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Tuesday, October 25, 2011

जले दीप खुशहाली के


अकाल का मौसम होने के बावजूद चेहरे पर मुस्कराहट। यही जीवंतता है इस देश की। देशभर में दीपावली का त्योहार मनाया जा रहा है। नन्हे-नन्हे दीपक उजास का संदेश देते हुए तमस से लड़ने का आuान कर रहे हैं। दीपक प्रतीक है जीवंतता का। चैतन्यता का। कैसा जीवंत दर्शन है कि मिट्टी से बनने वाला दीपक अपने जीवन को जलकर सार्थक करता है। मिट्टी से दीपक बनने और मिट्टी में मिलने तक के सफर को जानें तो समझ आएगा कि दीपक अपना जीवन सहज में ही पूरा नहीं करता है। मिट्टी से उठाकर गधे पर लादा जाता है तो शर्म आती होगी। वहां से लाकर उसे कूटा जाता है तो पीड़ा होती होगी। पानी में गलाया जाता है तो वेदना होती होगी। चाक पर चलाते वक्त चक्कर आते होंगे। उतारते वक्त डोरे से काटकर मिट्टी से अलग कर दिया जाता है और एक सुंदर रूप मिलता है। इस पर रंग होता हैं तो आत्मश्लाघा का भाव भी आ सकता है, लेकिन तुरंत बाद इसे आग में तपाया जाता है और उसका रूप निखरता है। जन्म होता है एक दीपक का। इसके बाद मोलभाव और बिकने का दौर। अब साथियों से बिछुड़ने का विरह। खरीदकर घर लाया जाता है। गृहस्वामिनी द्वारा इन्हें धोने के बाद तेल और बाती से मुलाकात और फिर एक लौ के माध्यम से इसकी जवानी और जिंदगी दोनों जलते हैं। तेल पूरा होता है तो एक अंतिम भभक और जीवन समाप्त। सुबह उठाकर सड़क पर फेंक दिया जाता है कोई वाहन दीपक पर से गुजरता है और जीवन समाप्त। 

यह कहानी है एक दिए की। शर्म, पीड़ा, प्रताड़ना, आत्मश्लाघा और गौरव समेत सारे भावों को अपने में संजोकर जीने वाला दीपक अपने जीवन को जिस तरह पूरा करता है। उसी तरह एक इंसान के जीवन में भी ये क्षण और भाव आते हैं जब उसे पीड़ा, ताड़ना, शर्म, वेदना अथवा विरह महसूस करना पड़ता है।

इसलिए कहा है
देता रहे जीवन ज्योति तू कण-कण को जला के।
अस्तित्व मिटा के।
तूफान भी मचलेंगे हिलेगी शमां भी
बुझ जाएंगे दीपित दीप ओ छाएगी तमा भी।
किंचित न बुझे जलता ही रहे जीवन को जला के।
अस्तित्व मिटा के।

इसी दीपावली पर हम संकल्प लें इन्हीं दीपकों की तरह अवरोधों से लड़ने का। दीपक का निर्दोष उजाला हमारे जीवन चरित्र को इतना उज्ज्वल बनाए कि हम हर बार किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति से निकलें और हम अपना स्वधर्म निभाएं। हमारा यही स्वधर्म राष्ट्र को प्रगति के पथ पर अग्रसर करे और खुशहाली के दीप जलें।

अलग-अलग हैं दीप मगर सबका है एक उजाला,
सबके सब मिल काट रहे हैं अंधकार का जाला।
किसी एक के भी अंतर का स्नेह न चुकने पाए,
तम के आगे ज्योति पुंज का दीप न बुझने पाए॥

Wednesday, March 2, 2011

हम तकरार में, वे गालियों के सार में




खुश थे जब डाले झूठ-झूठ के ही हार गले में
आइना सच का दिखाया तो तकरार में आ गए

बिकने से बचाते रहे उनको अक्सर नीलामी में
कीमत लगाने हमारी वे खुद बाजार में आ गए

भूख अब हमारे घर के दरवाजे पर ही सोती है
आजादी के बाद आरक्षण के बुखार में आ गए

घुटनों के बल चला करते थे रोते-लडख़ड़ाते
‘खेल’ क्या हुए वे सरकारी कार में आ गए

कभी नारे-जयकारे खुद के लगवाते नहीं थकते
आज बात वतन की चली तो उतार में आ गए

पहले दो-चार नारे लगा जिताया था दूसरों को
खान-पम्प-ठेके मिले, फिर व्यापार में आ गए

भीख मांगने की अदावत कहें कि देश का नसीब
जम्हूरियत में सिर गिना अब सरकार में आ गए

चार कलम घसीटिए दोस्त क्या हुए जनाब के 
हुजूर के सिर के कीड़े भी अखबार में आ गए

कभी स्वागतम्, अब घर पे लिख प्रवेश निषेध
साहब के साथ-साथ कुत्ते भी दरबार में आ गए

तकनीक भी लगी इनके दामन उजले करने में
ब्लॉग-फेसबुक-ट्विटर के अशरार में आ गए

हमारी ही कहते रहे तो बनेंगे मुंह मियां मिट्ठू
उनकी क्या कहें वे गालियों के सार में आ गए


Tuesday, August 10, 2010

निराशा



(1)



खिलना चाहता था कहीं सुदूर व्योम में,



बनना चाहता था समिधा किसी होम में।



धूप में भी तो कभी नहीं वो हंस पाया


हवा ओ अंधेरे ने जो 'प्रदीप' बुझाया।।





(2)



थरथराता धुआं



जब मां मेरी बेरोजगारी पर आंसू बहाया करती है,



चुपके से अपनी ही ओढ़नी में आंखें छुपाकर।।



तब इक तीली की तरह ही जलती है उम्मीदें



तन्हा रह जाता है 'प्रदीप' जैसे थरथराता धुआं।।















(3)



बिन 'आका' वाली तेरी लेखनी













आंधी के दीए जितनी ही उम्मीद बचती है,



बिन 'आका' वाली तेरी लेखनी के लिए।



शायद स्याही ने भी छोड़ दिया है 'प्रदीप'



कागज़ों पर उजली सच्चाई बयां करना।।

Tuesday, July 27, 2010

मुझे क्या होना चाहिए?


मैं दर्द होता तो
आपकी आंखों से बहकर
अपना अस्तित्व समाप्त करना चाहता
उस खारे आंसू की तरह जो
देश दुनिया की फिक्र से दूर बच्चों की
आंखों से निश्चल बहा करता है।


मैं खुशी होता तो
आपकी मुस्कुराहट के रूप में
होठों पर बिखरना चाहता
उसी स्वच्छंद
रूप में जब कोई नन्हा शावक
मृगया कर लौटी शेरनी का मुंह चाटता है।


मैं संगीत होता तो
खनखनाकर बजना चाहता
किसी भिखारी के कटोरे में गिरने वाले
उस सिक्के की तरह जिसका कोर्पोरेट जगत
में तो कोई मोल नहीं, लेकिन उस बदहाल
कटोरे के मालिक के लिए बहुतेरा है।


मैं खामोशी होता तो
हमेशा दिखना चाहता कभी
उन नेताओं उशृंखल के चेहरों पर जो
शिक्षकों और उनकी बीवियों पर अश्लील कटाक्ष
करते वक्त भूल जाते हैं अपनी औकात।


मैं क्या हूं
शायद सवाल बहुत बड़ा है
और शब्दों का अस्तित्व थोड़ा।
अब आप थोड़ा सा बता दीजिए
मुझे क्या होना चाहिए।

Sunday, February 28, 2010

हैप्पी होली हैप्पी होली हैप्पी होली


अल सुबह सूरज ने आँख खोली
धरती के माथे कुंकुम  और रोली
भँवरे गायें तो कलियाँ भी बोली
ब्रज में घूमे रसिओं की टोली

अब आपके चेहरे पर भी तो
मीठी मुस्कराहट हिल डोली  तो
बोलो हैप्पी होली, हैप्पी होली

सभी ब्लॉगर बांधवों और पाठकों को होली की हार्दिक मंगलमयी शुभकामनायें

Friday, February 12, 2010

जग हित शिव का ज़हर पीना जरूरी है

 
लोग कहते हैं जिंदगी तो हुई मौत से बदतर
जीवन प्रतिमान तय करे वो मीना जरूरी है॥

शान ए अमीरी चाहे औरों को नहीं दिखे
गर फट जाए कपड़ा तो सीना जरूरी है॥

जख्म भले कितने भी दर्दभरे और गहरे
जीवन सार है यही कि सीना जरूरी है॥

नीन्द चाहिए शाम को चादर तान करके तो
दिनभर की मेहनत का पसीना जरूरी है॥

साफ लोग दिखते नहीं दुनियावी भीड़ में
गली में रहने वाला क्यों कमीना जरूरी है?

कब तलक चेतना यूँ ही तडफडाती रहेगी
अंधेरों को अब उजाले से हार खाना जरूरी हैं॥

अब स्याह दिनों सी झूठी श्रद्धा नहीं चाहिए
सच्ची इक शिवरात्रि मन जाना जरूरी हैं॥

चाहे पार्वतियां कंठ पकड़ बैठी रहें रात-दिन
जग हित शिव को ज़हर भी पीना जरूरी है॥

बेटों के ही हाथों लुट रही है मेरी मातृभूमि
वतन की फिक्र करें तो 'प्रदीप' जीना जरूरी हैं॥

सभी पाठकों और ब्लॉगर बन्धु बांधवों को शिवरात्रि की सुभकामनाएँ

Tuesday, February 9, 2010

चाहत...

 
सावन की सी बारिशों में नित भीगने की अब चाह कहाँ,
पुष्प खिले, धरा फले ओ भीगे कंठ इतना सा तो पानी हो

दुनिया जीतने का जज्बा, आसमां चीरने का भी जोश,
कहाँ जाता हैं जब नन्ही सी बेटी से हार खानी हो

ऑस्कर, बुकर और पुलित्ज़र जैसे तमगे किसे चाहिए,
जो सीधे दिल तक उतरे ऐसी मेरी कविता-कहानी हो

रचना यह किसकी? भले कहानी के पात्र हैं कौन?
कोई फरक नहीं पड़ता जब कहने वाली नानी हो

गीत ग़ज़ल छंदों का मौसम, चुका हुआ सा लगता हैं,
मन में ही रहें चाहतें, जब घर में बहन सयानी हो

जब बढ़े अँधेरा, घटे उजाला और चेतना की भी चाह,
कोई बधेतर आस नहीं, बस आँखों में ग्लानी हो

मंदिर बने या मस्जिद? यहाँ इस पचड़े में कौन पड़े,
एक पागल सा खुसरो चाहूं, इक मीरां दीवानी हो

मेरी माँ सी अनिंद्य सुन्दरी इस दुनियां में दूजी कौन,
धरी रहे उपमाएं सारी, जब 'प्रदीप' ने ये ठानी हो

Tuesday, February 2, 2010

अभिलाषा नहीं पुष्प होने की


अभिलाषा नहीं रही पुष्प होने की
चाह होती हैं बस घुटकर रोने की

क्यों चढ़ाया ही जाऊं उस शीश पर
जो सलामी में झुका खोटे सोने की

क्यों जाऊं उन केशों में वेणी बनकर
जहाँ बदबू सी हैं परफ्यूम होने की

उस शहादत के पथ की भी चाह नहीं
कोशिश हैं जहाँ स्याही से लहू धोने की

कुम्हलाता हूँ सफेदपोशों के गले में घुट-घुट
राजनीती हैं देश में बस जादू - टोने की

उजाले की चाह ओ चेतन स्वर कहाँ
सब कोशिश में हैं अँधेरा बोने की

आरज़ू हैं माँ के चरणों में लिपटकर रोऊँ
जुस्तजू हैं 'प्रदीप' वजूद खोने की 

Sunday, January 31, 2010

तेरी कीमत बता गए

हमें सोते हुए से वे कुछ यूँ जगा गए,
फूलों ने दिए थे ज़ख्म वे उन पर नमक लगा गए

कहते थे बहुत समझदार हैं छुटपन से,
बस लाड प्यार में उनके जरा कदम डगमगा गए

टूटा कईयों का झूठा यकीं तो कोई बात नहीं,
मुझसे लिया था उधर देकर मुझी को दगा गए

कहते थे जाने नहीं देंगे ज़माने से दूर हमें,
खुद जाकर शहर में हमारी बोली लगा गए

कहते दुनिया बड़ी जालिम और खुद बड़े भोले
पर कमीने थे वे मुझ को  सोते से जगा गए

बिकने से बचाया था कभी मैंने बाज़ार में
आज वे 'प्रदीप' तेरी कीमत बता गए

Friday, October 16, 2009

भूख के घर दीवाली नहीं मनती है


सीधी रस्सी पर चलती हुई
चलते चाकू से टलती हुई
नन्हे बदन सहित छोटे से
चक्कर में से निकलती हुई
उस बच्ची पर नजर टिकी
लगी नहीं हुई फिसलती हुई


बैठे पिता के आदेश पर
खड़ी मां के आवेश पर
उसके चंचल पैर बड़े सधे से
रस्सी पर चल रहे थे
जैसे दो नन्हे सितारे
आकाशगंगा पर टहल रहे थे


अचानक
हड़बड़ा गई
पिता की कठोर आवाज
कड़कड़ा गई
रस्सी पर लड़खड़ा गई
कहां मरी जा रही है
ढंग से चल नहीं तो
एक तमाचा पड़ेगा


(फिर खुद सोचा)
पूरी रस्सी पार नहीं तो
भूखे ही सोना पड़ेगा
वह फिर सीधी चलने लगी
लड़खड़ाई टांगे संभलने लगी
जैसे तैसे पूरी रस्सी हो गई पार
दर्शक वर्ग से तालियों की बौछार


आज का खेल हुआ खतम
जो टुकड़ों में आया वह
पैसा हुआ हजम।
रात को सोते वक्त नन्हे
भाई ने पूछ ही लिया
दीदी तुम आज लड़खड़ा क्यों गई थी
रस्सी पर एक बार हड़बड़ा क्यों गई थी
तुम तो मां से भी सधे कदमों से चलती हो
गिरने की स्थिति में भी संभलती हो
बापू भी कहते हैं यह है जब तक
रोटी का जुगाड़ होता रहेगा तब तक


बोली आज मेरी चाल गड़बड़ा गई थी
पहली बार मैं हड़बड़ा गई थी क्योंकि
मैंने आज रस्सी पर से ही देखा था
कुछ नन्हे बच्चों को अपनी मांओं के साथ
जो लाए थे दीवाली के ढेर से पटाखे
बैग लटकाए कुछ बच्चे जा रहे थे स्कूल
इसलिए एकबारगी मैं खेल को गई भूल
मेरी चाल लड़खड़ा गई
और पहली बार मैं हड़बड़ा गई


आज का खेल कहीं खराब होता
तो मां मुझे खूब मारती, मैं रोती
रोटी ना मिलने की याद ने संभाला
वरना मैं तो गिर गई होती।


अब भाई बोला
तुम इतने पैसे बापू को कमाकर देती हो
उसके बदले में अपने लिए दीवाली पर
कुछ पटाखे क्यों नहीं लेती हो।


वह बोली मुन्नु हम दीवाली नहीं मनाते
छोटा बोला हम क्यों नहीं मनाते हैं
जो हिन्दु नहीं है वे भी मनाते हैं
फिर हम भी तो हिन्दुओं में आते हैं


वह बोली हमारा धर्म क्या है जानेगा
हम हिन्दु मुस्लिम सिख इसाई कुछ नहीं
भूख से लड़ने का स्वर्धम निभाते हैं
शायद इसीलिए दीवाली नहीं मनाते हैं


रोशन दीवाली अंधियारे से लड़ती है
पर हम तो रोज दिवाले से लड़ते हैं
पैसा नहीं हो तो दीवाली नहीं होती
मेरे भाई हम भूख में रोज पेट ऐंठते हैं
जिन घरों में दिवाला विराजित हो
वहां दीवाली के देव कहां बैठते हैं?


जमाने में भूख और उजाले की कब बनती है
इसीलिए भूख के घर दीवाली नहीं मनती है

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