लो’
कोलगेट के टूथपेस्ट या जिलेट की शेविंग क्रीम से।
खिड़की पर ज़ूम होता था बार बार कैमरा।
जाने कौनसा मॉडल था,
बहुत बढ़िया था रिज़ोल्यूशन।
 
दनादन गोलियाँ निकलती थीं
चलती हुई जिप्सी में से,
लोग लेट जाते थे लेटी हुई सड़क पर,
हम सब लिहाफ़ों में लेटकर देखते थे टीवी,
बदलते रहते थे चैनल,
बार बार चाय पीते थे।

समाचार वाली सुन्दर लड़कियाँ बताती थीं
हमें और भी बहुत सारी नई बातें
और जब हम सब कुछ भूल जाना चाहते थे
उनकी छातियों पर नज़रें गड़ाकर
तब सारी उत्तेजनाएँ जैसे किसी खानदानी दवाखाने की
शिलाजीत की गोलियों में छिप जाती थी।
उचककर छत से चिपककर
फूट फूट कर रोने का होता था मन।
नहीं आता था रोना भी।


हेमंत करकरे नाम का एक आदमी
मर गया था
और नहीं जीने देता था हमें।
ऐसे ही कई और साधारण नामों वाले आदमी
मर गए थे
जो नहीं थे सचिन तेंदुलकर, आमिर ख़ान
या अभिनव बिन्द्रा,
नहीं लिखी जा सकती थी उनकी जीवनियाँ
बहुत सारे व्यावसायिक कारणों से।
 
वह रात को देर से पहुँचने वाला था घर,
फ़्रिज में रखा था शाही पनीर
और गुँधा हुआ आटा,
एक किताब आधी छूटी हुई थी बहुत दिन से,
माँ की आती रही थीं शाम को मिस्ड कॉल,
उसे भी करना था घर पहुँचकर फ़ोन,
ढूंढ़ना था कोल्हापुर में
कॉलेज के दिनों की एक लड़की को,
बस एक बार देखना था उसका अधेड़ चेहरा,
उसके बच्चे,
अपने बच्चों के साथ देखनी थी
पच्चीस दिसम्बर को गजनी।
गजनी माने आमिर ख़ान।
 
एक दिशा थी
जहाँ से आने वाले सब लोग
भ्रमित हो जाते थे,
एक प्यारा सा चमकीला शहर था
जिसका दुखता था पोर पोर,
जबकि वह एक से अधिक पिताओं का दौर था,
खेलते-सोते-पढ़ते-तुनकते-ठुनकते पचासों बच्चे
रोज हो जाते थे अनाथ,
हमें आता था क्रोध
और हम सो जाते थे।

कमज़ोर याददाश्त और महेन्द्र सिंह धोनी के इस समय में
यह हर सुबह गला फाड़कर उठती हुई हूक,
हेमंत करकरे, अशोक काम्टे, विजय सालस्कर
और बहुत सारे साधारण लोगों को बचाकर रख लेने की
एक नितांत स्वार्थी कोशिश है,
इसे कविता न कहा जाए।

Friday, November 12, 2010

सैल्यूट नन्हे मास्टर


कल रात एक बालक ने बड़ा प्रभावित किया। यही तीन-चार वर्ष का रहा होगा। पिता बड़े ओहदेदार, माताजी सलीकेदार। माता-पिता की नजरों में यह उसकी उद्दण्डता अथवा जिद कही जा सकती है, लेकिन किनारे खड़े स्वतंत्र समीक्षक की भांति यही कहना चाहूंगा कि बच्चे के भाव उसकी आत्मा के भाव थे। उसका प्रभावित करना उसकी बाल सुलभ चपलता थी।

उस पर आज्ञाएं थोपी नहीं जानी चाहए, भले ही वे किसी के पैर छूने की क्यों न हों। यहां न तो उनके माता-पिता का परिचय दूंगा और न ही बच्चे का। यह स्थिति लगभग सभी के साथ आती हैं। माता-पिता कहीं भी जाते हैं तथाकथित बड़े और मीडिया से बनाए हुए आदर्शों का चोला पहने लोग मिलते हैं, खुद प्रणाम करते हैं। मजबूर हैं। मीडिया से जुड़े होने के कारण हम जैसे कई मजबूर हैं उन्हें हीरो बनाने के लिए। उनके महिमामंडन के लिए। पता नहीं क्यों? मन तो नहीं करता, लेकिन बुभुक्षुम् किम् करोति न पापम्। विश्वामित्र याद आ जाते हैं जब द्वापर में भूख लगने पर कुत्ते का मांस खाया था।

लेकिन बच्चे की गर्दन पकडक़र झुकाना ठीक नहीं।


पर यह बच्चा नहीं झुका। पिताजी ने अच्छे बच्चे होने का हवाला दिया। माताजी ने पढऩे वाला राजा बेटा होने की बात भी कही, लेकिन बच्चा पैर छूने की बजाए हाथ मिलाकर आया। यह बात प्रभावित कर गई कि हिन्दुस्तान का भविष्य अब करवट बदल रहा है। चैतन्यता का उज्ज्वल प्रवाह नई पीढ़ी की धमनियों में आने लगा है। भले यह पीढिय़ों से अर्जित किया हुआ धन है अथवा वर्तमान समय की जरूरत। बच्चे का स्वाभिमान उसने जीवित रखा।

उसे यदि हम किसी को प्रणाम करने के लिए कहते हैं तो वह प्रणाम क्यों करे? जिस व्यक्ति को वह चरण स्पर्श कर रहा है वह दुनिया में उससे पहले आ गया यह कोई कारण नहीं है। उसका व्यक्तित्व किसी का आदर्श होने लायक है।


बड़े दार्शनिक रजनीश ने इसे ढंग से व्याख्यित किया है : आपके घर में छोटा बच्चा है, घर में कोई मेहमान आते हैं, आप उससे कहते हैं, चलो पैर पड़ो। और वह बिलकुल नहीं पड़ना चाह रहा है। लेकिन आपकी आज्ञा उसे माननी पड़ेगी।


मैं किसी के घर में जाता हूँ, माँ-बाप पैर पड़ते हैं, और अपने छोटे-छोटे बच्चों को गर्दन पकड़कर झुका देते हैं! वे बच्चे अकड़ रहे हैं, वे इन्कार कर रहे हैं। उनका कोई संबंध नहीं है, उनका कोई लेना-देना नहीं है, और बाप उनको दबा रहा है!


यह बच्चा थोड़ी देर में सीख जाएगा कि इसी में कुशलता है कि पैर छू लो। इसका पैर छूना व्यक्तित्व का हिस्सा हो जाएगा। फिर यह कहीं भी झुककर पैर छू लेगा, लेकिन इसमें कभी आत्मीयता न होगी। इसकी एक महत्वपूर्ण घटना जीवन से खो गई। अब यह किसी के भी पैर छू लेगा और वह कृत्रिम होगा, औपचारिक होगा। और वह जीवन का परम अनुभव, जो किसी के पैर छूने से उपलब्ध होता है, इसको नहीं उपलब्ध होगा।


अब इसका पैर छूना एक व्यवस्था का अंग है। यह समझ गया कि इसमें ज्यादा सुविधा है। यह अकड़ कर खड़े रहना ठीक नहीं। पिता झुकाता ही है, और पिता को नाराज करना उचित भी नहीं है, क्योंकि वह पच्चीस तरह से सताता है, और सता सकता है। तो इसमें ही ज्यादा सार है, बुद्धिमान बच्चा झुक जाएगा। समझ लेगा।



मगर यह झुकना यांत्रिक हो जाएगा। और खतरा यह है कि किसी दिन ऐसा व्यक्ति भी इसको मिल जाए, जिसके चरणों में सच में यह झुकना चाहता था तो भी यह झुकेगा, वह कृत्रिम होगा। क्योंकि वह सच इतने पीछे दब गया, और व्यक्तित्व इतना भारी हो गया है।

अधिक कुछ न कहते हुए तहेदिल से उस नन्हे बालक के उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं करता हूं।

Sunday, September 5, 2010

शिक्षक दिवस पर विशेष - दो व्यंग्य

धनुष किसने तोडा ?



एक दिन सरपंच साहब को जाने क्या सूझी कि चल पड़े स्कूल की ओर। यह जानने कि गांव के बच्चों का आईक्यू कैसा'क है। स्कूल पहुंचे तो एक भी अध्यापक कक्षा में नहीं। घंटी के पास उनींदे से बैठे चपरासी से जब पूछा सारे मास्टर कहां गए तो पता चला कि पशुगणना में ड्यूटी लगाने के विरोध में कलेक्टरजी को ज्ञापन देने शहर गए हैं। सरपंचजी ने सातवीं कक्षा के एक बच्चे से पूछा "बताओ शिव का धनुष किसने तोड़ा।" जवाब आया " सरपंचसा! कक्षा में सबसे सीधा छात्र मैं हूं, मैंने तो नहीं तोड़ा। हां चिंटू सबसे बदमाश है, उसी ने तोड़ा होगा। वह आज छुट्टी पर भी है। शायद धनुष टूट जाने के डर से नहीं आया हो।" सरपंचजी ने माथा पीट लिया और वापस लौट गए। शिक्षक लौटे तो चपरासी बोला "सरपंचजी आए थे और बच्चों को कुछ पूछ रहे थे और गए भी भनभनाते हुए हैं।" प्रधानाध्यापक महोदय का पानी पतला हुआ। कक्षा में आए और पूछा "सरपंचजी क्या कह रहे थे।" बच्चों ने सारी बात बता दी। अब प्रधानाध्यापकजी ने बच्चों से पूछा "बच्चों किसी से गलती से धनुष टूट गया तो कोई बात नहीं। केवल यह बता दो धनुष तोड़ा किसने।" बच्चों ने तोड़ा हो तो बोलें। खामोशी देखकर तुरन्त अध्यापकों की बैठक बुलाई और कहा "देखो! शिवजी का धनुष किसी ने तोड़ दिया है और शिवजी कौन है यह भी हमें नहीं मालूम। उनकी शायद ऊपर तक पहुंच हो। पीटीआईजी आप इस मामले की जांच कर कल तक रिपोर्ट दीजिए।" शारीरिक शिक्षक महोदय ने साम, दाम, दंड, भेद आजमाए पर पता नहीं लगा पाए। प्रधानाध्यापकजी को चिंतातुर देख विद्यालय के बाबू बोले "साहब मैं तो कहता हूं कि जिला शिक्षा अधिकारी को पत्र लिखकर मामले से अवगत तो करवा ही दिया जाना चाहिए। नहीं तो बाद में परेशानी खड़ी हो जाएगी। शायद शिवजी आलाकमान तक बात ले जाएं और अपन को ऐसे गांव में नौकरी करनी पड़े जहां बिजली और बस भी मर्जी से आती हो।" प्रधानाध्यापकजी ने डीईओ को पत्र लिखा "महोदय किसी ने शिवजी का धनुष तोड़ दिया है। हम अपने स्तर पर पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं और आपके कानों तक बात डलवा रहे हैं।" तीन दिन बाद जवाब मिला। "प्रधानाध्यापकजी! इस बात से हमें कोई लेना देना नहीं कि धनुष किसने तोड़ा। हां याद रहे यदि सरपंच की ऊपर तक पहुंच है और कोई लफडा हुआ तो धनुष के पैसे आपकी पगार में से लिए जाएंगे।"
आज के एकलव्य का अंगूठा
गली-खोरियां खुल रहीं शिक्षा की दुकान,
बैठ सुज्ञानी की जगह अज्ञानी दे ज्ञान।
ग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक शिक्षक दिवस निकल गया। शिक्षक दिवस कलियुग के गुरुजनों की वंदना का दिन है। सतयुग से द्वापर तक गुरु पूर्णिमा गुरुजनों का दिन रहा, जिस पर उनकी पूरी पंचायती चलती थी। जो गुरुदक्षिणा मांग ली, शिष्य को देनी ही पड़ती थी। चलिए द्वापर के किरदारों को कलियुग में लाते हैं। अर्जुन के पिता राशन के डीलर और एकलव्य पिछड़ी जाति का। गुरुजी एकलव्य को एडमिशन नहीं देना चाहते थे पर एकलव्य आरक्षण का लाभ लेकर गले पड़ ही गया। मरते बेचारे क्या न करते और एकलव्य को पढ़ाना प्रारंभ कर दिया। मेधावी होने के बावजूद गुरुजी की कारस्तानी से एकलव्य हमेशा पिछड़ जाता। अर्जुन नित्यप्रति गुरुजी के वहां राशन का केरोसीन, चावल, शक्कर और गेहूं पहुंचाता और गुरुजी नंबरों की मेहरबानी रखते। इसी तरह दोनों दसवीं में आ गए। एकलव्य बोला "गुरुजी अबके तो बोर्ड है आप अर्धवार्षिक के दश प्रतिशत के अलावा कुछ नहीं कर पाएंगे और तेरा क्या होगा रे अर्जुन! "

गुरुजी टेंशन में कहीं अर्जुन न पिछड़ जाए इसलिए गुरु ने अब चाणक्य नीति अपनाई। अर्जुन के साथ-साथ एकलव्य को ट्यूशन पर बुलाना शुरू कर दिया वो भी मुफ्त ! एकबारगी तो एकलव्य भी चक्कर खा गया कि ये क्या हो गया। परीक्षा के समय विद्यालय के अंतिम दिन दोनों को बुलाया और कहा "आज आपका अंतिम दिन है। मुझे गुरुदक्षिणा चाहिए।" अर्जुन ने कहा "गुरुदेव जब तक आपका ट्रांसफर दूसरी जगह नहीं हो जाता राशन का सामान पहुंचाता रहूंगा।" अब एकलव्य की बारी थी बोला "मैं तो एकलव्य ठहरा जो मांगेंगे वह दूंगा।"

गुरु ने द्वापर का वार कलियुग में दुबारा किया और कहा "दाहिने हाथ का अंगूठा चाहिए।" एकलव्य ने बिना दूसरा शब्द बोले दाहिने हाथ का अंगूठा समीप पड़े पत्थर से कुचल लिया। गुरु की बांछे खिल गई। अर्जुन को सिरमौर रखने का सपना जो पूरा हो रहा था। पनीली हो चुकी आंखों के बीच एकलव्य बोला "गुरुदेव आप भूल गए। यह द्वापर नहीं कलियुग है। मैं तो नहीं बदला पर आपकी दृष्टि बदल गई। मेरे लिए इस युग में बड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि द्वापर में मैं दाहिने हाथ से तीर चलाता था, लेकिन कलियुग में बाएं हाथ से लिखता हूं। इसलिए आप मुस्कुराहट को थोड़ा कम कर लीजिए।"


यह पोस्ट पहले भी पोस्ट कर चुका हूँ पर शिक्षक दिवस पर दुबारा आपके लिए ||

Monday, July 12, 2010

चित्र नहीं यह तो विचित्र है,

बदल गया अब दौर पुराना,
देखो आया नया जमाना।
बेटी को रस्ते की ठोकर,
कुत्तों को कंधे पे उठाना।

वक्त ने बदसूरत कर डाला,
मां का चेहरा बहुत सुहाना।
जान निछावर अब पशुओं पर,
संतानों को सजा दिलाना।

दुश्मन जानी बने लोग तो,
और पशुओं पर जान लुटाना।
मां फिर बन जाओ मां जैसी,
जो चेहरा जाना पहचाना।

टूट गया नजरों के आगे,
इक सपना था बहुत सुहाना।
अब कैसे नजीर बनोगी,
और दोगी कैसे नजराना।

मां तो हैं अनमोल धरोहर,
मां के कदमों तले जमाना।
संतानों के सुख की चाहत,
सुबह-शाम बस एक ही गाना।

पश्चिम वालों के पिछलग्गू,
की हरकत है यह बचकाना।
मेरे भारत की वसुधा में,
भूले से भी कभी न आना।

चित्र नहीं यह तो विचित्र है,
कैसा है आया नया जमाना।
दिल छोटा सा कर देता है,
यह विकास का ताना-बाना।

अपनों से निबाह भी मुश्किल,
और गैरों को गले लगाना।
मानव रोये तन्हा-तन्हा,
बेदिल के दिल को बहलाना।

नदियां सूखी, रीते कुएं,
पनघट सदियों हुआ पुराना।
बिसलेरी पीने वालों ने,
माटी के जल को क्या जाना।

है प्रमोद की बातें झूठी,
तो सच को किसने पहचाना।

(यह रचना हमारे आदरणीय गुरु प्रमोदजी श्रीमाली ने बंधु आशीष जैन कोटा द्वारा उनके ब्लॉग पर लगाई गई फोटो को देखकर लिखी है। यह तुच्छ प्राणी भी इस फोटो और रचना को अपने ब्लॉग पर डालने का लोभ संवरण नहीं कर पाया।)

Sunday, January 24, 2010

इस तरह उड़ान भरते हैं हौसले

 कभी लोगों से ताने सुनने वाले विकलांग ने दिया मूक-बधिर बच्चों को मजबूत सहारा 



पैरों और एक आंख से नि:शक्त धन्नाराम पुरोहित के बारे में गांव के लोग कहा करते थे कि यह बेचारा जिन्दगी में क्या कर पाएगा, लेकिन आज उसी धन्नाराम ने सैकड़ों निज्शक्तजनों को धन्य कर रखा है। किसी भी विकलांग को तकलीफ न हो, वह आगे चलकर अपना सहारा खुद बने, इसके लिए धन्नाराम ने विकलांगों की सेवा को अपनी साधना बना लिया है। वह जालोर जिले में महावीर आवासीय मूक-बधिर विद्यालय के संचालक हैं तथा मूक-बधिर बच्चों और विकलांगों की सेवा में जुटे हुए हैं। इस विद्यालय में साठ मूक-बधिर बच्चे अध्ययनरत हैं। यह जोधपुर संभाग का एकमात्र मूक-बधिर आवासीय विद्यालय है, जो सिर्फ धन्नाराम के जज्बे और समर्पण की वजह से चल रहा है। धन्नाराम कहते हैं - "ये सुन बोल नहीं सकते, लेकिन मैं इनकी आंखें पढ़ता हूं। उनमें आगे बढ़कर आसमान चीरने का जज्बा है। यही मेरी हिम्मत है।" धन्नाराम को अपना विकलांग प्रमाण पत्र बनवाने के लिए पन्द्रह दिन अस्पताल के चक्कर काटने पड़े थे। तभी उन्होंने तय किया कि जिन्दगी अपने जैसों की सेवा में ही बिताएंगे।

मुहिम खुद के पैसों से
पहले-पहल न तो सरकारी फण्ड था और ना ही समाजसेवी संस्थाओं का विश्वास। धन्नाराम ने खुद के पैसों से अभियान जारी रखा। सरकारी फण्ड तो आज भी नहीं है, लेकिन लोगों का इतना विश्वास हासिल कर लिया है कि किसी भी तरह के सहयोग के लिए कोई इनकार नहीं करता।

मुश्किल नहीं, अगर ठान लिया जाए
धन्नाराम बताते हैं कि सात साल की उम्र में कम्पाउण्डर की लापरवाही से उनके पैर और एक आंख चली गई। घरवालों से हरसम्भव इलाज के साथ मन्दिर में चक्कर काटे पर नतीजा शून्य रहा। पांचवी तक मेड़ा में पढ़ा। मिडिल स्कूल पांच किमी दूर कूका गांव में थी, लेकिन पिता भैराराम की चाह थी कि वह आगे पढ़े। भैराजी तीन साल तक अपने कंधों पर बिठाकर उसे स्कूल ले जाते और छुट्टी होने पर वापस लाते। तब धन्नाराम उन विकलांग बच्चों को देखकर चिन्तित होते थे, जिनके घरवालों का जज्बा उनके पिता जैसा नहीं था।

राजस्थान पत्रिका के 24 जनवरी 2009 के विशेष अंक में प्रकाशित

Sunday, December 27, 2009

नारी विरोधी जिस्मफरोशी

आदरणीया वर्षाजी के ब्लॉग पर लिखा लेख जायज हो जिस्मफरोशी से प्रेरणा ली और लिखने का मानस बनाया। हालांकि एक ऐसा विषय है, जिस पर मैंने पहले कभी विचार नहीं किया। ब्लॉग में शाहिदजी मिर्जा द्वारा लिखी कविता पढ़ी तो वाकई लगा मैं कुछ लिखुं। इसके पीछे प्रेरणास्त्रोत वह लेख ही है।

http://likhdala.blogspot.com/2009/12/blog-post_23.html


मुझे यह भी समझ नहीं आता कि तुम्हें क्या सम्बोधन दूं? चैतन्यता की परिभाषा जहां समाप्त होती है वहां से तुम्हारे दैदिप्यमान तेज का पुंजीभूत प्रकाश प्रारंभ होता है। छोटा सा मायावाद समझ नहीं आया तो यह मूढ़ बुद्धि तुम्हें क्या समझ पाएगी, लेकिन इतना जरूर है कि तुम कुटिल मायावी नहीं हो। कभी तुम जीवन मरुस्थल के आतप में एक शीतल वृक्ष की छांह जैसी हो तो कभी अग्नि की उष्णता से भी तप्त। यह बात मुझे अब महसूस होने लगी है, जब अपने जीवन के 23 अनमोल बसन्त उश्रृंखलता में गंवा चुका हूं।

बात तुम्हारे द्वारा जिस्मफरोशी की आती है तो लगता है कि कई वर्ग इसके लिए जिम्मेदार है। नारी जो कि राष्ट्र की संजीवन शक्ति है। उसका व्यापार बड़े पैमाने पर चलना लोकतंत्र के चेहरे पर एक स्याह धब्बा है, जिसे मिटाना बहुत बड़ी चुनौती है।

बहुत सी महिलाएं मजबूरी में यह धंधा करती है और कई शौक से आती है बाद में आदत और फिर स्वभाव। कहीं-कहीं ऐसा भी होता है। पर उन्हें कौन रोके जो शौक से आतीं हैं। घर से दूर रहकर पढ़ने वाली बालाएं जो अय्याशी के लिए कुछ चांदी के टुकड़े चाहती है और उसके बदले अपना शरीर बेचती है।

जिस्मफरोशी की बात जायज नहीं कही जा सकती लेकिन इस पर चिंतन भी होना चाहिए। मैं गलत सोच रहा हूं या सही मुझे नहीं पता, लेकिन शçक्त जैसा ही स्वरूप रखने वालियों में कमसे कम इतनी सोच तो होनी ही चाहिए कि भारतीय परपरा रूपी सूर्यदेव को ठोकर मारकर वे किसका आह्वान करके देवाहुति मंत्र पढ़ रही हैं। अपने संरक्षण के लिए स्वयं को जागरूक होना होगा। भीतर नव उजाले की चेतना विकसित करने का दर्द भरना होगा। भले आप कुछ नहीं कर पाएं। जब आपके जेहन में यह दर्द रहेगा तो आने वाली वे पीढ़ियां जो तुम्हारी कोख से जन्म लेंगी। तुम्हारे दर्द को समझेंगी और सार्थक क्रियान्विति के लिए प्रयास करेंगी।

दूसरी बात उनके लिए जो नारी को केवल एक जिस्म मानते हैं उनके लिए जिस्मफरोशी की व्यवस्था नीति संगत हो सकती है, लेकिन ऐसे लोगों का स्थान जंगल से बाहर नहीं आना चाहिए और न ही उन्हें इंसानों की किसी श्रेणी से संबोधित किया जाना चाहिए। ऐसी नारी विरोधी मानसिकता वाले फैसलों पर मुहर लगाने से पहले कुछ बातों पर गौर किया जाना चाहिए।

नारीशक्ति का अपमान

एक कर्ण! सूर्य शिष्य! सूर्यपुत्र! कौन्तेय! प्रथम पाण्डव! अथवा दुभाüग्य का सहोदर!
जीवन में केवलमात्र अपराध यही किया कि मानसिक आवेगों के गतिरोध में एक पतिव्रता स्त्री को कुलटा और विहरिणी कह दिया। सूर्यपुत्र होने के बावजूद इसका मूल्य उसे अपना जीवन देकर चुकाना पड़ा और सदियों के लिए खलनायक साबित हो गया। भले उसके दिव्य कवच-कुण्डल वाले शरीर को इस अपराध की सजा देने के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण को भी छल का सहारा लेना पड़ा। क्या उसके जैसा या उससे थोड़ा सा भी मिलता जुलता अब कोई तुम्हारी कोख पैदा नहीं करेगी। क्या कोई कुन्ती अज्ञानता में भी सूर्य का आह्वान करके देवाहुति मंत्र नहीं पढ़ेगी।

एक द्रोपदी! हां वही पांचाली। एक रजस्वला स्त्री जिसे दु:शासन ने वस़्हीन करके दुर्योधन की जांघ पर बिठाने का प्रयास मात्र किया और इतना बड़ा युद्ध हो गया। महाभारत हो गया। जिसमें लाखों यौद्धाओं का खून बह गया। आज सैकड़ों बालाएं रोज लूटी जाती है, लेकिन शक्ति पुत्रों में से किसी एक का भी खून नहीं खौलता। जैसे उनके रक्त को शीत ज्वर हो गया या उनकी चैतन्यता को काठ मार गया। क्या स्त्री शक्ति इसी तरह लूटी जाएगी और हम उसमें सहभागी बनेंगे? अथवा देखते रहेंगे। हो क्या गया है हमारे अहसासों को। कहां गया हमारा ईश्वरीय भाव। मेरी तो सोच यह है कि राष्ट्र को नारी शक्ति की महत्ता समझनी होगी और उसे उचित समान देना होगा न कि जिस्मफरोशी को वैधानिक मान्यता।

क्योंकि सीमाओं पर वे लोग तो कपट और छल से लड़ते हैं
हमारे सैनिक मां की दुआ और प्रतिव्रताओं के बल से लड़ते हैं।

बदनाम बस्तियां कविता में कवि जगदीश सोलंकी ने लिखा है
जब गुज़रा एक दर से तो थरथराए पैर

मंदिर के पुजारी भी वहां करने आए सैर
चंदन का तिलक देख के हैरान हो गया
ये आदमी था किस तरह हैवान हो गया
इस देश की अश्लील तबाही को रोकिए
वदीZ पहन के जाते सिपाही को रोकिए
माया से बस यहां काया ही सस्ती है
भूले से भी मत आना ये बदनाम बस्ती है

Saturday, November 14, 2009

"अर्द्धागिनी" या "माया ठगिनी"


जालोर। कुछ पैसों का मोह इन दिनों विवाह के मायने बदल रहा है। बाहर के राज्यों से ब्याहकर आने वाली बहुएं मारवाड़ी दूल्हों को चूना लगा रही हैं। अकेले सांचौर वृत्त में ही पिछले चार दिनों में पीडित पतियों की ओर से तीन मुकदमे दर्ज करवाए गए हैं।

"वे" विवाह के फेरों और मंगलसूत्र के एक अनमोल धागे के साथ बंधकर जीते दम तक साथ जीने मरने की कसमें खाकर "इनके" आई थीं। अब कुछ पैसों का मोह अटूट बन्धन को तार-तार कर रहा है। कुछ दिनों तक पति के साथ रहकर गहनों समेत चम्पत होने की घटनाएं खासी शर्मसार करने वाली है।



बेटियां या कमाई का जरिया

पीडित पतियों ने यह भी आरोप लगाया है कि यहां से रूपए लेकर फरार हुई आरोपी महिलाओं ने शादीशुदा होने के बावजूद दूसरा विवाह कर लिया। इन मामलों में इनके माता-पिता द्वारा दूसरी शादी करवाए जाने की बात कॉमन है। आरोपों से जाहिर होता है कि बेटी का विवाह पुण्य मानने वाले समाज में बेटी बेचने की घृणित परम्परा चिंतित करने वाली है।
नहीं करवाते मुकदमा
सामाजिक लोक-लाज के डर से कई लोग मुकदमा भी दर्ज नहीं करवाते। साउथ से पैसे देकर विवाह करने और दुल्हन के भाग जाने की घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है। मारवाड़ में विवाह करवाने वाले ऎसे गिरोह भी सक्रिय होने की संभावना है। इसी वर्ष बागरा थाने में दर्ज एक अन्य मामले में भी परिजनों द्वारा लड़की का दो जगह विवाह करवाना प्रकाश में आया था। कुछ माह पूर्व जालोर में भी दक्षिण से विवाह करके आई एक वधु के गहनों व रूपए समेत फरार होने की घटना चर्चा का विषय रही। पीडित परिवार की ओर से लोक-लाज के भय से मामला दर्ज नहीं करवाया गया।

यह दर्ज हुए मामले
नवम्बर माह की शुरूआत में ही ऎसे चार मामले दर्ज हुए हैं। झाब थाने में दर्ज मामले के मुताबिक भूतेल निवासी चेलाराम पुत्र मसराराम रावणा राजपूत ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी कड़ी गुजरात निवासी वरजुदेवी पुत्री लालाभाई गहने और रूपयों समेत पीहर जाने के बाद आज तक नहीं लौटी। इसी थाने में हेमागुड़ा निवासी लाखा पुत्र करनाराम ओड ने मामला दर्ज करवाया कि विजयगढ़ थराद निवासी मंजू पुत्री विरदचंद ओड से उसका विवाह हुआ था।
कुछ दिनों पूर्व उसकी पत्नी घर से नकद रूपए व गहने लेकर पीहर गई थी, जहां उसके पिता ने उसका अन्यत्र विवाह करवा दिया गया। सांचौर थाने में दर्ज मामलों के मुताबिक लूणियासर निवासी बलवंता पुत्र हरीराम वागरी ने रिपोर्ट पेश कर बताया कि उसका विवाह सुखीदेवी के साथ व उसके भाई जगताराम की शादी तारादेवी के साथ गुजरात के रमाणा गांव मे हुई। करीब डेढ़ माह पूर्व वे दोनों अपने भाईयों के शादी में जाने का कहकर गहने व नगद रूपए लेकर गई थी और आज तक नहीं लौटी। इन सभी प्रार्थियों का आरोप है कि उनके ससुराल वालों ने उनकी पत्नियों का अन्यत्र विवाह करवा दिया है। पुलिस इन मामलों की जांच कर रही है।

cott by SP Jalore
कुछ समाजों में लड़कियों की कमी इसका बड़ा कारण है। लोग अक्सर विवाह के नाम पर धोखे में रह जाते हैं। हरियाणा समेत अन्य कई राज्यों में इस तरह का विवाह करवाने वाला गिरोह सक्रिय है। जिले में ऎसे गिरोह की सक्रियता की जानकारी नहीं है। यदि कोई है भी तो ये बाहर के लोग हैं। हम मामलों की जांच करवाएंगे। यह भी सच है कि लोकलाज के डर से लोग अक्सर मुकदमा दर्ज नहीं करवाते।
-लक्ष्मीनारायण मीणा, पुलिस अधीक्षक, जालोर


published in jalore addition 11th Nov 2009
प्रदीपसिंह बीदावत

Tuesday, October 27, 2009

सर्किट हाउस के किचन पर ताला

जालोर। सर्किट हाउस में फर्जीवाड़े के बाद प्रबंधन की हद तो देखिए कि किचन पर ताला लगाकर नोटिस चस्पा कर दिया। पिछले कई सालों से हो रहे खर्च को लेकर जिला कोषाघिकारी ने आपत्ति जताई तो पूरा प्रशासन सर्किट हाउस प्रबंधन की पैरवी में उतर आया। इसी कारण जांच कछुआ चाल से चल रही है।

जिला कोषागार कार्यालय में स्वीकृति के लिए आए अनाप-शनाप खर्च के बिलों पर जिला कोषाघिकारी ने रोक लगा दी थी। इस कारण सर्किट हाउस प्रबंधन ने पांच दिन से किचन पर ताला जड़ रखा है। साथ ही नोटिस भी चस्पा किया कि जिला कोषाघिकारी की हठधर्मिता से किचन बंद किया जाता है। तीन दिन पूर्व संभागीय आयुक्त संदीप वर्मा के आने पर यह बोर्ड हटाया और उनके जाने पर फिर चिपका दिया।

पांच दिन से नहीं मिल रहा खाना
सर्किट हाउस में ठहरे प्रशासनिक अघिकारियों को पिछले पांच दिन से खाना बाहर खाना पड़ रहा है। जालोर में अच्छे होटलों के अभाव में कई अघिकारी किसी अन्य अघिकारी के यहां मेहमान बने हैं।

अघिकारियों की शह...
जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अघिकारी सुनीलकांत गौतम का सरकारी आवास ईयरमार्क श्रेणी होने के बावजूद तालाबंद है। जानकारी के मुताबिक वे पिछले सात माह से सर्किट हाउस के कमरा नंबर तीन में डेरा डाले हुए हैं, जबकि सर्किट हाउस में तीन दिन से अघिक रहने का प्रावधान नहीं है।


सर्किट हाउस का घोटाला कोई बड़ा मुद्दा नहीं इसलिए आप तो इस इश्यू को छोडिए। मैनेजर की गलती भी नहीं है। वाकई बिल रूके हुए थे जो मैंने पास करने के आदेश दिए हैं। किचन में काम प्रारंभ हो जाएगा।
- केवल कुमार गुप्ता, जिला कलक्टर, जालोर

बिलों में गंभीर अनियमितताएं मिली थी। जांच के आधार पर लेखा विभाग राजस्थान से बिल रोकने के निर्देश मिले थे। इसलिए बिल रोक दिए थे। अभी कलक्टर साहब ने बिल पास करने के आदेश दिए हैं।
- देवीलाल माली, जिला कोषाघिकारी, जालोर

Friday, October 2, 2009

सर्किट हाउस में फर्जीवाड़ा !

प्रदीपसिंह बीदावत
जालोर। महंगाई के दौर में कोई मेहमान दिन में दस किलो अनाज खा जाए तो मेहमान को भगवान का दर्जा देना मुश्किल हो जाएगा। एक मेहमान को दिन में दस किलो भोजन खिलाने का कारनामा जालोर सर्किट हाउस के कार्मिकों ने कर दिखाया है।
जिला प्रशासन ने सर्किट हाउस के प्रबंधक राजेन्द्र प्रसाद के खिलाफ बड़े पैमाने पर घोटालों की शिकायत उच्च अघिकारियों को भिजवाई है। जिला प्रशासन स्थानीय उपखंड अघिकारी से मामले की जांच भी करवा रहा है।
आंकड़ों के अनुसार जालोर सर्किट हाउस में प्रति व्यक्ति आगन्तुक का बिल करीब आठ सौ रूपए आता है। इनमें स्टाफ की तनख्वाह, लाइट, पानी और टेलीफोन का खर्चा अलग है। वहीं यहां प्रति व्यक्ति द्वारा एक दिन में करीब दस किलो भोजन भी किया जाता है। सर्किट हाउस की खाद्य सामग्री उपभोक्ता भंडार से खरीदने के नियम होने के बावजूद एक निजी किराने की दुकान से खरीदी गई है। पिछले एक साल में सर्किट हाउस ने लगभग ढाई लाख रूपए की खाद्य सामग्री क्रय की है।

बदल गए कूलर-पंखे
सर्किट हाउस में लगे पंखे और कूलर रिपेयरिंग के नाम पर पूरे ही बदल दिए गए। यहां 9 कूलरों की तीन माह से कम समय में इतनी बार रिपेयरिंग हुई कि उसमें मौजूद सारा सामान बदल गया। ऎसे में सारे कूलर नए हो गए। इसी तरह वाटर कूलर, कलर टी.वी., इमरजेंसी लाइट, सीलिंग फैन और गीÊार समेत अन्य इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के पार्ट बदलने के बिल पेश किए गए हैं।

हास्यास्पद लगता है
प्रबंधक द्वारा पेश किए गए अम्बिका इलेक्ट्रॉनिक के बिलों की स्थिति का अध्ययन करें तो हंसी छूटती है। छह दिनों के बीच केवल सर्किट हाउस के नाम ही क्रमानुसार बिल कटे हैं। 24 जुलाई को बिल संख्या 4360 व बिल संख्या 4354 की तिथि 31 जुलाई होना भी घोटाले की ओर संकेत करता है।

ऎसे होता है घोटाला
बिल प्रस्तुत करने के लफड़े से बचने के लिए सर्किट हाउस से कोष कार्यालय में आने वाले वाउचर 999 रूपए से अघिक राशि के नहीं होते। इसी तरह निविदा प्रक्रिया से बचने के लिए नए सामान की खरीद भी तीन हजार रूपए से अघिक की नहीं होती। नियमों के विरूद्ध किराने के सामान की खरीद उपभोक्ता भंडार के बजाए एक निजी दुकान से होती है।

इस मामले में जांच चल रही है। उसमें मामला साफ हो जाएगा। अपना क्या है यहां से ट्रांसफर हो जाएगा तो कहीं और चले जाएंगे। - राजेन्द्र प्रसाद, प्रबंधक, सर्किट हाउस, जालोर

अभी मेरा ट्रांसफर हो गया है। आप नए आने वाले अघिकारी से इस संबंध में पूछें तो ठीक रहेगा।
- इन्द्रसिंह जाट, जांच अघिकारी, सर्किट हाउस प्रकरण

श्राद्ध की थाली पर महंगाई की मार

- प्रदीपसिंह बीदावत

एक जमाना था जब श्राद्धपक्ष में पंडितजी के पेट का खास ध्यान रखने के लिए यजमान मालपुए, खीर और हलवे समेत कई मीठे व्यंजन मनोयोग से तैयार करवाते थे। अब स्थिति ऎसी है कि मीठे के नाम पर शक्कर के भाव सुनते ही गुड़ के चूरमे से काम चलाना पड़ रहा है।

पितृ तर्पण के पखवाड़े के नाम से मशहूर श्राद्ध पक्ष भी महंगाई की मार से अछूता नहीं रहा। कहना गलत नहीं होगा कि बढ़ती महंगाई के कारण श्राद्ध की खीर इन दिनों पंडितों को फीकी लग रही है। कई यजमान तो महंगाई को देखकर पंडितों से खर्च को उनकी जेब के अनुसार एडजस्ट करने की गुजारिश भी कर रहे हैं।

फैमिली से थाली तक
किसी समय श्राद्ध के मौके पर भोज के लिए पंडितजी का पूरा परिवार आमंत्रित होता था, लेकिन अब स्थिति यह है कि परिवार से मात्र एक सदस्य को जीमण के लिए न्यौता आता है। परिवार के सदस्यों के लिए अलग-अलग जगह से न्यौता आने के कारण यजमानों के लिए पंडितजी की "डेट" की समस्या भी खत्म हो चली है। कई जगह तो यजमान की ओर से थाली और दक्षिणा घर पर ही भिजवाई जाने लगी है।

कई शॉर्टकट भी निकले
महंगाई के चलते श्राद्ध के मौके पर ग्यारह और इक्कीस पंडितों का ब्राह्मण भोज तो मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बस के बाहर हो चुका है। कई परिवार तो घर पर भोजन तैयार करवाने की बजाए होटल से पैकिंग खाना भी मंगवा रहे हैं। इसी तरह तर्पण के दौरान पूर्वजों के नाम मावा चढ़ाने का शॉर्टकट भी यजमानों ने निकाल लिया है।

कहानी बना कमर तक पानी
पितरों का तर्पण करते समय कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अघ्र्य देने की परम्परा भी पानी के अभाव में छटपटा रही है। जिले के लगभग सभी प्रमुख जलस्त्रोत सूख चुके हैं। ऎसे में परम्परानुसार अघ्र्य कहां दिया जाए इस बात को लेकर लोग पशोपेश में रहते हैं। कई लोग तो लोटे के माध्यम से जल चढ़ाकर इतिश्री कर लेते हैं तो कई स्वीमिंग पूल का सहारा भी लेते हैं। पंडित विक्रम कुमार ने बताया कि इस समस्या के चलते उनको स्वीमिंग पूल में तर्पण करना पड़ा।

कुछ ऎसे हैं भाव
पिछले वर्ष श्राद्ध के समय शक्कर 16 रूपए किलो थी, अब 34 रूपए किलो है। इसी तरह दाल के भाव भी करीब ढाई गुना बढ़ चुके हैं। वहीं दूध और चावल की रेट भी खासी बढ़ी है।

एक-दो जगह गया था। पहले वाला मजा नहीं रहा। महंगाई की वजह से श्राद्ध पक्ष में यजमानों की जेब पर भार तो पड़ ही रहा है। वे अपने हिसाब से श्राद्ध का खर्च एडजस्ट करने की गुजारिश भी करते हैं।"
- पंडित विजय व्यास, अध्यक्ष श्रीमाली नवयुवक मंडल, जालोर

श्राद्ध का खर्च पिछले वर्ष के मुकाबले दोगुना हो गया है। पैसे वाले लोग तो जैसा कहा जाता है वैसा खर्च करते हैं, लेकिन विघिपूर्वक श्राद्ध करना गरीब परिवारों के तो बूते के बाहर की बात हो चली है।"
- अशोक कुमार दवे, जालोर

Friday, May 22, 2009

धनुष किसने तोड़ा



एक दिन सरपंच साहब को जाने क्या सूझी कि चल पड़े स्कूल की ओर। यह जानने कि गांव के बच्चों का आईक्यू कैसा'क है। स्कूल पहुंचे तो एक भी अध्यापक कक्षा में नहीं। घंटी के पास उनींदे से बैठे चपरासी से जब पूछा सारे मास्टर कहां गए तो पता चला कि पशुगणना में ड्यूटी लगाने के विरोध में कलेक्टरजी को ज्ञापन देने शहर गए हैं। सरपंचजी ने सातवीं कक्षा के एक बच्चे से पूछा "बताओ शिव का धनुष किसने तोड़ा।" जवाब आया " सरपंचसा! कक्षा में सबसे सीधा छात्र मैं हूं, मैंने तो नहीं तोड़ा। हां चिंटू सबसे बदमाश है, उसी ने तोड़ा होगा। वह आज छुट्टी पर भी है। शायद धनुष टूट जाने के डर से नहीं आया हो।" सरपंचजी ने माथा पीट लिया और वापस लौट गए। शिक्षक लौटे तो चपरासी बोला "सरपंचजी आए थे और बच्चों को कुछ पूछ रहे थे और गए भी भनभनाते हुए हैं।" प्रधानाध्यापक महोदय का पानी पतला हुआ। कक्षा में आए और पूछा "सरपंचजी क्या कह रहे थे।" बच्चों ने सारी बात बता दी। अब प्रधानाध्यापकजी ने बच्चों से पूछा "बच्चों किसी से गलती से धनुष टूट गया तो कोई बात नहीं। केवल यह बता दो धनुष तोड़ा किसने।" बच्चों ने तोड़ा हो तो बोलें। खामोशी देखकर तुरन्त अध्यापकों की बैठक बुलाई और कहा "देखो! शिवजी का धनुष किसी ने तोड़ दिया है और शिवजी कौन है यह भी हमें नहीं मालूम। उनकी शायद ऊपर तक पहुंच हो। पीटीआईजी आप इस मामले की जांच कर कल तक रिपोर्ट दीजिए।" शारीरिक शिक्षक महोदय ने साम, दाम, दंड, भेद आजमाए पर पता नहीं लगा पाए। प्रधानाध्यापकजी को चिंतातुर देख विद्यालय के बाबू बोले "साहब मैं तो कहता हूं कि जिला शिक्षा अधिकारी को पत्र लिखकर मामले से अवगत तो करवा ही दिया जाना चाहिए। नहीं तो बाद में परेशानी खड़ी हो जाएगी। शायद शिवजी आलाकमान तक बात ले जाएं और अपन को ऐसे गांव में नौकरी करनी पड़े जहां बिजली और बस भी मर्जी से आती हो।" प्रधानाध्यापकजी ने डीईओ को पत्र लिखा "महोदय किसी ने शिवजी का धनुष तोड़ दिया है। हम अपने स्तर पर पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं और आपके कानों तक बात डलवा रहे हैं।" तीन दिन बाद जवाब मिला। "प्रधानाध्यापकजी! इस बात से हमें कोई लेना देना नहीं कि धनुष किसने तोड़ा। हां याद रहे यदि सरपंच की ऊपर तक पहुंच है और कोई लफडा हुआ तो धनुष के पैसे आपकी पगार में से लिए जाएंगे।"

आज के एकलव्य का अंगूठा


गली-खोरियां खुल रहीं शिक्षा की दुकान, बैठ सुज्ञानी की जगह अज्ञानी दे ज्ञान।

अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक सितंबर में शिक्षक दिवस निकल गया। शिक्षक दिवस कलियुग के गुरुजनों की वंदना का दिन है। सतयुग से द्वापर तक गुरु पूर्णिमा गुरुजनों का दिन रहा, जिस पर उनकी पूरी पंचायती चलती थी। जो गुरुदक्षिणा मांग ली, शिष्य को देनी ही पड़ती थी। चलिए द्वापर के किरदारों को कलियुग में लाते हैं। अर्जुन के पिता राशन के डीलर और एकलव्य पिछड़ी जाति का। गुरुजी एकलव्य को एडमिशन नहीं देना चाहते थे पर एकलव्य आरक्षण का लाभ लेकर गले पड़ ही गया। मरते बेचारे क्या न करते और एकलव्य को पढ़ाना प्रारंभ कर दिया। मेधावी होने के बावजूद गुरुजी की कारस्तानी से एकलव्य हमेशा पिछड़ जाता। अर्जुन नित्यप्रति गुरुजी के वहां राशन का केरोसीन, चावल, शक्कर और गेहूं पहुंचाता और गुरुजी नंबरों की मेहरबानी रखते। इसी तरह दोनों दसवीं में आ गए। एकलव्य बोला "गुरुजी अबके तो बोर्ड है आप अर्धवार्षिक के दश प्रतिशत के अलावा कुछ नहीं कर पाएंगे और तेरा क्या होगा रे अर्जुन! "
गुरुजी टेंशन में कहीं अर्जुन न पिछड़ जाए इसलिए गुरु ने अब चाणक्य नीति अपनाई। अर्जुन के साथ-साथ एकलव्य को ट्यूशन पर बुलाना शुरू कर दिया वो भी मुफ्त ! एकबारगी तो एकलव्य भी चक्कर खा गया कि ये क्या हो गया। परीक्षा के समय विद्यालय के अंतिम दिन दोनों को बुलाया और कहा "आज आपका अंतिम दिन है। मुझे गुरुदक्षिणा चाहिए।" अर्जुन ने कहा "गुरुदेव जब तक आपका ट्रांसफर दूसरी जगह नहीं हो जाता राशन का सामान पहुंचाता रहूंगा।" अब एकलव्य की बारी थी बोला "मैं तो एकलव्य ठहरा जो मांगेंगे वह दूंगा।"
गुरु ने द्वापर का वार कलियुग में दुबारा किया और कहा "दाहिने हाथ का अंगूठा चाहिए।" एकलव्य ने बिना दूसरा शब्द बोले दाहिने हाथ का अंगूठा समीप पड़े पत्थर से कुचल लिया। गुरु की बांछे खिल गई। अर्जुन को सिरमौर रखने का सपना जो पूरा हो रहा था। पनीली हो चुकी आंखों के बीच एकलव्य बोला "गुरुदेव आप भूल गए। यह द्वापर नहीं कलियुग है। मैं तो नहीं बदला पर आपकी दृष्टि बदल गई। मेरे लिए इस युग में बड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि द्वापर में मैं दाहिने हाथ से तीर चलाता था, लेकिन कलियुग में बाएं हाथ से लिखता हूं। इसलिए आप मुस्कुराहट को थोड़ा कम कर लीजिए।"

Thursday, May 21, 2009

वीरमदेव चौकी से


मैं वीरमदेव चौकी। वीर वीरमदेव द्वारा राज्य पर नज़र रखने के उद्देश्य से बनवाई गई, लेकिन उसके बाद सदा उपेक्षित रही। मैं क्या सारा दुर्ग ही तो उपेक्षित है। दुर्ग को सुधारने की बात आती है तो कई अधिकारी और राजनीति सूरमा के बलिदान दिवस पर यहां आते हैं, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि केवल दुर्ग को जानने और सहेजने के लिहाज से कोई आए तो कुछ कहने का मन हो गया। स्वर्णगिरी राजस्थान के श्रेष्ठ गिरी दुर्गों से एक है ऐसा दुर्ग में प्रवेश करते ही लिखा है, लेकिन पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित दुर्ग सुरक्षित नहीं है।
दुर्ग की टूटती दीवारें, असामाजिक तत्वों द्वारा नुकसान पहुंचाई जा रही संपदा और राजनैतिक-प्रशासनिक उदासीनता का शिकार स्वर्णगिरी अपने अस्तित्व के लिए न्याय मांगता है।जालोर दुर्ग में प्रवेश करते समय पुरातत्व विभाग की ओर से लिखवाए गए सूचना के मुताबिक हालांकि दुर्ग पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित तो है, लेकिन देखा जाए तो इसे सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। एक ओर कभी दुर्ग तक अपना नाम लाने के लिए खिलजी को महीनों घेरा डालना पड़ा वहीं दूसरी ओर आज किले की दीवारों कई मनचलों ने कोयलों से ही नाम लिख दिए हैं। उपेक्षित धरोहरों में किले पर स्थित शिव मंदिर भी है।
इतिहास के मुताबिक यहां का शिवलिंग सोमनाथ का एक हिस्सा है, लेकिन उसके साथ भी प्रशासन और राजनीति ने कभी न्याय करने की कोशिशभर नहीं की। वहीं जौहर स्थल, झालरा बावड़ी, दहिया की पोल, कीर्ति स्तंभ और जैन मंदिर ऐसे स्थान है, जिन्हें देखकर पर्यटक ठिठककर रह जाए, लेकिन उन्हें यह बताए कौन? इन सबको देखकर क्या नहीं लगता कि अपने अंदर इतिहास के इन क्षत-विक्षत भग्नावशेषों को स्वर्णगिरी दुर्ग में ही उसकी उपेक्षित और मसोसी हुई धड़कनें सिमटी हुई नजर आती हैं। इतिहास का ज़र्रा-ज़र्रा, इस माटी का कण-कण और समय पट्ट का धागा-धागा यह कहता है कि इस दुर्ग के पत्थर कभी बोलते थे।


यहां आने वाले हर राहगीर से पत्थर आह्वान करते नजर आते हैं कि यदि मनुष्य की भावनाओं के जौहरी हो तो आकर पहचानो कि उसके पत्थर बड़े कि कारीगर। मेरा आह्वान इतना है कि हर बार राजनैतिक कथन होते हैं और इस बार प्रशासनिक प्रयास की उम्मीद है इसमें जालोर का प्रत्येक नागरिक अपना योगदान दें। बहुत कुछ कहना चाहा है, लेकिन फिर भी कुछ रह गया। शायद ये पंक्तियां पूरा कर देंगी।
सुनने की मोहलत मिले तो आवाज है पत्थरों में
कहीं उजड़ी हुईं बस्तियों से आबादियां बोलती हैं
- प्रदीपसिंह बीदावत
१५ जनवरी २००८ को लिखा

Thursday, April 16, 2009

राम बजावै हाजरी रावण रे दरबार

पिछले साल देश पर कई धमाके हुए। इस साल पाकिस्तान में हो रहे हैं। आखिर धर्म का नाम लेकर किए जा रहे धमाकों की मूल वज़ह क्या है। धमाका होता है। देश हिलता है और हिलकर फिर शांत हो जाता है। धर्म के नाम पर किया जा रहा जेहाद कहां तक ले जाएगा। समझ नहीं आता।


कहते हैं धर्म ईश्वर  से जुड़ाव का सरल माध्यम है। धर्म के सहारे अदना इंसान ईश्वर  की परमसत्ता को महसूस करता है, उससे जुड़ाव  की अनुभूति करता है। धर्म और दर्शन दो अलग-अलग योजक कड़ियां हैं, जो व्यक्ति को परमात्मा से जोड़ती है। धर्म ईश्वर  से तथ्यों की ओर बढ़ता है और दर्शन तथ्यों से ईश्वर की ओर। धार्मिक भाव, क्रियाएं और विचार सामाजिक समानता के समरूप होते हैं। कइयों का यह कहना है कि यदि धर्म इस दुनिया में नहीं होता तो कोई किसी का विरोध नहीं करता। सब प्रेम भाव से रहते। वैर की कहीं गुंजाइश मात्र भी नहीं रहती। थोड़ी देर के लिए भी मानस पर धर्म का चित्र उकेरने की कोशिश की जाए तो ये सारी बातें बेमानी प्रतीत होती हैं। प्रकृति के नियमों के अनुसार विरोध ही अस्तित्व का कारण है। यदि प्रकाश और अंधकार, सत्य और असत्य, ज्ञान और अज्ञान, जीत और हार के बीच विरोध नहीं होता तो एक दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं जान पड़ता। माक्र्सवाद के जनक कार्ल माक्र्स के द्वंदात्मक सिद्धांत के मुताबिक एक दूसरे के बीच का द्वंद ही किसी तत्व के अस्तित्व की अवधारणा है। इसलिए व्यावहारिक रूप से भी देखा जाए तो धर्म का महžव सर्वाधिक है, जिस कारण समाज रुपी भवन खड़ा हो पाता है। रही बात विरोधाभासों की तो अपवाद सब जगह होते हैं। विडम्बना तब खड़ी हो जाती है, जब उन सूक्ष्म अपवादों को स्थूल आकार प्रदान करने की कोशिश की जाए। यह प्रयास उसी प्रकार है, जिस प्रकार चिंगारी को भीषण आग में बदलने के लिए हवा दी जाती है। कहा जाए तो आज के लोग मजहब और धर्म के नाम पर एक दूसरे को बांटने में लगे हैं। तुम तो मुस्लिम हो, अरे यह तो हिन्दू है, मैं सिख समुदाय से हूं। आई एम क्रिश्चियन जैसे शब्द आत्मा और परमात्मा के बीच की दूरी को बढ़ाते हैं। बांटने का प्रयास करते हैं। मजहब और धर्म का काम बांटना होता तो वह ईश्वर से भी नहीं जोड़ता। पर कुछ अपवाद कहे जाने वाले लोग अपने सूक्ष्म स्वार्थ के लिए समय के पहिए को रोकने की कोशिश करते हैं। हालांकि वे इसमे कितना सफल हो पाते हैं, यह उनकी मानसिकता पर निर्भर करता है, लेकिन समय रुकता नहीं है। धर्म और मजहब के नाम पर कभी मंदिर में हमला तो कभी मसजिद के आहते में विस्फोट करने, कुछ जिंदगियों को बेजान करने व कई परिवारों का आंगन बेनूर करने से उनके कौनसे उद्देश्य की पूर्ति होती है, यह तो शायद ईश्वर भी नहीं जानता, लेकिन यह तो तय है कि वे न तो हिंदु होते हैं और न मुस्लिम। न सिख होते हैं और न ही इसाई। उनका मजहब सिर्फ आतंक है। वे सिर्फ आतंकवादी है और उनके साथ बेरहमी के अलावा कोई सुलूक नहीं होना चाहिए। धर्म और मजहब के नाम पर इंसानियत के दामन पर दिए गए रक्त के दा$ग जाने कितनी बरसातों के बाद छुड़ाए जा सकेंगे, यह कोई नहीं कह सकता। इन हादसों के बाद नेताओं के एक दूसरों पर आरोपों और आतंकवादियों के खिलाफ सरकारी तंत्र की लाचारी को देखकर अपने रामजी तो राजस्थानी की इन चार लाइनों  के अलावा कुछ नहीं कह सकते, जो मेरी नहीं है।

मारग बैठी डोकरी किण सूं करे सवाल
धणी लगावै बोलियां बेटा हुया दलाल।
बैठी बिलखै जानकी, मुळकै पोहरेदार
राम बजावै हाजरी रावण रे दरबार

Friday, April 10, 2009

देखिए यह रिवाज है

देखिए यह रिवाज है
हमारे गरीब और महान भारत का
हैरान मत होइए
हमारी भारत सरकार के
46 मंत्रालयों के 1576 केंद्रीय अधिकारियों ने
विदेशों की यात्रा कर डाली
56 लाख 56 हज़ार 246 किलोमीटर
अर्थात इतने में आप पृथ्वी से चांद की
74 बार यात्रा कर सकते है
यात्रा में खर्च हुए 24458 दिन
1 अप्रैल 2005 से 30 अप्रैल 2008 •
यानि साढ़े तीन साल।
यात्रा में कुल खर्च
56 करोड़ 38 लाख तीन हज़ार तीन सौ रुपये
एक प्रश्न?

किसका था यह रुपया?
जवाब भारत सरकार का
अर्थात भारत की महान गरीब जनता का

तो...?
क्या सर! हिसाब-किताब में उलझ गए। मैं जानता हूं ऐसे आंकड़ों में ऐसा ही होता है। लेकिन ये यात्रा तो केवल अधिकारियों की है। नेताओं वाली का तो हिसाब भी नहीं है। अपन के पास। खाओ-पीओ ऐश करो, बस घाटे का बजट मत पेश करो का नारा बुलंद करने वाले नेता और इन अधिकारियों के लिए ऊपर वाले आंकड़ों से फर्क नहीं पड़ता। यहां तो ट्रेंड ही बन चुका है। सरकारी यात्रा करो और जेब भरो का ट्रेंड तो राजस्थान में भी चला। पैलेस ऑन व्हील्स की यात्रा में रेलवे के अधिकारी भी निरीक्षण के नाम पर नहीं चूके। हालांकि निरीक्षण का कोई सरकारी रिजल्ट नहीं निकला यह बात अलग है, लेकिन इन अधिकारियों के घरेलु बजट का सालभर का रिजल्ट अच्छा हो गया।
अगले नुक्कड़ की चर्चा में तो करारा निष्कर्ष निकला। चर्चा चल रही थी कि ये तो बिचारे यात्रा ही करके आए हैं। कई तो शहीदों
में कफन गए। करगिल में शायद इसीलिए एलओसी क्रॉस करने से मना किया था कि ज्यादा सैनिक शहीद होंगे तो कफन भी ज्यादा निकलेंगे और मुनाफा भी ज्यादा होगा। ऐसे में इन अधिकारियों का भ्रष्टाचार तो बहुत थोड़ा है। वहीं भ्रष्टाचार के सिरमौर कहे जाने वाले तेलगी का माल तो आज तक पता नहीं चला है कहां छुपाया हुआ है। अधिकारियों की बिचारों की बिसात ही क्या है।
वह नेता ही क्या जो सूटकेस भरके नहीं लेता। और तो और सरकारी अधिकारियों की तो पहचान भी ऊपरवाली इनकम से होती है। एक अधिकारी ने ईमानदारी दिखाने का प्रयास करते हुए नेताजी का भ्रष्टाचार खोलने की कोशिश की तो सरकार उसके पक्ष में खड़ी नजर आई। इसलिए आप तो बिल्कुल लोड मत लो हिन्दुस्तान की जनता का सार्वजनिक पैसा है।

तो प्यारे डाबर का च्यवनप्राश खाओ
खूब खाओ-खूब पीयो और पचाओ।
इसे खाकर सुखराम देश को खा गए।
नरसिम्हा बुढ़ापे में भी खूब पचा गए।
तो आप तो अभी खूब खा सकते हैं और पचा सकते हैं। खाओ-पीयो और खाने-पीने का कॉफिडेन्स बढ़ाओ। क्योंकि कई नकली डाक टिकट छाप-छापकर असली चुनावी टिकट ले आए और कुरसियों पर जा बैठे।

तभी तो काला दामन सफेद झक्क हो गया
और उजले सच का मुंह फक्क हो गया।
pradeep singh beedawat

Friday, April 3, 2009

एक पाती वीरम चौकी से

कहने को तो मैं एक सूरमा द्वारा कुछ प
त्थरों से बनवाई गई वह चौकी हूं, जहां से वह अपने राज्य पर नजर रखता था। यहीं से उसे आने वाले खतरे की खबर होती थी। कहा जाए तो मैं उसकी खबरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थान थी। पता नहीं क्यों आज काल की निर्दय शमां पर चढ़े उस मासूम परवाने के बलिदान दिवस के मौके एक खतरे की खबर तुम्हें देने का मन हो आया। मेरा तो आगाह करने का कर्तव्य ठहरा। इसलिए ये कुछ शब्द तुम तक पहुंच जाएं तो मैं तुम्हें खतरे से आगाह करने के अपने कर्तव्य की इतिश्री मानूंगी।समय की बेदर्द आंख का दर्दीला आंसू वह वीरम अपनी भावनाओं से परम्परा और कुल लज्जा को बड़ा मानता था। उसने भावना को सदैव कर्तव्य की दासी बनाकर रखा। विधर्मी के साथ विवाह अस्वीकार करने से मर्यादा उसे दुरगादास, महाराणा प्रताप और राव चन्द्रसेन जैसे वीरों की श्रेणी में रखती है, लेकिन खबर तो लीजिए कि आज जालोर क्या कर रहा है। उसके मुहाने कौनसे खतरे ने अपने पैर पसारे हैं। मर्यादित आचरण और कुल लज्जा को आज का जालोर क्या उतना ही महžव देता है, जितना उसके समय देता था। शायद नहीं, तभी तो यहां आए दिन लज्जाभंग के मामले बढ़ रहे हैं। मुझे याद है जब वह दिसावर (दिल्ली में खिलजी के दरबार) गया था तो बहुत सा नाम और इज्जत कमाकर लौटा था। अब आज का जालोर दिसावर से धन के साथ कौनसी बीमारी कमा ला रहा है। इस बीमारी को अपनाने के कारणों पर बिना किसी का नाम लिए नजर डालें तो सबसे ज्यादा कारण कुल पर आघात लगाकर ही लाई जा रही है। यह बीमारी घेर लेगी तो इज्जत तो अपने-आप चली जाएगी। बाकी बची जान। जिसका भी कोई ठिकाना नहीं कब सांसों की डोर टूट जाए। चार सौ का कुल घोषित आंकड़ा है जिले में, जिनके आगे मौत नाच रही है। अघोषित का पता नहीं। कहते हैं इसका उपचार नहीं है। इसका इलाज तो वीरम बहुत पहले बता गया। जो आज तक समझ में नहीं आया। सरकार व नेताओं की तोता रटन्त भाषाओं को छोड़कर कोई वीरम की भाषा में क्यों नहीं कहता कि मर्यादित आचरण के बिना इसके बढ़ते कदमों को थामना मुमकिन नहीं। संभल लो अन्यथा आने वाली पीढ़ियां कभी क्षमा नहीं करेगी। मेरा कर्तव्य तो खबर करने तक का था। उस वीर पुरुष के बलिदान दिवस पर इतना जरूर याद रखना कि वह मर्यादा पर बलिदान हुआ था, तब लोग उसको याद कर रहे हैं। हमारा बलिदान यदि यह बीमारी लेगी तो आने वाली पीढ़ियां आपके नाम पर किस क्वालिटी का चूना लगाएगी आप सोच लीजिए।हां एक बात ओर मुझ पर मूर्ति लगवाने का वायदा करते नेताओं को भी चार साल बीतने को आए। एक वादा आज भी हुआ। ये वादे कब पूरे हो न तो मुझे पता और शायद उन्हें। बदलते वक्त के दौर में सारे वादे समय पर पूरे हो जाए संभव नहीं लगता। उस वीर पुरुष की मूर्ति मुझ पर लगती तो मैं तो गौरवान्वित होउंगी ही, जालोर का गौरव भी निश्चित बढ़ेगा।
लेकिन सोचकर डर यह लगता है-

मिलता नहीं प्यार अदब, सलीका कहीं,
दिल सभी के यहां मतलबों के दुकां है।
ऐतबार करना मगर जरा संभल के
कब वादों से मुकर जाए ये जुबां हैं।।

Monday, March 30, 2009

जहर रा प्याला थूं पीवै तो परी मरै...




कल रात की बात है। भक्तिमती मीरां पर लिखित मीरां चरित पढ़ रहा था। मन के तारों को झंकृत करने वालासाहित्य उकेरा है सौभाग्यकुंवरीजी ने इस पुस्तक में। महावीरसिंहजी सरवड़ी और भगवानसिंहजी रोलसाहबसर से मुलाकात में उन्होंने इस पुस्तक की चर्चा की और कहा आंसू न निकल आए तो कहना। हालांकि इतना गहरा तो नहीं उतर पाया। जितना पढ़ा उस पर मनन किया और वर्तमान एक राष्ट्र सिरमौर(?) नारी के उद्गार सुने तो उंगलियां ये कॉलम लिखने से नहीं रुक पाईं।
मीरांजी के लिखे ये उद्गार मैडम पर सटीक उतरते हैं।
प्रेम दिवानी मीरां रो दरद न जाने कोय
वैसे ही राष्ट्र(?)प्रेम में आकंठ डूबी मैडम के मन की गति कौन जान सकता है। वैसे ही जैसे कोई एक अन्य मैडम की `मायां का पार पा सके।
एक पद में भक्तिमती मीरां के उदगार थे
मेरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।
जा के सिर मोर मुकट सोई मेरा पति होई॥

वहीं कुछ दिनों पूर्व अखबार के शीर्ष बयान थे।
मेरो तो `मनमोहनं दूसरो न कोई।
जा के सिर पगड़ी सोई मेरा प्रधानमंत्री होई॥

मीरां यह सोचकर विकल होती थी कि उसके मोहन का उसके प्रति अनुराग है नहीं। वहीं अब स्थिति उलट है। यहां `मनमोहनं` आधी रात में लोड ले लेते हैं कि मैडम के अनुराग में कहीं `जावणं तो नहीं लग रहा है।
ख्यात अर्थशास्त्री रहे `मनमोहन` को प्रधानमंत्री बनने के बाद तो दो और दो चार का कन्फर्मेशन मैडम से पूछकर करना पड़ता है। जिसके प्रति `मनमोहन` का इतना लगाव हो उसके मन में खटास कैसे आ सकती है और मैडम ने सहज मिले अविनाशी की तर्ज पर जाहिर भी कर दिया।
कई बार तो मुझे तो डर लगता है कि इस नेह से भीगे आधुनिक `मनमोहन` पांडा की तरह पगड़ी खुलकर चुनरी न बन जाए और वे कहीं भांगड़ा करते हुए इस आधुनिक मीरां के स्नेह से भीगकर `ओय होय मैं तो मखणा दरद दीवाणा। न गाने लगे।
दूसरी ओर एक बालक भड़काऊ भाषण के आरोपों की दिक्कत में फंसा हुआ है। मैडम की छुटकी बड़े पिताजी के छुटकू को गीता पढ़ने की सीख दे रही हैं। उनको खुद को पता नहीं कि गीता पढ़ने की नहीं जीवन में उतारने की वस्तु है। गीता पढ़ ली तो समझ आएगा कि जगत मिथ्या है। आपका कुनबा राम को तो मान नहीं रहा है कृष्ण को कबसे मानने लगा।
एक बात और सौभागकुंवरीजी की पुस्तक में है कि मीरां की खिलाफत में उनकी ननद, सास और विक्रमादित्य थे, जिन्होंने भçक्त से डिगाने का प्रयास किया। वैसे ही अब लालू, पासवान और मुलायम मैडम की खिलाफत में आन खड़े हुए हैं। चुनाव का तो महीनाभर रहा है। प्रधानमंत्री बनने के लिए पगड़ी होने की शर्त शायद वे समझ रहे हैं और इस महीनेभर में केश इतने लंबे हो नहीं सकते। कुल मिलाकर अबकी लोकसभा में जो थिएटर बन खड़ा हुआ है। खासा मजेदार होगा।
मीरा ने मनमोहन को पाने के लिए राज्य छोड़ा था। (वृंदावन जाने से पूर्व मीरां ने मेवाड़ का परित्याग कर दिया था।) वहीं यहां इन मैडम ने खुद राज्य का परित्याग तो कर दिया, लेकिन अपने मनमोहन को सौंप दिया। हालांकि इस बार मैडम ने राजसुख त्यागने की घोषणा तो कर दी, लेकिन देखते हैं कि वे राज अपने मनमोहन को दिला पाते हैं या नहीं। अपन तो दो लाइन घिसने और एक बटन दबाने के अलावा क्या कर सकते हैं। मारवाड़ी की दो पंक्तियां हैं।
वा मीरां नै थूं मीरकी
क्यूँ होड़ करे
वा पीअगी ज़हर रा प्याला
नै थूं पीवै तो परी मरै।

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