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Thursday, April 16, 2009

राम बजावै हाजरी रावण रे दरबार

पिछले साल देश पर कई धमाके हुए। इस साल पाकिस्तान में हो रहे हैं। आखिर धर्म का नाम लेकर किए जा रहे धमाकों की मूल वज़ह क्या है। धमाका होता है। देश हिलता है और हिलकर फिर शांत हो जाता है। धर्म के नाम पर किया जा रहा जेहाद कहां तक ले जाएगा। समझ नहीं आता।


कहते हैं धर्म ईश्वर  से जुड़ाव का सरल माध्यम है। धर्म के सहारे अदना इंसान ईश्वर  की परमसत्ता को महसूस करता है, उससे जुड़ाव  की अनुभूति करता है। धर्म और दर्शन दो अलग-अलग योजक कड़ियां हैं, जो व्यक्ति को परमात्मा से जोड़ती है। धर्म ईश्वर  से तथ्यों की ओर बढ़ता है और दर्शन तथ्यों से ईश्वर की ओर। धार्मिक भाव, क्रियाएं और विचार सामाजिक समानता के समरूप होते हैं। कइयों का यह कहना है कि यदि धर्म इस दुनिया में नहीं होता तो कोई किसी का विरोध नहीं करता। सब प्रेम भाव से रहते। वैर की कहीं गुंजाइश मात्र भी नहीं रहती। थोड़ी देर के लिए भी मानस पर धर्म का चित्र उकेरने की कोशिश की जाए तो ये सारी बातें बेमानी प्रतीत होती हैं। प्रकृति के नियमों के अनुसार विरोध ही अस्तित्व का कारण है। यदि प्रकाश और अंधकार, सत्य और असत्य, ज्ञान और अज्ञान, जीत और हार के बीच विरोध नहीं होता तो एक दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं जान पड़ता। माक्र्सवाद के जनक कार्ल माक्र्स के द्वंदात्मक सिद्धांत के मुताबिक एक दूसरे के बीच का द्वंद ही किसी तत्व के अस्तित्व की अवधारणा है। इसलिए व्यावहारिक रूप से भी देखा जाए तो धर्म का महžव सर्वाधिक है, जिस कारण समाज रुपी भवन खड़ा हो पाता है। रही बात विरोधाभासों की तो अपवाद सब जगह होते हैं। विडम्बना तब खड़ी हो जाती है, जब उन सूक्ष्म अपवादों को स्थूल आकार प्रदान करने की कोशिश की जाए। यह प्रयास उसी प्रकार है, जिस प्रकार चिंगारी को भीषण आग में बदलने के लिए हवा दी जाती है। कहा जाए तो आज के लोग मजहब और धर्म के नाम पर एक दूसरे को बांटने में लगे हैं। तुम तो मुस्लिम हो, अरे यह तो हिन्दू है, मैं सिख समुदाय से हूं। आई एम क्रिश्चियन जैसे शब्द आत्मा और परमात्मा के बीच की दूरी को बढ़ाते हैं। बांटने का प्रयास करते हैं। मजहब और धर्म का काम बांटना होता तो वह ईश्वर से भी नहीं जोड़ता। पर कुछ अपवाद कहे जाने वाले लोग अपने सूक्ष्म स्वार्थ के लिए समय के पहिए को रोकने की कोशिश करते हैं। हालांकि वे इसमे कितना सफल हो पाते हैं, यह उनकी मानसिकता पर निर्भर करता है, लेकिन समय रुकता नहीं है। धर्म और मजहब के नाम पर कभी मंदिर में हमला तो कभी मसजिद के आहते में विस्फोट करने, कुछ जिंदगियों को बेजान करने व कई परिवारों का आंगन बेनूर करने से उनके कौनसे उद्देश्य की पूर्ति होती है, यह तो शायद ईश्वर भी नहीं जानता, लेकिन यह तो तय है कि वे न तो हिंदु होते हैं और न मुस्लिम। न सिख होते हैं और न ही इसाई। उनका मजहब सिर्फ आतंक है। वे सिर्फ आतंकवादी है और उनके साथ बेरहमी के अलावा कोई सुलूक नहीं होना चाहिए। धर्म और मजहब के नाम पर इंसानियत के दामन पर दिए गए रक्त के दा$ग जाने कितनी बरसातों के बाद छुड़ाए जा सकेंगे, यह कोई नहीं कह सकता। इन हादसों के बाद नेताओं के एक दूसरों पर आरोपों और आतंकवादियों के खिलाफ सरकारी तंत्र की लाचारी को देखकर अपने रामजी तो राजस्थानी की इन चार लाइनों  के अलावा कुछ नहीं कह सकते, जो मेरी नहीं है।

मारग बैठी डोकरी किण सूं करे सवाल
धणी लगावै बोलियां बेटा हुया दलाल।
बैठी बिलखै जानकी, मुळकै पोहरेदार
राम बजावै हाजरी रावण रे दरबार

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