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Wednesday, April 13, 2016

जिन्दल तुम अभी जिन्दा हो क्या? और तुम कहां हो छलिए?


जिन्दल तुम तो मर ही गए होंगे...। नहीं...। फिर शर्म तो आई ही होगी..। क्या...! वह भी नहीं!!
क्यों, शर्म आने के लिए भी कोई मैनेजर-डाइरेक्टर रख लिया? जिस तरह किसी अबला की जमीन, आबरू और जीवन लूटने के लिए रखे हैं? तुम कौन हो, मैं नहीं जानता? जानना चाहता भी नहीं। तुम व्यक्ति हो या कंपनी, यह भी मुझे नहीं पता। तुम क्या हो, यह प्रश्न नहीं है। सवाल यह है कि तुम अब भी जिन्दा कैसे हो? डूब मरना चाहिए। अकेले नहीं, अपने चहेतों और सहकर्मियों को साथ लेकर।

एक आदिवासी की ज़मीन लूटने के लिए जो खेल चल रहा। वह रूह कंपाने वाला है, लेकिन जिम्मेदारों के कानों जूं तक नहीं रेंगी। नौकरशाह, वकील, उद्योगपति और इन सबकी मिलीभगत ने भारत में लोकतंत्र की जड़ें दिखाई हैं। कोई कुछ भी क्यों नहीं कर रहा?

यह द्रोपदी सिसक पड़ी, परन्तु किसके आगे? सरकार रूपी पाण्डव दांव में अपनी ज़मीन कब की भेंट कर चुके। यह महाभारत नहीं आज का भारत है और यहां कहानी थोड़ी आगे बढक़र है। सरकार जमीन सिर्फ राज की ही नहीं, जनता की भी दांव पर लगाती है। यह भी पता चला कि जमीन के साथ-साथ गरीबों की आजीविका, इज्जत-आबरू और सुख-चैन भी भेंट चढ़ाया जाता है। नजराना, भेंट, कटसी या और भी कुछ नाम दे देकर। इससे क्या होगा? आदिवासी विरोध भी करेंगे तो क्या...। ठोक देंगे...। आमने-सामने कौन? पुलिस या सीआरपीएफ...। मरेंगे तो सरकार का क्या बिगड़ेगा। नक्सली पैकेज की कौनसी ऑडिट होती है। हर कोई अपने-अपने राज्य में ऐसा खेल खेलने में लगा है। भारत के ऐसे हाल क्या किसी ने सोचे थे?

द्रोपदी लुट रही थी और भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोण, कृपाचार्य, विदुर, आमत्य वृषवर्मा देखन-समझने की कोशिश का नाटक कर रहे कि हो क्या रहा है? पाण्डव तो बिचारे पहले ही एमओयू करके चुप हो गए। महिला अधिकारों की झंडाबरदार भी महाभारत की सभा में मौजूद गांधारी जैसी स्थिति में हैं। विद्वजन बताते हैं कि तब की सभा में वह पैशाचिक कृत्य ‘महाभारत होने’ का प्रमुख कारण था। आज यदि यह पांचाली हरण रोजाना होता रहा तो कहीं ‘भारत के नहीं होने’ का कारण न बन जाए।

उस समय तो द्रोपदी को लूटने का प्रयास मात्र हुआ था। परन्तु आज तो वह रोजाना लूट ही ली जा रही है, किसी एक का भी खून नहीं खौलता। क्या रक्त जम गया... या हमारे द्वारा स्त्रियों को सम्मान दिए जाने का इतिहास मिथ्या है...। मिथ्या ही प्रतीत होता है...। हम इतने हिप्पोक्रेट जो हैं। कहते हैं वह नहीं करते...। कहते क्या, लिखते-पढ़ते-बोलते-सुनते-सुनाते
-गाते-गरियाते और शपथ लेते हैं। वह तक भी तो नहीं करते। एक ‘अच्छा’ तक चार तरह से कहते-करते हैं...। ‘बुरा’ करने के तो सैकड़ों-हजारों ही नहीं अनगिनत तरीके हैं। स्त्री के शील पर प्रहार का अर्थ है मानवता के मर्म पर प्रहार। परन्तु मानवता तो बची कहां? इस एमओयू की स्याही में उसी का गाढ़ा रक्त ही तो काम आया था।
यहां हस्तिनापुर की एक सभा समाप्त हो चुकी है। दूसरी जगह सभाएं जारी हैं। यहां भी फिर शुरू हो जाएगी। कहानी महाभारत से इतर है, लेकिन भारत की कहानी में पात्र तो वैसे ही है। बस पाण्डवों की आंख का पानी मर चुका है। पहला चीर दु:शासन ने नहीं इन्होंने ही भू-अधिग्रहण कानून बनाकर खींचा था। अल्पबुद्धि दु:शासन का कहना है कि वह तो यहां था भी नहीं। उसे दोष ही क्यों दें...। आजकल भारत में धृतराष्ट्र तब बात पहुंचने से पहले रजिस्ट्रार की अनुमति जरूरी है, लेकिन वहां इस पांचाली की चलती नहीं। सामने वाले के दर्जनों वकील भारी जो पड़ जाते हैं। भीष्म पितामह अपने महल में आराम फरमा रहे हैं... उनकी कोई नहीं सुनता और वे भी किसी की नहीं सुनते। राज्य को सुव्यवस्थित चलाने की नीति में विफल विदुर विदेश नीति बनाने में व्यस्त है। द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वश्वथामा को किसी यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर के जॉब के लिए दुर्योधन से सिफारिश में लगे हैं। कर्ण तो तब भी कुछ नहीं बोला था। अब वह अपने राज्य का मुखिया तो है, लेकिन हस्तिनापुर से गया राज्य प्रमुख उस पर भारी पड़ता है। उसे इस मुद्दे में वोट भी नजर नहीं आते। तब भाइयों से बगावत करने का वाला विकर्ण बोला तो था, लेकिन अब मौन है। मद्र देश के शल्य को अपनी सरकार के खिलाफ आए अविश्वास प्रस्ताव को अपने पक्ष में करने की कोशिश करनी है। कुन्ती बॉलीवुड के साथ-साथ संसद में दोहरी भूमिका में है। एकलव्य आजकल बड़ा वोट बैंक लिए है, इसलिए बिना अंगूठे के ही बड़ा शिकारी है...। अभिमन्यु को अपने कॅरियर की चिन्ता है...। सबके अपने-अपने काम है। अकेला बैठा सोच रहा हूं...। सामने द्रोपदी के वस्त्रों का ढेर पड़ा है और वह पता नहीं कहां है। केशव नहीं आए उसे बचाने। पता नहीं क्यों? चिन्ता जिन्दल के जिन्दा या मृत होने की नहीं है। समस्या उस छलिए केशव के गायब होने की है। परन्तु लगता है अब वह नहीं आएंगे। चार लाइनें याद आ रही हैं...।

उठो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब गोविंद ना आएंगे।
छोड़ो मेहंदी खडग़ संभालो, खुद ही अपना चीर बचालो। अब गोविंद ना आएंगे।

- प्रदीप बीदावत

(नोट : यह विचार राजस्थान पत्रिका छत्तीसगढ़ के साथी की खबर पर मेरे मन में आए। साथी की खबर पढऩे और पीडि़ता का ऑडियो सुनने के लिए क्लिक करें। राजस्थान पत्रिका के निम्न लिंक पर)

http://www.patrika.com/news/raipur/raigarh-jindal-group-tortures-tribal-woman-to-acquire-her-lands-in-chhattisgarh-1266650/


http://epaper.patrika.com/c/9664153

Wednesday, March 2, 2011

हम तकरार में, वे गालियों के सार में




खुश थे जब डाले झूठ-झूठ के ही हार गले में
आइना सच का दिखाया तो तकरार में आ गए

बिकने से बचाते रहे उनको अक्सर नीलामी में
कीमत लगाने हमारी वे खुद बाजार में आ गए

भूख अब हमारे घर के दरवाजे पर ही सोती है
आजादी के बाद आरक्षण के बुखार में आ गए

घुटनों के बल चला करते थे रोते-लडख़ड़ाते
‘खेल’ क्या हुए वे सरकारी कार में आ गए

कभी नारे-जयकारे खुद के लगवाते नहीं थकते
आज बात वतन की चली तो उतार में आ गए

पहले दो-चार नारे लगा जिताया था दूसरों को
खान-पम्प-ठेके मिले, फिर व्यापार में आ गए

भीख मांगने की अदावत कहें कि देश का नसीब
जम्हूरियत में सिर गिना अब सरकार में आ गए

चार कलम घसीटिए दोस्त क्या हुए जनाब के 
हुजूर के सिर के कीड़े भी अखबार में आ गए

कभी स्वागतम्, अब घर पे लिख प्रवेश निषेध
साहब के साथ-साथ कुत्ते भी दरबार में आ गए

तकनीक भी लगी इनके दामन उजले करने में
ब्लॉग-फेसबुक-ट्विटर के अशरार में आ गए

हमारी ही कहते रहे तो बनेंगे मुंह मियां मिट्ठू
उनकी क्या कहें वे गालियों के सार में आ गए


Friday, April 10, 2009

देखिए यह रिवाज है

देखिए यह रिवाज है
हमारे गरीब और महान भारत का
हैरान मत होइए
हमारी भारत सरकार के
46 मंत्रालयों के 1576 केंद्रीय अधिकारियों ने
विदेशों की यात्रा कर डाली
56 लाख 56 हज़ार 246 किलोमीटर
अर्थात इतने में आप पृथ्वी से चांद की
74 बार यात्रा कर सकते है
यात्रा में खर्च हुए 24458 दिन
1 अप्रैल 2005 से 30 अप्रैल 2008 •
यानि साढ़े तीन साल।
यात्रा में कुल खर्च
56 करोड़ 38 लाख तीन हज़ार तीन सौ रुपये
एक प्रश्न?

किसका था यह रुपया?
जवाब भारत सरकार का
अर्थात भारत की महान गरीब जनता का

तो...?
क्या सर! हिसाब-किताब में उलझ गए। मैं जानता हूं ऐसे आंकड़ों में ऐसा ही होता है। लेकिन ये यात्रा तो केवल अधिकारियों की है। नेताओं वाली का तो हिसाब भी नहीं है। अपन के पास। खाओ-पीओ ऐश करो, बस घाटे का बजट मत पेश करो का नारा बुलंद करने वाले नेता और इन अधिकारियों के लिए ऊपर वाले आंकड़ों से फर्क नहीं पड़ता। यहां तो ट्रेंड ही बन चुका है। सरकारी यात्रा करो और जेब भरो का ट्रेंड तो राजस्थान में भी चला। पैलेस ऑन व्हील्स की यात्रा में रेलवे के अधिकारी भी निरीक्षण के नाम पर नहीं चूके। हालांकि निरीक्षण का कोई सरकारी रिजल्ट नहीं निकला यह बात अलग है, लेकिन इन अधिकारियों के घरेलु बजट का सालभर का रिजल्ट अच्छा हो गया।
अगले नुक्कड़ की चर्चा में तो करारा निष्कर्ष निकला। चर्चा चल रही थी कि ये तो बिचारे यात्रा ही करके आए हैं। कई तो शहीदों
में कफन गए। करगिल में शायद इसीलिए एलओसी क्रॉस करने से मना किया था कि ज्यादा सैनिक शहीद होंगे तो कफन भी ज्यादा निकलेंगे और मुनाफा भी ज्यादा होगा। ऐसे में इन अधिकारियों का भ्रष्टाचार तो बहुत थोड़ा है। वहीं भ्रष्टाचार के सिरमौर कहे जाने वाले तेलगी का माल तो आज तक पता नहीं चला है कहां छुपाया हुआ है। अधिकारियों की बिचारों की बिसात ही क्या है।
वह नेता ही क्या जो सूटकेस भरके नहीं लेता। और तो और सरकारी अधिकारियों की तो पहचान भी ऊपरवाली इनकम से होती है। एक अधिकारी ने ईमानदारी दिखाने का प्रयास करते हुए नेताजी का भ्रष्टाचार खोलने की कोशिश की तो सरकार उसके पक्ष में खड़ी नजर आई। इसलिए आप तो बिल्कुल लोड मत लो हिन्दुस्तान की जनता का सार्वजनिक पैसा है।

तो प्यारे डाबर का च्यवनप्राश खाओ
खूब खाओ-खूब पीयो और पचाओ।
इसे खाकर सुखराम देश को खा गए।
नरसिम्हा बुढ़ापे में भी खूब पचा गए।
तो आप तो अभी खूब खा सकते हैं और पचा सकते हैं। खाओ-पीयो और खाने-पीने का कॉफिडेन्स बढ़ाओ। क्योंकि कई नकली डाक टिकट छाप-छापकर असली चुनावी टिकट ले आए और कुरसियों पर जा बैठे।

तभी तो काला दामन सफेद झक्क हो गया
और उजले सच का मुंह फक्क हो गया।
pradeep singh beedawat

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