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Saturday, April 11, 2009

अखबार




चन्द पन्नों मे सिमटा
विस्तृत संसार
दैनिक अखबार
दुनिया को
देखने समझने का रास्ता सा
सुबह का नाश्ता सा

कभी कड़्वा, कभी कसैला
कभी तीखा-कभी विषैला
हां साहमे हमने इस
अखबारी नाश्ते के
बहुत स्वाद चखे हैं
कुछ भूल गये
कुछ याद रखे हैं

आप कहेंगें
ना मिर्च ना मासाला
सफेद कागज़ पर प्रिंट काला
मात्र खबरों का हवाला
फिर स्वाद कैसा

पर साहब
हम आपको समझा देंगें
लीजिये, सुनिये

मुखपृष्ठ खून से सना होगा
अमन चैन नदारद
उग्रवाद घना होगा

पूरे अखबार का
ये आलम होगा
बेवक्त चटकी चूड़ियो का
काँलम होगा
हत्याओं की खूंडियों पर
शीर्षक तने होंगें
सभी शब्द खून से सने होंगें
अपने वैधव्य का
स्वागत करती
नारियों की तस्वीरें
अनाथ हुए बच्चों की
सिसकियां और तकदीरें
सुरक्षा व्यवस्था लड़्खड़ाती हुई
हर मौत उसके खिल्लियां उड़ाती हुई
न उठ सकने वाले
कड़े कदम का आश्वासन
अपनी
कार्य कदम का आश्वासन
अपनी
कार्य कुशलता पर हंसता कुशास

आप कहेंगें ये तो खबरें हैं
स्वाद कहां है
अरे भाई
इन खबरों में ही
स्वाद भरा है
वरना
अखबार में
क्या धरा है...?

writer of this poem - pawan kumar chandan
and thanx for Mr. Avinash Vachaspati

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