Tuesday 2 February 2010

अभिलाषा नहीं पुष्प होने की


अभिलाषा नहीं रही पुष्प होने की
चाह होती हैं बस घुटकर रोने की

क्यों चढ़ाया ही जाऊं उस शीश पर
जो सलामी में झुका खोटे सोने की

क्यों जाऊं उन केशों में वेणी बनकर
जहाँ बदबू सी हैं परफ्यूम होने की

उस शहादत के पथ की भी चाह नहीं
कोशिश हैं जहाँ स्याही से लहू धोने की

कुम्हलाता हूँ सफेदपोशों के गले में घुट-घुट
राजनीती हैं देश में बस जादू - टोने की

उजाले की चाह ओ चेतन स्वर कहाँ
सब कोशिश में हैं अँधेरा बोने की

आरज़ू हैं माँ के चरणों में लिपटकर रोऊँ
जुस्तजू हैं 'प्रदीप' वजूद खोने की 

5 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

बहुत खूब!

Unseen Rajasthan said...

Beautiful Words !!! Really appreciate !!

varsha said...

pushp ki yah abhilasha makhan lal chaturvediji ko kaisi lagegi ?

Someshwar said...

इस अनुपम रचना के लिये धन्यवाद,
अन्तिम लाइन मे वजुद खोने की चाह, तो बस too much हो गई, झन्कझोर डाला हे आपने, मेरे अवचेतन मे जो आत्मग्लानि थी, उसी को अल्फ़आज मे देख कर मे अचम्भित हु

Maria Mcclain said...

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