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Sunday, May 8, 2016

मदर्स डे और मित्र प्रशांत श्रोत्रीय की कलम


मैं सुबह से देख ही रहा था - तमाम आये हुए संदेशों को ,वाट्सअप और फेसबुक पर -
तमाम दूसरे लोगों और समूहों को फॉरवर्ड कर हम समारोहपूर्वक मदर्स डे मना रहे
थे। ये हमारे फॉरवर्ड होने की निशानी भी कही जा सकती है। पर ऐसा करने में कोई
बुराई भी नहीं है। -- यहाँ  मेरा सवाल दूसरा है।  माँ के प्रति श्रद्धा व्यक्त
करने के लिए हमें ' दिवस विशेष ' की आवश्यकता कब से पड़ने लग गयी ? -- और अगर
पड़ने लग गयी है तो मान लीजिए , हमने माँ की ममता और प्यार को कमतर आंकना शुरू
कर दिया है। ये लगभग - लगभग उस प्रेम और वात्सल्य का अपमान है ,  जिसका
स्तुतिगान हमने अलसुबह से शुरू किया है और मध्यरात्रि तक जारी रखेंगे। मुझे एक
माँ और याद आ रही है , क्यों कि उनके बच्चे विश्व विद्यालयों में भूख हड़ताल पर
हैं। वो हमारे बच्चे नहीं हैं , इसलिए हम उस तकलीफ को उस  तरह से नहीं समझ
पाएंगे। सिर्फ उनकी माँ समझेगी। --- पहले नहीं थी , पर अब तो सरकार में
बाकायदा ' स्मृति ' है। तो कम से कम बे मन से सही , बच्चों से बात तो की जानी
चाहिए  थी - आज के दिन तो ।  पर नहीं।  ये राजनीति का गर्वीला स्वभाव है।  --
ये अजीब बात है कि लगातार बढ़ती शक्ति , सुनने की शक्ति को कमज़ोर कर देती है।
अगर ऐसा नहीं है , तो महज गाड़ी ओवरटेक कर लेने  पर किसी माँ को अपने बेटे की
लाश पर बिलखना नहीं पड़ता। मगर वो गाड़ी जिसे ओवरटेक किया गया - विधायक की थी।
भले ही बिहार में हो - विधायक के बेटे के पास राजनीतिक दम्भ था , गर्व था।
ये गर्वीली राजनीति हमें कहाँ ले कर  जा रही है , कि हमने भूखे बच्चों की
बातें सुनना भी बंद कर  दिया है।.... ये अजीब सी बात है कि माँ रोटी की बातें
तुरंत सुन लेती है।  जब चूल्हे अकाल और सूखे में भरभराकर निष्प्राण होने लगते
हैं, मां रोटी ढूंढती है।  मां और रोटी गहरे से जुड़े हैं। एक अकेली मेरी ही
मां तो नहीं जो चिंतित हो! प्रकृति की सारी माएं रोटी जुटाने के लिए प्रतिबद्ध
हैं।  अली सरदार जाफरी याद आ रहे हैं -- "चांद से दूध नहीं बहता है -  तारे
चावल हैं न गेंहू न ज्वार - वरना मैं तेरे लिए चाँद सितारे लाती - मेरे नन्हे,
मिरे मासूम - आ,कि मां अपने कलेजे से लगा ले तुझको - अपनी आगोश-ए-मुहब्बत में
सुला ले तुझको।  ----- प्रशांत श्रोत्रिय


my post about mother's day 6 years ago.

http://chetna-ujala.blogspot.in/2010/05/maan-ke-charno-me.html


Monday, July 12, 2010

चित्र नहीं यह तो विचित्र है,

बदल गया अब दौर पुराना,
देखो आया नया जमाना।
बेटी को रस्ते की ठोकर,
कुत्तों को कंधे पे उठाना।

वक्त ने बदसूरत कर डाला,
मां का चेहरा बहुत सुहाना।
जान निछावर अब पशुओं पर,
संतानों को सजा दिलाना।

दुश्मन जानी बने लोग तो,
और पशुओं पर जान लुटाना।
मां फिर बन जाओ मां जैसी,
जो चेहरा जाना पहचाना।

टूट गया नजरों के आगे,
इक सपना था बहुत सुहाना।
अब कैसे नजीर बनोगी,
और दोगी कैसे नजराना।

मां तो हैं अनमोल धरोहर,
मां के कदमों तले जमाना।
संतानों के सुख की चाहत,
सुबह-शाम बस एक ही गाना।

पश्चिम वालों के पिछलग्गू,
की हरकत है यह बचकाना।
मेरे भारत की वसुधा में,
भूले से भी कभी न आना।

चित्र नहीं यह तो विचित्र है,
कैसा है आया नया जमाना।
दिल छोटा सा कर देता है,
यह विकास का ताना-बाना।

अपनों से निबाह भी मुश्किल,
और गैरों को गले लगाना।
मानव रोये तन्हा-तन्हा,
बेदिल के दिल को बहलाना।

नदियां सूखी, रीते कुएं,
पनघट सदियों हुआ पुराना।
बिसलेरी पीने वालों ने,
माटी के जल को क्या जाना।

है प्रमोद की बातें झूठी,
तो सच को किसने पहचाना।

(यह रचना हमारे आदरणीय गुरु प्रमोदजी श्रीमाली ने बंधु आशीष जैन कोटा द्वारा उनके ब्लॉग पर लगाई गई फोटो को देखकर लिखी है। यह तुच्छ प्राणी भी इस फोटो और रचना को अपने ब्लॉग पर डालने का लोभ संवरण नहीं कर पाया।)

Sunday, May 9, 2010

मदर्स डे मेरी माँ को समर्पित पोस्ट

भाषा विज्ञानियों के लिए भले ही पहला शब्द ‘ए’ अथवा ‘अ’ या फिर ‘अलीफ’ या ‘बे’ होता होगा, लेकिन व्यावहारिकता में यह फार्मूला बेमानी लगता है। दुनिया में किसी बच्चे के कंठों से फूटने वाली पहली किलकारी में ‘मां’ शब्द छिपा हुआ रहता है। कहना गलत नहीं होगा कि कोई शब्द इससे पहले भी नहीं और बड़ा भी नहीं।

 मेरी माँ को समर्पित
तुम्हे लफ्ज-लफ्ज पढऩा चाहता हूं
देखना चाहता हूं कि तुम क्या हो

तब तुम मुझे मिलती हो
गीता के श्लोकों में
कुरान की आयातों में
बाइबिल की शिक्षाओं में
गुरु ग्रंथ के शबदों में
तुलसी की चौपाइयों में
सूर के छन्दों में, मीरां के गीतों में

तब सोचना चाहता हूं कि
तू सब रिश्तों में सबसे बड़ी क्यों है
क्यों मैं सदियों से तुझे
सबसे बड़ा बताता हूं

तुझ पर कविताएं रचता हूं
कहानियां लिखता हूं,
क्यों तू मेरे लिए उससे भी झगड़ पड़ती है
जो तेरा परमेश्वर है
जितना सोचता हूं उतना उलझता हूं
उस उलझन का उपाय खोजते-खोजते
थक जाता हूं तो
तेरा आँचल ही क्यों सुकूं देता है।

पर तू मुझे परख लेती है
क्योंकि तेरी ही गोद से
ले चुका हूं मैं कई जन्म

तू इस सृष्टि में लाने का हेतु है
और तू ही सहारा।
ऐसे सवालों के जवाब ढूंढते-ढूंढते
क्यों गुजार चुका हूं कई सदियां

शायद इसलिए क्योंकि
तू दुनिया की सबसे सुन्दर कृति है
जब कहता हूं कि तेरी तेरी भावनाएं
समझ पाना मेरे बस की बात नहीं

तब जवाब मिलता है कि
तू उस शक्ति का स्वरूप है
जो इस सृष्टि का कारण है
इसलिए तो तुम
शक्तिस्वरूपा मेरी मां हो।

 
   मां तब भी रोती थी जब बेटा खाना नहीं खाता था,
   मां आज भी रोती है जब बेटा खाना नहीं देता  

दामन में दर्द है, बद्दुआ नहीं

प्रदीप बीदावत
पाली, 8 मई। जब हम कुछ कहना चाहते हैं पर कह नहीं पाते तो आंसू भाषा बनकर बह जाते हैं और सब कुछ कह जाते हैं। इन्हीं आंसुओं की भाषा में परिलक्षित नजर आई मां की अनिर्वचनीय उपेक्षा जो न तो उनकी ज़ुबां से फूट पाई और न हमारी कलम समेट पाई। पाली रेलवे स्टेशन के समीप वृद्धाश्रम में अपनों से बिछडक़र अलग रह रही मांओं के दामन में दर्द तो बहुतेरे हैं, लेकिन दर्द देने वालों के प्रति बद्दुआ एक भी नहीं।

इस मिसाल से बड़ी मां शब्द की परिभाषा की उम्मीद करना शायद बेमानी होगा। मुलाकात के दौरान अपना अतीत बताती इन माताओं के आंसू छलक पड़े, लेकिन इस स्थिति के लिए दोष केवल किस्मत को ही दिया। पल्लू से आंसू पौंछती सभी जननियों ने अपने बच्चों के खिलाफ अखबार में कुछ गलत नहीं छापने की अपील भी की। पाली के वृद्धाश्रम में रहने वाली ये सभी महिलाएं बड़े और अभिजात्य परिवारों से हैं। लगभग सभी के बच्चे अच्छे ओहदों पर हैं, लेकिन ये उपेक्षित सी पोते-नातियों की अठखेलियों के बजाए टी.वी. देखकर समय गुजारने पर मजबूर हैं। इन सभी को देखकर उर्दू के अजीम शायर मुनव्वर राणा की पंक्तियां बरबस ही याद हो आईं।
दामन में उसके कभी
बद्दुआ नहीं होती,
एक मां ही है जो
हमसे खफा नहीं होती।

बेटे गलत नहीं
बांगड़ कॉलेज के प्राचार्य रहे स्व. एस.एल. भार्गव की पत्नी श्रीमती विमला चार महीनों से वृद्धाश्रम में है। पति की मौत के बाद बेटी के साथ खुद के मकान में रहती थीं। बेटी की मौत के बाद बेटे ने मकान बेच दिया। श्रीमती विमला के लिए वृद्धाश्रम ही सहारा बचा। अपनी दवाओं की ओर इशारा करती हुर्ईं वे कहती हैं अब बीपी 200 के करीब रहता है। शारीरिक तकलीफ है और दिल का दर्द भी बड़ा। अपनी स्थिति के लिए कहती हैं बेटा बेचारा क्या करे बहू का स्वभाव ही थोड़ा ऐसा है।

बात नहीं करता
पति जीवित थे तब बच्चों की किलकारियों से आंगन आबाद था। उनके जाने के बाद विकट परिस्थितियों के चलते यहां आना पड़ा और आज आठ साल हो गए बच्चों की आवाज सुने। यह कहना है ब्यावर निवासी श्रीमती विनय कंवर का। वे कहती हैं चार बेटे हैं जिनमें से दो मुम्बई व दो ब्यावर में सोने का व्यापार करते हैं। आंसू पौंछते हुए उनके कुछ अस्पष्टï से शब्द वर्तमान स्थिति के लिए किस्मत को ही कोसते रहे, लेकिन बेटों के लिए तो मां का दिल दुआ ही देता रहा।

इस परिवार की मैं हूं मां
82 वर्ष की उम्र में तरोताजा एवं खुशमिजाज रहने वाली श्रीमती चंदन कंवर अतीत बताते हुए एकबारगी खामोश हो गर्ईं। उनकी आंखें दर्द बयान करती नजर आई, लेकिन वे कहती हैं गलतियां हो जाती हैं। कहती हैं कारणों पर नहीं जाऊंगी, लेकिन अब उनके साथ रहना नहीं चाहती। बच्चे फोन करते हैं। मिलने के लिए आते हैं, लेकिन अब यह वृद्धाश्रम ही परिवार है और इस परिवार की मां वे स्वयं हैं।

सब किस्मत का खेल
ईश्वर ने हमें कोई संतान नहीं दी। यदि दी होती तो आज वह यहां नहीं अपने बच्चों के साथ होती। यह कहना है वृद्धाश्रम में रह रही तमिलनाडु निवासी श्रीमती अन्नपूर्णा का। उनका कहना है कि बेटे अपनी मां को कैसे छोड़ सकते हैं। वे यहां साढ़े आठ सालों से हैं। तमिलनाडु में उनके दूसरे परिजनों के बुलाने पर वह मिलने के लिए जाती हैं। उनका कहना है सब किस्मत का खेल है। कर्मों का फल तो खुद को ही भोगना पड़ता है

नौ साल से नहीं बोला बेटा
श्रीमती कंचन को यहां आए छह माह हुए हैं। दो बेटों की मां कंचन छोटे बेटे [जो मानसिक विमंदित है] के लिए परेशान है। उनका कहना है बड़ा बेटा-बहू के आने के बाद बदल गया। अच्छा कमाता है, लेकिन घर में रखना नहीं चाहता। ठंडी नि:श्वास छोड़ते हुए कंचन कहती है सब किस्मत और समय के लेखे हैं। जो ईश्वर ने लिखा है वह सब भोगना ही पड़ेगा किसी को दोष देन से क्या फायदा।




 आप सभी को मदर्स डे की शुभकामनायें.
यह पोस्ट मेरी माँ को समर्पित हैं आप लोग  जरूर सराहेंगे और कमेन्ट करेंगे
माँ के चरणों में युग- युग से तुच्छ
प्रदीप बीदावत
राजस्थान पत्रिका में मदर्स डे पर प्रकाशित आलेख

Tuesday, February 2, 2010

अभिलाषा नहीं पुष्प होने की


अभिलाषा नहीं रही पुष्प होने की
चाह होती हैं बस घुटकर रोने की

क्यों चढ़ाया ही जाऊं उस शीश पर
जो सलामी में झुका खोटे सोने की

क्यों जाऊं उन केशों में वेणी बनकर
जहाँ बदबू सी हैं परफ्यूम होने की

उस शहादत के पथ की भी चाह नहीं
कोशिश हैं जहाँ स्याही से लहू धोने की

कुम्हलाता हूँ सफेदपोशों के गले में घुट-घुट
राजनीती हैं देश में बस जादू - टोने की

उजाले की चाह ओ चेतन स्वर कहाँ
सब कोशिश में हैं अँधेरा बोने की

आरज़ू हैं माँ के चरणों में लिपटकर रोऊँ
जुस्तजू हैं 'प्रदीप' वजूद खोने की 

Friday, November 20, 2009

मेरी मां

मैं तुम्हे लफ्ज-लफ्ज पढ़ना चाहता हूं

देखना चाहता हूं कि तुम क्या हो
चाहता हूं तुम्हें अक्षर-अक्षर समझना

तब तुम मुझे मिलती हो गीता के श्लोकों में
कुरान की आयातों में
बाइबिल की शिक्षाओं में गुरु ग्रंथ के शबदों में
तुलसी की चौपाइयों में
सूर के छन्दों में, मीरां के गीतों में

तब सोचना चाहता हूं कि
तू सब रिश्तों में सबसे बड़ी क्यों है
क्यों मैं सदियों से तुझे सबसे बड़ा बताता हूं

तुझ पर कविताएं रचता हूं
कहानियां लिखता हूं,
क्यों तू मेरे लिए उससे भी झगड़ पड़ती है
जो तेरा परमेश्वर है

जितना सोचता हूं उतना उलझता हूं
उस उलझन का उपाय खोजते-खोजते
थक जाता हूं तो तेरा आ¡चल ही क्यों सुकूं देता है।

इन सवालों के जवाब ढूंढते-ढूंढते
क्यों गुजार चुका हूं कई सदियां
शायद इसलिए क्योंकि तू दुनिया की सबसे सुन्दर कृति है
तेरी भावनाओं को समझ पाना मेरे बस की बात नहीं

पर तू मुझे परख लेती है
क्योंकि तेरी ही गोद से ले चुका हूं मैं हजारों जन्म
तू इस सृष्टि में लाने का हेतु है और तू ही सहारा।

तब जवाब मिलता है कि तू उस शक्ति का स्वरूप है
जो इस सृष्टि का कारण है
इसलिए तो तुम शक्तिस्वरूपा मेरी मां हो।

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