Latest News

Showing posts with label व्यंग्य. Show all posts
Showing posts with label व्यंग्य. Show all posts

Sunday, May 8, 2016

मदर्स डे और मित्र प्रशांत श्रोत्रीय की कलम


मैं सुबह से देख ही रहा था - तमाम आये हुए संदेशों को ,वाट्सअप और फेसबुक पर -
तमाम दूसरे लोगों और समूहों को फॉरवर्ड कर हम समारोहपूर्वक मदर्स डे मना रहे
थे। ये हमारे फॉरवर्ड होने की निशानी भी कही जा सकती है। पर ऐसा करने में कोई
बुराई भी नहीं है। -- यहाँ  मेरा सवाल दूसरा है।  माँ के प्रति श्रद्धा व्यक्त
करने के लिए हमें ' दिवस विशेष ' की आवश्यकता कब से पड़ने लग गयी ? -- और अगर
पड़ने लग गयी है तो मान लीजिए , हमने माँ की ममता और प्यार को कमतर आंकना शुरू
कर दिया है। ये लगभग - लगभग उस प्रेम और वात्सल्य का अपमान है ,  जिसका
स्तुतिगान हमने अलसुबह से शुरू किया है और मध्यरात्रि तक जारी रखेंगे। मुझे एक
माँ और याद आ रही है , क्यों कि उनके बच्चे विश्व विद्यालयों में भूख हड़ताल पर
हैं। वो हमारे बच्चे नहीं हैं , इसलिए हम उस तकलीफ को उस  तरह से नहीं समझ
पाएंगे। सिर्फ उनकी माँ समझेगी। --- पहले नहीं थी , पर अब तो सरकार में
बाकायदा ' स्मृति ' है। तो कम से कम बे मन से सही , बच्चों से बात तो की जानी
चाहिए  थी - आज के दिन तो ।  पर नहीं।  ये राजनीति का गर्वीला स्वभाव है।  --
ये अजीब बात है कि लगातार बढ़ती शक्ति , सुनने की शक्ति को कमज़ोर कर देती है।
अगर ऐसा नहीं है , तो महज गाड़ी ओवरटेक कर लेने  पर किसी माँ को अपने बेटे की
लाश पर बिलखना नहीं पड़ता। मगर वो गाड़ी जिसे ओवरटेक किया गया - विधायक की थी।
भले ही बिहार में हो - विधायक के बेटे के पास राजनीतिक दम्भ था , गर्व था।
ये गर्वीली राजनीति हमें कहाँ ले कर  जा रही है , कि हमने भूखे बच्चों की
बातें सुनना भी बंद कर  दिया है।.... ये अजीब सी बात है कि माँ रोटी की बातें
तुरंत सुन लेती है।  जब चूल्हे अकाल और सूखे में भरभराकर निष्प्राण होने लगते
हैं, मां रोटी ढूंढती है।  मां और रोटी गहरे से जुड़े हैं। एक अकेली मेरी ही
मां तो नहीं जो चिंतित हो! प्रकृति की सारी माएं रोटी जुटाने के लिए प्रतिबद्ध
हैं।  अली सरदार जाफरी याद आ रहे हैं -- "चांद से दूध नहीं बहता है -  तारे
चावल हैं न गेंहू न ज्वार - वरना मैं तेरे लिए चाँद सितारे लाती - मेरे नन्हे,
मिरे मासूम - आ,कि मां अपने कलेजे से लगा ले तुझको - अपनी आगोश-ए-मुहब्बत में
सुला ले तुझको।  ----- प्रशांत श्रोत्रिय


my post about mother's day 6 years ago.

http://chetna-ujala.blogspot.in/2010/05/maan-ke-charno-me.html


Saturday, April 16, 2016

दो नावों पर चढऩे की कोशिश में फिसल ना जाना


 बीते दो दिन में बड़ा नाटक चला। राम नाम की नाव में सवार पार्टी इन दिनों अम्बेडकर के चरणों में ‘फूल’ चढ़ा रही थी। दूसरी ओर कभी पार्टी से बाहर करके बाद में बाबा साहब के अनुयायी रामजी को हाथ जोड़ते नजर आए। फिर कौन कह रहा है कि भारत असहिष्णु है। बाबा साहब तो राम, दुर्गा जैसी मूर्तिपूजक परम्पराओं वाले हिन्दू धर्म को छोडक़र बौद्ध हो गए और इसे सार्थक भी बताया। बाबा साहब पहले सिर्फ दलितों के दिल में थे। बाद में हाथ के छापे पर आ गए और अब कमल सवार हो गए। इधर लगातार कम होती टीआरपी और हिट्स के बीच अयोध्या में से रामजी भी देख रहे होंगे कि उनका वोट बैंक जरा कमजोर हो चला है। मैनफीस्टो से बाहर हुए प्रभु चिंतित है कि कहीं वे देश की जनता के दिल से ही बाहर हो जाएं।

खैर! अम्बेडकरजी की 125वीं वर्षगांठ बहुत कुछ कह गई। हाथ और कमल की तो छोडि़ए झाड़ू तक भुनाने से नहीं चूक रही। हो सकता है कि मैं लोगों को नकारात्मक लगूं लेकिन याद आ रहा है कि संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा थे। उनके निधन पर उपाध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अध्यक्ष बनाया गया था। अम्बेडकर सिर्फ प्रारूप समिति के अध्यक्ष भर थे। वे संविधान निर्माता कहलाए। यदि सिर्फ संविधान निर्माता के तौर पर ही मान दिया जाना है तो बीजेपी को डॉ. प्रसाद को भी इसी रूप में अपनाना चाहिए। परन्तु...। अफसोस...। कांग्रेस भी प्रसाद को वेटेज नहीं देती, जबकि वे पहले राष्ट्रपति भी रहे। कारण...। भई साफ है प्रसादजी के पीछे वोट बैंक नहीं है। केवल दलित ही नहीं बल्कि सवर्णों तक को समानता का अधिकार देकर गए बाबा साहब अम्बेडकर एक बड़े वोट बैंक का आधार है और अपना उल्लू सीधा करने के लिए सभी पार्टियां उनका इस्तेमाल एक सीढ़ी की तरह करना चाहती है।

बीते साल सिरोही जिले में था। आदिवासी जिला है। हाइवे से बीस किलोमीटर साइड उतरकर देखिए, आबूरोड के आसपास। हिन्दुस्तान आज भी वहीं खड़ा है, जहां उसे १९४७ में गोरे अंग्रेज छोडक़र गए थे। या उससे भी कहीं पीछे हैं। इलाज के अभाव में प्रसूताएं मर जाती है और कुपोषण से मासूम। शराबी और कुपोषित आदिवासी पुरुष पचास से बाहर की जिन्दगी नहीं जीते। बाल विवाह, अशिक्षा, दुष्कर्म, चोरी-चकारी जैसी कौनसी समस्या है जो वहां नहीं है। ढंग का रोजगार तक नहीं है।

क्या वे गरासिया आदिवासी पिछड़े नहीं है। दलितों में तीन-चार जातियां ही क्यों आगे बढ़ रही है। ये जातियां अपने से नीचे वालों को ऊपर तक नहीं आने दी जाती। आपस में एससी एसटी एक्ट लागू नहीं होता। परन्तु इस जिले में ऐसा देखा कि इस वर्ग में आपस में ही एक बड़ा जातिवाद है, जिसका कोई तोड़ नहीं है। गरीब आदिवासियों का हक और हिस्सा तक नहीं दिया जा रहा। विधानसभा में विधायक किरोड़ीलाल मीणा ने मुद्दा उठाया, लेकिन मुद्दा फिर बैठ गया है। पहले भी उठा, लेकिन हर बार दम तोड़ जाता है। रामजी भी इधर नहीं देख रहे और अम्बेडकरजी भी। जातियों, समाजों के बीच वैमनस्य बढ़ रहा है। जो राजा थे, उनके वंशज आज भी मौज उड़ा रहे हैं। आपस में वही लड़ रहे हैं, जिनके पेट खाली है। अपनी-अपनी भूख के लिए एक दूसरे को गरियाने का दौर जारी है। राजनीति आम आदमी की भूख पर भारी है।

ऐसे में लगता है कि संविधान की बातें करने वाले टीवी के माइक के आगे जगह पा जाते हैं और अम्बेडकर की बात करने वाले अच्छे वोट। हम राम को भी मान रहे हैं और अम्बेडकरजी को भी, लेकिन उनकी ही नहीं मान रहे। वे जो कह गए, उसे करना जरूरी है। परन्तु हम एक साथ अधिक नावों की सवारी करना चाहते हैं और अक्सर फिसल जाते हैं। आज के दौर में यही हो रहा है...। देखें दौर कहां जाकर थमता है।

Wednesday, April 13, 2016

जिन्दल तुम अभी जिन्दा हो क्या? और तुम कहां हो छलिए?


जिन्दल तुम तो मर ही गए होंगे...। नहीं...। फिर शर्म तो आई ही होगी..। क्या...! वह भी नहीं!!
क्यों, शर्म आने के लिए भी कोई मैनेजर-डाइरेक्टर रख लिया? जिस तरह किसी अबला की जमीन, आबरू और जीवन लूटने के लिए रखे हैं? तुम कौन हो, मैं नहीं जानता? जानना चाहता भी नहीं। तुम व्यक्ति हो या कंपनी, यह भी मुझे नहीं पता। तुम क्या हो, यह प्रश्न नहीं है। सवाल यह है कि तुम अब भी जिन्दा कैसे हो? डूब मरना चाहिए। अकेले नहीं, अपने चहेतों और सहकर्मियों को साथ लेकर।

एक आदिवासी की ज़मीन लूटने के लिए जो खेल चल रहा। वह रूह कंपाने वाला है, लेकिन जिम्मेदारों के कानों जूं तक नहीं रेंगी। नौकरशाह, वकील, उद्योगपति और इन सबकी मिलीभगत ने भारत में लोकतंत्र की जड़ें दिखाई हैं। कोई कुछ भी क्यों नहीं कर रहा?

यह द्रोपदी सिसक पड़ी, परन्तु किसके आगे? सरकार रूपी पाण्डव दांव में अपनी ज़मीन कब की भेंट कर चुके। यह महाभारत नहीं आज का भारत है और यहां कहानी थोड़ी आगे बढक़र है। सरकार जमीन सिर्फ राज की ही नहीं, जनता की भी दांव पर लगाती है। यह भी पता चला कि जमीन के साथ-साथ गरीबों की आजीविका, इज्जत-आबरू और सुख-चैन भी भेंट चढ़ाया जाता है। नजराना, भेंट, कटसी या और भी कुछ नाम दे देकर। इससे क्या होगा? आदिवासी विरोध भी करेंगे तो क्या...। ठोक देंगे...। आमने-सामने कौन? पुलिस या सीआरपीएफ...। मरेंगे तो सरकार का क्या बिगड़ेगा। नक्सली पैकेज की कौनसी ऑडिट होती है। हर कोई अपने-अपने राज्य में ऐसा खेल खेलने में लगा है। भारत के ऐसे हाल क्या किसी ने सोचे थे?

द्रोपदी लुट रही थी और भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोण, कृपाचार्य, विदुर, आमत्य वृषवर्मा देखन-समझने की कोशिश का नाटक कर रहे कि हो क्या रहा है? पाण्डव तो बिचारे पहले ही एमओयू करके चुप हो गए। महिला अधिकारों की झंडाबरदार भी महाभारत की सभा में मौजूद गांधारी जैसी स्थिति में हैं। विद्वजन बताते हैं कि तब की सभा में वह पैशाचिक कृत्य ‘महाभारत होने’ का प्रमुख कारण था। आज यदि यह पांचाली हरण रोजाना होता रहा तो कहीं ‘भारत के नहीं होने’ का कारण न बन जाए।

उस समय तो द्रोपदी को लूटने का प्रयास मात्र हुआ था। परन्तु आज तो वह रोजाना लूट ही ली जा रही है, किसी एक का भी खून नहीं खौलता। क्या रक्त जम गया... या हमारे द्वारा स्त्रियों को सम्मान दिए जाने का इतिहास मिथ्या है...। मिथ्या ही प्रतीत होता है...। हम इतने हिप्पोक्रेट जो हैं। कहते हैं वह नहीं करते...। कहते क्या, लिखते-पढ़ते-बोलते-सुनते-सुनाते
-गाते-गरियाते और शपथ लेते हैं। वह तक भी तो नहीं करते। एक ‘अच्छा’ तक चार तरह से कहते-करते हैं...। ‘बुरा’ करने के तो सैकड़ों-हजारों ही नहीं अनगिनत तरीके हैं। स्त्री के शील पर प्रहार का अर्थ है मानवता के मर्म पर प्रहार। परन्तु मानवता तो बची कहां? इस एमओयू की स्याही में उसी का गाढ़ा रक्त ही तो काम आया था।
यहां हस्तिनापुर की एक सभा समाप्त हो चुकी है। दूसरी जगह सभाएं जारी हैं। यहां भी फिर शुरू हो जाएगी। कहानी महाभारत से इतर है, लेकिन भारत की कहानी में पात्र तो वैसे ही है। बस पाण्डवों की आंख का पानी मर चुका है। पहला चीर दु:शासन ने नहीं इन्होंने ही भू-अधिग्रहण कानून बनाकर खींचा था। अल्पबुद्धि दु:शासन का कहना है कि वह तो यहां था भी नहीं। उसे दोष ही क्यों दें...। आजकल भारत में धृतराष्ट्र तब बात पहुंचने से पहले रजिस्ट्रार की अनुमति जरूरी है, लेकिन वहां इस पांचाली की चलती नहीं। सामने वाले के दर्जनों वकील भारी जो पड़ जाते हैं। भीष्म पितामह अपने महल में आराम फरमा रहे हैं... उनकी कोई नहीं सुनता और वे भी किसी की नहीं सुनते। राज्य को सुव्यवस्थित चलाने की नीति में विफल विदुर विदेश नीति बनाने में व्यस्त है। द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वश्वथामा को किसी यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर के जॉब के लिए दुर्योधन से सिफारिश में लगे हैं। कर्ण तो तब भी कुछ नहीं बोला था। अब वह अपने राज्य का मुखिया तो है, लेकिन हस्तिनापुर से गया राज्य प्रमुख उस पर भारी पड़ता है। उसे इस मुद्दे में वोट भी नजर नहीं आते। तब भाइयों से बगावत करने का वाला विकर्ण बोला तो था, लेकिन अब मौन है। मद्र देश के शल्य को अपनी सरकार के खिलाफ आए अविश्वास प्रस्ताव को अपने पक्ष में करने की कोशिश करनी है। कुन्ती बॉलीवुड के साथ-साथ संसद में दोहरी भूमिका में है। एकलव्य आजकल बड़ा वोट बैंक लिए है, इसलिए बिना अंगूठे के ही बड़ा शिकारी है...। अभिमन्यु को अपने कॅरियर की चिन्ता है...। सबके अपने-अपने काम है। अकेला बैठा सोच रहा हूं...। सामने द्रोपदी के वस्त्रों का ढेर पड़ा है और वह पता नहीं कहां है। केशव नहीं आए उसे बचाने। पता नहीं क्यों? चिन्ता जिन्दल के जिन्दा या मृत होने की नहीं है। समस्या उस छलिए केशव के गायब होने की है। परन्तु लगता है अब वह नहीं आएंगे। चार लाइनें याद आ रही हैं...।

उठो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब गोविंद ना आएंगे।
छोड़ो मेहंदी खडग़ संभालो, खुद ही अपना चीर बचालो। अब गोविंद ना आएंगे।

- प्रदीप बीदावत

(नोट : यह विचार राजस्थान पत्रिका छत्तीसगढ़ के साथी की खबर पर मेरे मन में आए। साथी की खबर पढऩे और पीडि़ता का ऑडियो सुनने के लिए क्लिक करें। राजस्थान पत्रिका के निम्न लिंक पर)

http://www.patrika.com/news/raipur/raigarh-jindal-group-tortures-tribal-woman-to-acquire-her-lands-in-chhattisgarh-1266650/


http://epaper.patrika.com/c/9664153

Monday, July 12, 2010

चित्र नहीं यह तो विचित्र है,

बदल गया अब दौर पुराना,
देखो आया नया जमाना।
बेटी को रस्ते की ठोकर,
कुत्तों को कंधे पे उठाना।

वक्त ने बदसूरत कर डाला,
मां का चेहरा बहुत सुहाना।
जान निछावर अब पशुओं पर,
संतानों को सजा दिलाना।

दुश्मन जानी बने लोग तो,
और पशुओं पर जान लुटाना।
मां फिर बन जाओ मां जैसी,
जो चेहरा जाना पहचाना।

टूट गया नजरों के आगे,
इक सपना था बहुत सुहाना।
अब कैसे नजीर बनोगी,
और दोगी कैसे नजराना।

मां तो हैं अनमोल धरोहर,
मां के कदमों तले जमाना।
संतानों के सुख की चाहत,
सुबह-शाम बस एक ही गाना।

पश्चिम वालों के पिछलग्गू,
की हरकत है यह बचकाना।
मेरे भारत की वसुधा में,
भूले से भी कभी न आना।

चित्र नहीं यह तो विचित्र है,
कैसा है आया नया जमाना।
दिल छोटा सा कर देता है,
यह विकास का ताना-बाना।

अपनों से निबाह भी मुश्किल,
और गैरों को गले लगाना।
मानव रोये तन्हा-तन्हा,
बेदिल के दिल को बहलाना।

नदियां सूखी, रीते कुएं,
पनघट सदियों हुआ पुराना।
बिसलेरी पीने वालों ने,
माटी के जल को क्या जाना।

है प्रमोद की बातें झूठी,
तो सच को किसने पहचाना।

(यह रचना हमारे आदरणीय गुरु प्रमोदजी श्रीमाली ने बंधु आशीष जैन कोटा द्वारा उनके ब्लॉग पर लगाई गई फोटो को देखकर लिखी है। यह तुच्छ प्राणी भी इस फोटो और रचना को अपने ब्लॉग पर डालने का लोभ संवरण नहीं कर पाया।)

Friday, May 22, 2009

धनुष किसने तोड़ा



एक दिन सरपंच साहब को जाने क्या सूझी कि चल पड़े स्कूल की ओर। यह जानने कि गांव के बच्चों का आईक्यू कैसा'क है। स्कूल पहुंचे तो एक भी अध्यापक कक्षा में नहीं। घंटी के पास उनींदे से बैठे चपरासी से जब पूछा सारे मास्टर कहां गए तो पता चला कि पशुगणना में ड्यूटी लगाने के विरोध में कलेक्टरजी को ज्ञापन देने शहर गए हैं। सरपंचजी ने सातवीं कक्षा के एक बच्चे से पूछा "बताओ शिव का धनुष किसने तोड़ा।" जवाब आया " सरपंचसा! कक्षा में सबसे सीधा छात्र मैं हूं, मैंने तो नहीं तोड़ा। हां चिंटू सबसे बदमाश है, उसी ने तोड़ा होगा। वह आज छुट्टी पर भी है। शायद धनुष टूट जाने के डर से नहीं आया हो।" सरपंचजी ने माथा पीट लिया और वापस लौट गए। शिक्षक लौटे तो चपरासी बोला "सरपंचजी आए थे और बच्चों को कुछ पूछ रहे थे और गए भी भनभनाते हुए हैं।" प्रधानाध्यापक महोदय का पानी पतला हुआ। कक्षा में आए और पूछा "सरपंचजी क्या कह रहे थे।" बच्चों ने सारी बात बता दी। अब प्रधानाध्यापकजी ने बच्चों से पूछा "बच्चों किसी से गलती से धनुष टूट गया तो कोई बात नहीं। केवल यह बता दो धनुष तोड़ा किसने।" बच्चों ने तोड़ा हो तो बोलें। खामोशी देखकर तुरन्त अध्यापकों की बैठक बुलाई और कहा "देखो! शिवजी का धनुष किसी ने तोड़ दिया है और शिवजी कौन है यह भी हमें नहीं मालूम। उनकी शायद ऊपर तक पहुंच हो। पीटीआईजी आप इस मामले की जांच कर कल तक रिपोर्ट दीजिए।" शारीरिक शिक्षक महोदय ने साम, दाम, दंड, भेद आजमाए पर पता नहीं लगा पाए। प्रधानाध्यापकजी को चिंतातुर देख विद्यालय के बाबू बोले "साहब मैं तो कहता हूं कि जिला शिक्षा अधिकारी को पत्र लिखकर मामले से अवगत तो करवा ही दिया जाना चाहिए। नहीं तो बाद में परेशानी खड़ी हो जाएगी। शायद शिवजी आलाकमान तक बात ले जाएं और अपन को ऐसे गांव में नौकरी करनी पड़े जहां बिजली और बस भी मर्जी से आती हो।" प्रधानाध्यापकजी ने डीईओ को पत्र लिखा "महोदय किसी ने शिवजी का धनुष तोड़ दिया है। हम अपने स्तर पर पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं और आपके कानों तक बात डलवा रहे हैं।" तीन दिन बाद जवाब मिला। "प्रधानाध्यापकजी! इस बात से हमें कोई लेना देना नहीं कि धनुष किसने तोड़ा। हां याद रहे यदि सरपंच की ऊपर तक पहुंच है और कोई लफडा हुआ तो धनुष के पैसे आपकी पगार में से लिए जाएंगे।"

आज के एकलव्य का अंगूठा


गली-खोरियां खुल रहीं शिक्षा की दुकान, बैठ सुज्ञानी की जगह अज्ञानी दे ज्ञान।

अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक सितंबर में शिक्षक दिवस निकल गया। शिक्षक दिवस कलियुग के गुरुजनों की वंदना का दिन है। सतयुग से द्वापर तक गुरु पूर्णिमा गुरुजनों का दिन रहा, जिस पर उनकी पूरी पंचायती चलती थी। जो गुरुदक्षिणा मांग ली, शिष्य को देनी ही पड़ती थी। चलिए द्वापर के किरदारों को कलियुग में लाते हैं। अर्जुन के पिता राशन के डीलर और एकलव्य पिछड़ी जाति का। गुरुजी एकलव्य को एडमिशन नहीं देना चाहते थे पर एकलव्य आरक्षण का लाभ लेकर गले पड़ ही गया। मरते बेचारे क्या न करते और एकलव्य को पढ़ाना प्रारंभ कर दिया। मेधावी होने के बावजूद गुरुजी की कारस्तानी से एकलव्य हमेशा पिछड़ जाता। अर्जुन नित्यप्रति गुरुजी के वहां राशन का केरोसीन, चावल, शक्कर और गेहूं पहुंचाता और गुरुजी नंबरों की मेहरबानी रखते। इसी तरह दोनों दसवीं में आ गए। एकलव्य बोला "गुरुजी अबके तो बोर्ड है आप अर्धवार्षिक के दश प्रतिशत के अलावा कुछ नहीं कर पाएंगे और तेरा क्या होगा रे अर्जुन! "
गुरुजी टेंशन में कहीं अर्जुन न पिछड़ जाए इसलिए गुरु ने अब चाणक्य नीति अपनाई। अर्जुन के साथ-साथ एकलव्य को ट्यूशन पर बुलाना शुरू कर दिया वो भी मुफ्त ! एकबारगी तो एकलव्य भी चक्कर खा गया कि ये क्या हो गया। परीक्षा के समय विद्यालय के अंतिम दिन दोनों को बुलाया और कहा "आज आपका अंतिम दिन है। मुझे गुरुदक्षिणा चाहिए।" अर्जुन ने कहा "गुरुदेव जब तक आपका ट्रांसफर दूसरी जगह नहीं हो जाता राशन का सामान पहुंचाता रहूंगा।" अब एकलव्य की बारी थी बोला "मैं तो एकलव्य ठहरा जो मांगेंगे वह दूंगा।"
गुरु ने द्वापर का वार कलियुग में दुबारा किया और कहा "दाहिने हाथ का अंगूठा चाहिए।" एकलव्य ने बिना दूसरा शब्द बोले दाहिने हाथ का अंगूठा समीप पड़े पत्थर से कुचल लिया। गुरु की बांछे खिल गई। अर्जुन को सिरमौर रखने का सपना जो पूरा हो रहा था। पनीली हो चुकी आंखों के बीच एकलव्य बोला "गुरुदेव आप भूल गए। यह द्वापर नहीं कलियुग है। मैं तो नहीं बदला पर आपकी दृष्टि बदल गई। मेरे लिए इस युग में बड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि द्वापर में मैं दाहिने हाथ से तीर चलाता था, लेकिन कलियुग में बाएं हाथ से लिखता हूं। इसलिए आप मुस्कुराहट को थोड़ा कम कर लीजिए।"

Friday, March 13, 2009

विवेकानंद वसुन्धरा के, गांधी यूपीए के और सुभाष किससे?


सबसे पहले उन लोगों को बधाई, जिन्होंने सुभाष, गांधी और विवेकानंद जैसे महापुरुषों के चेहरों पर सफेदी पोत दी। वाकया एक जगह का नहीं राजस्थान भर के उन स्कूलों और दफ्तरों का है, जिन्होंने चुनावी आचार संहिता की अंध पालना में कई महापुरुषों समेत देवी देवताओं की तस्वीरों पर या तो सफेदी पोत दी या उन पर अखबार चिपका दिया। अब आप पूछेंगे कि कारण क्या रहा? अजी कारण तो छोडि़ए डर गए थे बिचारे। आप कहेंगे डर किस बात का? तो जनाब इन लोगों को कहा गया था कि सरकार का विज्ञापन करने वाले किसी भी पोस्टर या फोटो को नहीं छोड़ना है।
दफ्तरों के बाबू और स्कूलों के मास्टरजी लगे आदेश की पालना में और सारी तस्वीरों को या तो उतारकर उल्टी धर दी या सफेदी पोत दी अथवा अखबार चिपका दिया। एक स्कूल की दीवार पर स्वामी विवेकानंद का बड़ा चित्र उकेरा हुआ था। उस पर मास्टरजी ने अखबार चिपका दिया। अब एक बच्चे ने पूछ लिया सर अखबार किस लिए। मास्टरजी का कहना था कि अखबार तो अखबारवालों से डरकर चिपकाया है। यदि यह नहीं चिपका तो मेरी `सीआर´ पर `17 सीसी´ चिपक जाएगी। बच्चा बोला सर रात को अखबार वाले आ गए और इस अखबार को हटाकर फोटो खींच ले गए तो?
मास्टरजी को बच्चे की बात तर्कसंगत लगी। फिर क्या था। एक ईंट मंगवाई और लग गए विवेकानंद के चेहरे पर घिसने। यकीन मानिए घरवाली के कहने पर उन्होंने कभी तुरंत लोटा भी नहीं भरा होगा, लेकिन उस दिन पन्द्रह मिनट में स्वामीजी के चित्र की ऐसी कम तैसी कर दी। दूसरे बच्चे तो समझ ही नहीं पा रहे थे। आदर्श माने जाने वाले विवेकानंद आज मास्टरजी के लिए विलेन कैसे बन गए। मास्टरजी को डर था कि स्कूल में लगा विवेकानंद का फोटो चुनावी पर्यवेक्षक भाजपाइयों का प्रचार न मान लें। इसी तरह कई मास्टरों को गांधी की तस्वीर द्वारा कांग्रेस का प्रचार करने का डर सताया। कइयों को तो सुभाष से भी डर लगा उनकी भी हटा दी। हालांकि कांग्रेसियों ने अपने इतिहास में से ही सुभाष को मिटा दिया, जबकि कोई समय वे उसके अध्यक्ष रहे थे। अब कांग्रेस के इतिहास में ही सुभाष का नाम नहीं। केन्द्र सरकार ने कहा कि देश की आजादी में सुभाष का कोई योगदान नहीं। तो फिर फोटो स्कूल में क्या काम की? कई जगह हटा दी गई, कई जगह पोत दी गई और कई जगह रगड़ दी गई।
सरकारी आदेशों की अंध पालना में मास्टरों द्वारा दी जा रही यह रगड़मपट्टी की प्रेरणा राज ठाकरे पैदा नहीं करेगी तो क्या करेगी? जब देश के लिए कुरबानी देने वालों की रगड़मपट्टी हो जाती है तो अपना तो क्या है। ऐसे में गांधी की रामराज्य की कल्पना का क्या होगा?
खैर छोडि़ए जी! केवल भावुकता से देश नहीं चलता। जब बिना दिल के दिल्लीवालों का कहना है कि देश में राम का अस्तित्व नहीं था। तो रामराज्य की कैसी कल्पना । गठबंधन की आड़ में ठगबंधन का राज चल रहा है। कहीं राणी रियाण पर ताण दिखा रही है तो कहीं जादूगर टमाटर पर कमाकर खा रहा है और हां कन्टीन्यू यही चलता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं जब इन महापुरुषों के चेहरों पर सफेदी की जगह कालिख पोत दी जाएगी।

Thursday, March 12, 2009

जो डूबा सो पार

14th feb 2009
jalore

जालोर का एक वीरमदेव राष्ट्रप्रेम के लिए सांसारिक प्रेम के अनुग्रह को ठोकर मारता है तो उसके साथ स्वर्णगिरी की सैकड़ों वीरांगनाएं जौहर व्रत का अनुष्ठान करती हैं और हजारों वीर शाका करते हैं। कई कहते हैं जीते जी आग में जल जाना क्या बेवकूफी थी? यह किसी सिद्धि या शक्ति का प्रदर्शन नहीं होता था। यह राष्ट्रगौरव के प्रति प्रेम का भाव था।
इस भाव को न तो दुनियावी रिश्तों से बांधा जा सकता है और न ही शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है। वात्सल्य, स्नेह, अनुराग, रति, भक्ति, श्रद्धा व ममता जैसे पर्याय रहे प्रेम का आज एक ही अंग्रेजी अर्थ `लव´ बचा है। `प्रेम´ और `लव´ को पर्यायवाची मानने की प्रवृत्ति ने प्रेम से उसकी पवित्रता छीन ली है। इससे आज का प्रेम `अंगे्रजी लव´ के कागजी फूलों के गुलदस्तों में उलझकर अपनी वास्तविक सुगंध खो बैठा है। प्रेम केवल मानवजाति के लिए नहीं है यह सृष्टि के चराचर जगत के प्रति होता है। प्रेम सृष्टि के कण-कण का ध्यान रखता है और हम सभी के प्रति प्रेम से बंधे होते हैं। वेलेंटाइन डे प्रेम की परिभाषा को नर और मादा के बीच ही समेटकर रखना चाहता है तो इसे शाश्वत नहीं कहा जा सकता। इन दोनों के बीच का शारीरिक एवं भावनात्मक आवेग कब थम जाए और कब आकर्षण समाप्त हो जाए कोई नहीं कह सकता। मीरां ने कृष्ण से प्रेम करके दुनिया में प्रेम को अलौकिक रंग दिया। वह अलौकिक प्रेम जो वीरम ने स्वर्णगिरी से, कृष्णा ने उदयपुर से और प्रताप ने मेवाड़ से किया। वह अलौकिक प्रेम जिसके लिए लिखी गईं पंक्तियां केशव, जायसी, तुलसी, सूर, कबीर, मीरां, रसखान, रहीम व घनानंद जैसे कितने ही कवियों को युगों के लिए अमर कर गईं। विवेकानंद और तिलक का पूरा दर्शन युवाओं को राष्ट्र के प्रति प्रेम का आहृवान करता है, लेकिन आज स्थिति उलट है युवाओं में राष्ट्र के प्रति प्रेम नहीं बचा। अच्छे वेतन के बावजूद सेना में कोई नहीं जाना चाहता। सन 1991-92 से भारतीय सेना के 30 प्रतिशत अधिकारियों के पद रिक्त पड़े हैं। युवाओं में राष्ट्र के प्रति प्रेम कितना बचा है यह तो इससे साबित हो जाता है कि सेना में चयनित होने के बाद अस्सी में से चालीस महिलाएं प्रशिक्षण के लिए ही नहीं आईं। कुल मिलाकर वेलेंटाइन डे के मौके पर एक कार्ड या फूल के माध्यम से संपूर्ण समर्पण और प्रेम का स्वरूप नहीं जाना जा सकता। इसके लिए तो अलौकिक प्रेम की धारा में आकंठ उतरना पड़ेगा। चाहे वह प्रेयसी, पत्नी, परिजन, मित्र अथवा राष्ट्र से ही क्यों न हो।
अमीर खुसरो कह गए हैं…
खुसरो दरिया प्रेम की वां की उलटी धार
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार

Total Pageviews

Recent Post

View My Stats