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Monday, January 11, 2010

विवेकानंद जयंती

स्वामी जी की वह रचना मुझे बहुत अच्छी लगी जिसमे कहा गया


सर्प अपने फन तभी फैलाता है,  जब उसे चोट लगती है।
अग्नि तभी धधक कर जलती है जब वह बुझने को होती है।

शेर की गर्जना तभी लोगो को कम्पित करती है,
जब वह खुले रेगिस्तान में दहाड़ता है।

बादलों से बरसात तभी होती है,
जब बादलों के ह्रदय में बिजली तड़पती है।

वैसे ही एक इन्सान की उत्तमता तभी सामने आती है,
जब वह अपने अंतरात्मा से काम लेता है ।
अतः ------
चाहे आँखें धुधली हो जाय, चाहे कान बहरे हो जाय।
चाहे दोस्ती टूट जाए, चाहे प्यार तबाह हो जाए।
चाहे भाग्य तुम्हे हजार ग़मों के कुएं में धकेल दे,
चाहे प्रकृति तुमसे नाराज हो जाए,
और तुम्हे तहस नहस कर दे,
यदि तुम स्वयं को जानते हो,
तो तुम ईश्वरीय हो, तुम्हे कोई नहीं हरा सकता।
क्या मुमकिन क्या नामुमकिन बगैर किसी परवाह के,
आगे बड़े चलो,  बड़े चलो,  बड़े चलो
और जीत कर दिखा दो पुरी दुनिया को,
इस भारतीय आत्मा की महान शक्ति को।

Friday, March 13, 2009

विवेकानंद वसुन्धरा के, गांधी यूपीए के और सुभाष किससे?


सबसे पहले उन लोगों को बधाई, जिन्होंने सुभाष, गांधी और विवेकानंद जैसे महापुरुषों के चेहरों पर सफेदी पोत दी। वाकया एक जगह का नहीं राजस्थान भर के उन स्कूलों और दफ्तरों का है, जिन्होंने चुनावी आचार संहिता की अंध पालना में कई महापुरुषों समेत देवी देवताओं की तस्वीरों पर या तो सफेदी पोत दी या उन पर अखबार चिपका दिया। अब आप पूछेंगे कि कारण क्या रहा? अजी कारण तो छोडि़ए डर गए थे बिचारे। आप कहेंगे डर किस बात का? तो जनाब इन लोगों को कहा गया था कि सरकार का विज्ञापन करने वाले किसी भी पोस्टर या फोटो को नहीं छोड़ना है।
दफ्तरों के बाबू और स्कूलों के मास्टरजी लगे आदेश की पालना में और सारी तस्वीरों को या तो उतारकर उल्टी धर दी या सफेदी पोत दी अथवा अखबार चिपका दिया। एक स्कूल की दीवार पर स्वामी विवेकानंद का बड़ा चित्र उकेरा हुआ था। उस पर मास्टरजी ने अखबार चिपका दिया। अब एक बच्चे ने पूछ लिया सर अखबार किस लिए। मास्टरजी का कहना था कि अखबार तो अखबारवालों से डरकर चिपकाया है। यदि यह नहीं चिपका तो मेरी `सीआर´ पर `17 सीसी´ चिपक जाएगी। बच्चा बोला सर रात को अखबार वाले आ गए और इस अखबार को हटाकर फोटो खींच ले गए तो?
मास्टरजी को बच्चे की बात तर्कसंगत लगी। फिर क्या था। एक ईंट मंगवाई और लग गए विवेकानंद के चेहरे पर घिसने। यकीन मानिए घरवाली के कहने पर उन्होंने कभी तुरंत लोटा भी नहीं भरा होगा, लेकिन उस दिन पन्द्रह मिनट में स्वामीजी के चित्र की ऐसी कम तैसी कर दी। दूसरे बच्चे तो समझ ही नहीं पा रहे थे। आदर्श माने जाने वाले विवेकानंद आज मास्टरजी के लिए विलेन कैसे बन गए। मास्टरजी को डर था कि स्कूल में लगा विवेकानंद का फोटो चुनावी पर्यवेक्षक भाजपाइयों का प्रचार न मान लें। इसी तरह कई मास्टरों को गांधी की तस्वीर द्वारा कांग्रेस का प्रचार करने का डर सताया। कइयों को तो सुभाष से भी डर लगा उनकी भी हटा दी। हालांकि कांग्रेसियों ने अपने इतिहास में से ही सुभाष को मिटा दिया, जबकि कोई समय वे उसके अध्यक्ष रहे थे। अब कांग्रेस के इतिहास में ही सुभाष का नाम नहीं। केन्द्र सरकार ने कहा कि देश की आजादी में सुभाष का कोई योगदान नहीं। तो फिर फोटो स्कूल में क्या काम की? कई जगह हटा दी गई, कई जगह पोत दी गई और कई जगह रगड़ दी गई।
सरकारी आदेशों की अंध पालना में मास्टरों द्वारा दी जा रही यह रगड़मपट्टी की प्रेरणा राज ठाकरे पैदा नहीं करेगी तो क्या करेगी? जब देश के लिए कुरबानी देने वालों की रगड़मपट्टी हो जाती है तो अपना तो क्या है। ऐसे में गांधी की रामराज्य की कल्पना का क्या होगा?
खैर छोडि़ए जी! केवल भावुकता से देश नहीं चलता। जब बिना दिल के दिल्लीवालों का कहना है कि देश में राम का अस्तित्व नहीं था। तो रामराज्य की कैसी कल्पना । गठबंधन की आड़ में ठगबंधन का राज चल रहा है। कहीं राणी रियाण पर ताण दिखा रही है तो कहीं जादूगर टमाटर पर कमाकर खा रहा है और हां कन्टीन्यू यही चलता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं जब इन महापुरुषों के चेहरों पर सफेदी की जगह कालिख पोत दी जाएगी।

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