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Thursday, May 21, 2009

वीरमदेव चौकी से


मैं वीरमदेव चौकी। वीर वीरमदेव द्वारा राज्य पर नज़र रखने के उद्देश्य से बनवाई गई, लेकिन उसके बाद सदा उपेक्षित रही। मैं क्या सारा दुर्ग ही तो उपेक्षित है। दुर्ग को सुधारने की बात आती है तो कई अधिकारी और राजनीति सूरमा के बलिदान दिवस पर यहां आते हैं, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि केवल दुर्ग को जानने और सहेजने के लिहाज से कोई आए तो कुछ कहने का मन हो गया। स्वर्णगिरी राजस्थान के श्रेष्ठ गिरी दुर्गों से एक है ऐसा दुर्ग में प्रवेश करते ही लिखा है, लेकिन पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित दुर्ग सुरक्षित नहीं है।
दुर्ग की टूटती दीवारें, असामाजिक तत्वों द्वारा नुकसान पहुंचाई जा रही संपदा और राजनैतिक-प्रशासनिक उदासीनता का शिकार स्वर्णगिरी अपने अस्तित्व के लिए न्याय मांगता है।जालोर दुर्ग में प्रवेश करते समय पुरातत्व विभाग की ओर से लिखवाए गए सूचना के मुताबिक हालांकि दुर्ग पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित तो है, लेकिन देखा जाए तो इसे सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। एक ओर कभी दुर्ग तक अपना नाम लाने के लिए खिलजी को महीनों घेरा डालना पड़ा वहीं दूसरी ओर आज किले की दीवारों कई मनचलों ने कोयलों से ही नाम लिख दिए हैं। उपेक्षित धरोहरों में किले पर स्थित शिव मंदिर भी है।
इतिहास के मुताबिक यहां का शिवलिंग सोमनाथ का एक हिस्सा है, लेकिन उसके साथ भी प्रशासन और राजनीति ने कभी न्याय करने की कोशिशभर नहीं की। वहीं जौहर स्थल, झालरा बावड़ी, दहिया की पोल, कीर्ति स्तंभ और जैन मंदिर ऐसे स्थान है, जिन्हें देखकर पर्यटक ठिठककर रह जाए, लेकिन उन्हें यह बताए कौन? इन सबको देखकर क्या नहीं लगता कि अपने अंदर इतिहास के इन क्षत-विक्षत भग्नावशेषों को स्वर्णगिरी दुर्ग में ही उसकी उपेक्षित और मसोसी हुई धड़कनें सिमटी हुई नजर आती हैं। इतिहास का ज़र्रा-ज़र्रा, इस माटी का कण-कण और समय पट्ट का धागा-धागा यह कहता है कि इस दुर्ग के पत्थर कभी बोलते थे।


यहां आने वाले हर राहगीर से पत्थर आह्वान करते नजर आते हैं कि यदि मनुष्य की भावनाओं के जौहरी हो तो आकर पहचानो कि उसके पत्थर बड़े कि कारीगर। मेरा आह्वान इतना है कि हर बार राजनैतिक कथन होते हैं और इस बार प्रशासनिक प्रयास की उम्मीद है इसमें जालोर का प्रत्येक नागरिक अपना योगदान दें। बहुत कुछ कहना चाहा है, लेकिन फिर भी कुछ रह गया। शायद ये पंक्तियां पूरा कर देंगी।
सुनने की मोहलत मिले तो आवाज है पत्थरों में
कहीं उजड़ी हुईं बस्तियों से आबादियां बोलती हैं
- प्रदीपसिंह बीदावत
१५ जनवरी २००८ को लिखा

Friday, April 3, 2009

एक पाती वीरम चौकी से

कहने को तो मैं एक सूरमा द्वारा कुछ प
त्थरों से बनवाई गई वह चौकी हूं, जहां से वह अपने राज्य पर नजर रखता था। यहीं से उसे आने वाले खतरे की खबर होती थी। कहा जाए तो मैं उसकी खबरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थान थी। पता नहीं क्यों आज काल की निर्दय शमां पर चढ़े उस मासूम परवाने के बलिदान दिवस के मौके एक खतरे की खबर तुम्हें देने का मन हो आया। मेरा तो आगाह करने का कर्तव्य ठहरा। इसलिए ये कुछ शब्द तुम तक पहुंच जाएं तो मैं तुम्हें खतरे से आगाह करने के अपने कर्तव्य की इतिश्री मानूंगी।समय की बेदर्द आंख का दर्दीला आंसू वह वीरम अपनी भावनाओं से परम्परा और कुल लज्जा को बड़ा मानता था। उसने भावना को सदैव कर्तव्य की दासी बनाकर रखा। विधर्मी के साथ विवाह अस्वीकार करने से मर्यादा उसे दुरगादास, महाराणा प्रताप और राव चन्द्रसेन जैसे वीरों की श्रेणी में रखती है, लेकिन खबर तो लीजिए कि आज जालोर क्या कर रहा है। उसके मुहाने कौनसे खतरे ने अपने पैर पसारे हैं। मर्यादित आचरण और कुल लज्जा को आज का जालोर क्या उतना ही महžव देता है, जितना उसके समय देता था। शायद नहीं, तभी तो यहां आए दिन लज्जाभंग के मामले बढ़ रहे हैं। मुझे याद है जब वह दिसावर (दिल्ली में खिलजी के दरबार) गया था तो बहुत सा नाम और इज्जत कमाकर लौटा था। अब आज का जालोर दिसावर से धन के साथ कौनसी बीमारी कमा ला रहा है। इस बीमारी को अपनाने के कारणों पर बिना किसी का नाम लिए नजर डालें तो सबसे ज्यादा कारण कुल पर आघात लगाकर ही लाई जा रही है। यह बीमारी घेर लेगी तो इज्जत तो अपने-आप चली जाएगी। बाकी बची जान। जिसका भी कोई ठिकाना नहीं कब सांसों की डोर टूट जाए। चार सौ का कुल घोषित आंकड़ा है जिले में, जिनके आगे मौत नाच रही है। अघोषित का पता नहीं। कहते हैं इसका उपचार नहीं है। इसका इलाज तो वीरम बहुत पहले बता गया। जो आज तक समझ में नहीं आया। सरकार व नेताओं की तोता रटन्त भाषाओं को छोड़कर कोई वीरम की भाषा में क्यों नहीं कहता कि मर्यादित आचरण के बिना इसके बढ़ते कदमों को थामना मुमकिन नहीं। संभल लो अन्यथा आने वाली पीढ़ियां कभी क्षमा नहीं करेगी। मेरा कर्तव्य तो खबर करने तक का था। उस वीर पुरुष के बलिदान दिवस पर इतना जरूर याद रखना कि वह मर्यादा पर बलिदान हुआ था, तब लोग उसको याद कर रहे हैं। हमारा बलिदान यदि यह बीमारी लेगी तो आने वाली पीढ़ियां आपके नाम पर किस क्वालिटी का चूना लगाएगी आप सोच लीजिए।हां एक बात ओर मुझ पर मूर्ति लगवाने का वायदा करते नेताओं को भी चार साल बीतने को आए। एक वादा आज भी हुआ। ये वादे कब पूरे हो न तो मुझे पता और शायद उन्हें। बदलते वक्त के दौर में सारे वादे समय पर पूरे हो जाए संभव नहीं लगता। उस वीर पुरुष की मूर्ति मुझ पर लगती तो मैं तो गौरवान्वित होउंगी ही, जालोर का गौरव भी निश्चित बढ़ेगा।
लेकिन सोचकर डर यह लगता है-

मिलता नहीं प्यार अदब, सलीका कहीं,
दिल सभी के यहां मतलबों के दुकां है।
ऐतबार करना मगर जरा संभल के
कब वादों से मुकर जाए ये जुबां हैं।।

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