अभिलाषा नहीं रही पुष्प होने की
चाह होती हैं बस घुटकर रोने की
क्यों चढ़ाया ही जाऊं उस शीश पर
जो सलामी में झुका खोटे सोने की
क्यों जाऊं उन केशों में वेणी बनकर
जहाँ बदबू सी हैं परफ्यूम होने की
उस शहादत के पथ की भी चाह नहीं
कोशिश हैं जहाँ स्याही से लहू धोने की
कुम्हलाता हूँ सफेदपोशों के गले में घुट-घुट
राजनीती हैं देश में बस जादू - टोने की
उजाले की चाह ओ चेतन स्वर कहाँ
सब कोशिश में हैं अँधेरा बोने की
आरज़ू हैं माँ के चरणों में लिपटकर रोऊँ
जुस्तजू हैं 'प्रदीप' वजूद खोने की
.jpg)
5 टिप्पणियाँ:
बहुत खूब!
Beautiful Words !!! Really appreciate !!
pushp ki yah abhilasha makhan lal chaturvediji ko kaisi lagegi ?
इस अनुपम रचना के लिये धन्यवाद,
अन्तिम लाइन मे वजुद खोने की चाह, तो बस too much हो गई, झन्कझोर डाला हे आपने, मेरे अवचेतन मे जो आत्मग्लानि थी, उसी को अल्फ़आज मे देख कर मे अचम्भित हु
You have a very good blog that the main thing a lot of interesting and beautiful! hope u go for this website to increase visitor.
Post a Comment