Latest News

Showing posts with label kavita. Show all posts
Showing posts with label kavita. Show all posts

Saturday, October 29, 2016

फिर अंधेरों से क्यों डरें!




प्रदीप है नित कर्म पथ पर
फिर अंधेरों से क्यों डरें!

हम हैं जिसने अंधेरे का
काफिला रोका सदा,
राह चलते आपदा का
जलजला रोका सदा,
जब जुगत करते रहे हम
दीप-बाती के लिए,
जलते रहे विपद क्षण में
संकट सब अनदेखा किए|

प्रदीप हम हैं जो
तम से सदा लड़ते रहे,
हम पुजारी, प्रिय हमें है
ज्योति की आराधना,
हम नहीं हारे भले हो
तिमिर कितना भी घना,
है प्रखर आलोक उज्ज्वल
स्याह रजनी के परे

श्रेष्ठ भारत लक्ष्य सदा है
फिर अंधेरों से क्यों डरें!

Thursday, November 4, 2010

आत्म दीपो भव:


इस दीवाली पर तुम्हारे लिए
केवल खुशी की कामना

मुझसे नहीं होगी



सबको पता है
खुशी अकेली नहीं होती
उसी तरह
जिस तरह उजाला,
अंधेरे बिना नहीं होता


उसी तरह
जैसे सत्य!
झूठ की बुनियाद पर
खड़ा होकर उसी को
हिलाता है।


ठीक वैसे ही
तुम्हारे लिए कामना है
सत्य का उजास
तुम्हें अंधेरे से लडऩे
की ताकत दे
नहीं रहो तुम
उनके भरोसे
जिन्हें विश्वास नहीं
खुद की क्षमताओं पर।


हर अंधेरी गली में
आत्मज्ञान का सहारा मिलने की
शुभ कामना होगी
इस दीप पर्व पर तुम्हारे के लिए

केवल यही तीन शब्द
आत्म दीपो भव: ॥

कैसे केवल शुभत्व की कामना दूं, अशुभत्व भी साथ आएगा
इस दीवाली तुम्हें अशुभत्व का अनुभव मिले यही सोचता हूं
तुम्हारा सच्चा प्रशंसक हूं इसलिए काव्य तुम्हारे लिए रचता हूं
और तुम्हारी निष्कपट आंखों में झांकने से हर बार बचता हूं॥


और यह भी ध्यान रहे
भले अलग-अलग हों दीप
मगर सबका है एक उजाला
सबके सब मिल काट रहे हैं
अंधकार का जाला
किसी एक के भी अंतर का स्नेह न चुकने पाए
तम के आगे ज्योतिपुंज का शीश न झुकने पाए।

ब्लॉग लिखने वाले सभी कलम धनिकों को शुभकामनाएं

Tuesday, August 10, 2010

निराशा



(1)



खिलना चाहता था कहीं सुदूर व्योम में,



बनना चाहता था समिधा किसी होम में।



धूप में भी तो कभी नहीं वो हंस पाया


हवा ओ अंधेरे ने जो 'प्रदीप' बुझाया।।





(2)



थरथराता धुआं



जब मां मेरी बेरोजगारी पर आंसू बहाया करती है,



चुपके से अपनी ही ओढ़नी में आंखें छुपाकर।।



तब इक तीली की तरह ही जलती है उम्मीदें



तन्हा रह जाता है 'प्रदीप' जैसे थरथराता धुआं।।















(3)



बिन 'आका' वाली तेरी लेखनी













आंधी के दीए जितनी ही उम्मीद बचती है,



बिन 'आका' वाली तेरी लेखनी के लिए।



शायद स्याही ने भी छोड़ दिया है 'प्रदीप'



कागज़ों पर उजली सच्चाई बयां करना।।

Tuesday, July 27, 2010

मुझे क्या होना चाहिए?


मैं दर्द होता तो
आपकी आंखों से बहकर
अपना अस्तित्व समाप्त करना चाहता
उस खारे आंसू की तरह जो
देश दुनिया की फिक्र से दूर बच्चों की
आंखों से निश्चल बहा करता है।


मैं खुशी होता तो
आपकी मुस्कुराहट के रूप में
होठों पर बिखरना चाहता
उसी स्वच्छंद
रूप में जब कोई नन्हा शावक
मृगया कर लौटी शेरनी का मुंह चाटता है।


मैं संगीत होता तो
खनखनाकर बजना चाहता
किसी भिखारी के कटोरे में गिरने वाले
उस सिक्के की तरह जिसका कोर्पोरेट जगत
में तो कोई मोल नहीं, लेकिन उस बदहाल
कटोरे के मालिक के लिए बहुतेरा है।


मैं खामोशी होता तो
हमेशा दिखना चाहता कभी
उन नेताओं उशृंखल के चेहरों पर जो
शिक्षकों और उनकी बीवियों पर अश्लील कटाक्ष
करते वक्त भूल जाते हैं अपनी औकात।


मैं क्या हूं
शायद सवाल बहुत बड़ा है
और शब्दों का अस्तित्व थोड़ा।
अब आप थोड़ा सा बता दीजिए
मुझे क्या होना चाहिए।

Monday, July 12, 2010

चित्र नहीं यह तो विचित्र है,

बदल गया अब दौर पुराना,
देखो आया नया जमाना।
बेटी को रस्ते की ठोकर,
कुत्तों को कंधे पे उठाना।

वक्त ने बदसूरत कर डाला,
मां का चेहरा बहुत सुहाना।
जान निछावर अब पशुओं पर,
संतानों को सजा दिलाना।

दुश्मन जानी बने लोग तो,
और पशुओं पर जान लुटाना।
मां फिर बन जाओ मां जैसी,
जो चेहरा जाना पहचाना।

टूट गया नजरों के आगे,
इक सपना था बहुत सुहाना।
अब कैसे नजीर बनोगी,
और दोगी कैसे नजराना।

मां तो हैं अनमोल धरोहर,
मां के कदमों तले जमाना।
संतानों के सुख की चाहत,
सुबह-शाम बस एक ही गाना।

पश्चिम वालों के पिछलग्गू,
की हरकत है यह बचकाना।
मेरे भारत की वसुधा में,
भूले से भी कभी न आना।

चित्र नहीं यह तो विचित्र है,
कैसा है आया नया जमाना।
दिल छोटा सा कर देता है,
यह विकास का ताना-बाना।

अपनों से निबाह भी मुश्किल,
और गैरों को गले लगाना।
मानव रोये तन्हा-तन्हा,
बेदिल के दिल को बहलाना।

नदियां सूखी, रीते कुएं,
पनघट सदियों हुआ पुराना।
बिसलेरी पीने वालों ने,
माटी के जल को क्या जाना।

है प्रमोद की बातें झूठी,
तो सच को किसने पहचाना।

(यह रचना हमारे आदरणीय गुरु प्रमोदजी श्रीमाली ने बंधु आशीष जैन कोटा द्वारा उनके ब्लॉग पर लगाई गई फोटो को देखकर लिखी है। यह तुच्छ प्राणी भी इस फोटो और रचना को अपने ब्लॉग पर डालने का लोभ संवरण नहीं कर पाया।)

Sunday, February 28, 2010

हैप्पी होली हैप्पी होली हैप्पी होली


अल सुबह सूरज ने आँख खोली
धरती के माथे कुंकुम  और रोली
भँवरे गायें तो कलियाँ भी बोली
ब्रज में घूमे रसिओं की टोली

अब आपके चेहरे पर भी तो
मीठी मुस्कराहट हिल डोली  तो
बोलो हैप्पी होली, हैप्पी होली

सभी ब्लॉगर बांधवों और पाठकों को होली की हार्दिक मंगलमयी शुभकामनायें

Sunday, February 14, 2010

मदन महोत्सव पर भी कुछ लिखो-पढो बंधुओं

अक्सर प्रश्न उठता है कि प्रेम क्या है। आज तक प्रेम की कोई सर्वसम्मतपरिभाषा नहीं निकल पाई। इतना जरूर है कि प्रेम को ढाई अक्षरों का नाम देकर किताबों में समेट कर रखा नहीं जा सकता।
जब सोणी ने महिवाल का हाथ थामा होगा अथवा हीर ने रांझे को चाहा होगा, तब कबीर लिखते हैं `ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय…।´

किसने सोचा था कि अरब के अरबपति शाह अमारी का बेटा `कैस´ और नाज्द के शाह की बेटी लैला में दशमिक के मदरसे में पढ़ाई के दौरान उपजा प्रेम लैलामंजनूं के इश्क के रूप में दुनिया में मशहूर होगा और उन दोनों की कब्र दुनियाभर के प्रेमियों की इबादतगाह होगी।
किसने सोचा था कि द्वापर में कृष्ण की उपेक्षा से आहत हुई माधवी नाम की एक गोपी कलिकाल में मीरांबाई बनकर प्रेम के नए अध्याय के रूप में आलौकिक प्रेम को जन्म देगी। यहाँ राधा और मीरां में तुलना करें तो पाएंगे कि राधा को कान्हा के खो देने का डर था और मीरां को विश्वास था कि वह कृष्ण के लिए ही बनी है।
राधा कृष्ण को पाना चाहती थीं और मीरां खुद को सौंपना चाहती थी। इन दोनों में कौन जीता यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन मीरां ने कृष्ण में समाकर साबित कर दिया कि प्रेम में धैर्य, आयास और समर्पण का भाव हो तो ईश्वर को पाना भी मुश्किल नहीं।
 आज की दुनिया संत वेलेंटाइन को प्रेम का आदर्श मानती है। कहते हैं कि जमाना विरह के गीत लिखने का नहीं, फंडू व शायरी वाले एसएमएस-ईमेल का है। युवा पीढ़ी बिछुड़ने की वेदना के अहसास को स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहती। प्रेम केवल एक स्त्री का पुरुष अथवा पुरुष का स्त्री के प्रति का अहसास या भाव नहीं होता।

उनमें आकर्षण होना स्वाभाविक है, लेकिन अब वह जमाना नहीं रहा कि किसी शकुन्तला की वेदना पर कोई कालीदास अभिज्ञानशाकुन्तलम जैसे महाकाव्य की रचना कर बैठे। न वे भाव रहे कि चिमटा न होने के कारण रोटी बनाते समय किसी हामिद की बूढ़ी दादी की जली हुई उंगलियों के दर्द को महसूस कर कोई प्रेमचंद कहानी करे। किसी शबरी के झूठे बेरों की मिठास से प्रभावित होकर कोई तुलसी चौपाइयां लिखे। किसी नन्हें कान्हा के ठुमक-ठुमक कर चलने पर कोई सूरदास छन्द रचे। न तो प्रेम की पीर का कोई घनानंद बचा है और न ही विरह की मारी दरद दीवानी मीरां। आज के वलेंटाइन-डे को वैदिक संस्कृति में मदन महोत्सव के रूप में जाना जाता रहा है, लेकिन न तो आज के लिए लेखकों के लिए वैदिक संस्कृति में वर्णित प्रेम पर कुछ लिखने की सोच है और न ही आज के युवाओं को पढ़ने की फुर्सत।


मिथ्या जीवन के कागज़ पर सच्ची कोई कहानी लिख ,
नीर क्षीर तो लिख ना पाया पानी को तो पानी लिख ।

सारी उम्र गुजारी यूँ ही रिश्तों की तुरपाई में,
दिल का रिश्ता सच्चा रिश्ता बाकि सब बेमानी लिख ।।

हार हुई जगत दुहाई देकर ढाई आखर की हर बार,
राधा का यदि नाम लिखे तो मीरां भी दीवानी लिख।

इश्क मोहब्बत बहुत लिखा है लैला-मंजनूं, रांझा-हीर,
मां की ममता, प्यार बहिन का इन लफ्जों के मानी लिख।।

पोथी और किताबों ने तो अक्सर मन पर बोझ दिया
मन बहलाने के खातिर ही बच्चों की शैतानी लिख

कोशिश करके देख पोंछ सके तो आंसू पोंछ
बांट सके तो दर्द बांटले पीर सदा बेगानी लिख।।


राजस्थान पत्रिका के जालोर एडिशन में १४ फ़रवरी २००८ को प्रकाशित
प्रेम पर दुसरे आर्टिकल के लिए क्लिक करें

Friday, February 12, 2010

जग हित शिव का ज़हर पीना जरूरी है

 
लोग कहते हैं जिंदगी तो हुई मौत से बदतर
जीवन प्रतिमान तय करे वो मीना जरूरी है॥

शान ए अमीरी चाहे औरों को नहीं दिखे
गर फट जाए कपड़ा तो सीना जरूरी है॥

जख्म भले कितने भी दर्दभरे और गहरे
जीवन सार है यही कि सीना जरूरी है॥

नीन्द चाहिए शाम को चादर तान करके तो
दिनभर की मेहनत का पसीना जरूरी है॥

साफ लोग दिखते नहीं दुनियावी भीड़ में
गली में रहने वाला क्यों कमीना जरूरी है?

कब तलक चेतना यूँ ही तडफडाती रहेगी
अंधेरों को अब उजाले से हार खाना जरूरी हैं॥

अब स्याह दिनों सी झूठी श्रद्धा नहीं चाहिए
सच्ची इक शिवरात्रि मन जाना जरूरी हैं॥

चाहे पार्वतियां कंठ पकड़ बैठी रहें रात-दिन
जग हित शिव को ज़हर भी पीना जरूरी है॥

बेटों के ही हाथों लुट रही है मेरी मातृभूमि
वतन की फिक्र करें तो 'प्रदीप' जीना जरूरी हैं॥

सभी पाठकों और ब्लॉगर बन्धु बांधवों को शिवरात्रि की सुभकामनाएँ

Tuesday, February 9, 2010

चाहत...

 
सावन की सी बारिशों में नित भीगने की अब चाह कहाँ,
पुष्प खिले, धरा फले ओ भीगे कंठ इतना सा तो पानी हो

दुनिया जीतने का जज्बा, आसमां चीरने का भी जोश,
कहाँ जाता हैं जब नन्ही सी बेटी से हार खानी हो

ऑस्कर, बुकर और पुलित्ज़र जैसे तमगे किसे चाहिए,
जो सीधे दिल तक उतरे ऐसी मेरी कविता-कहानी हो

रचना यह किसकी? भले कहानी के पात्र हैं कौन?
कोई फरक नहीं पड़ता जब कहने वाली नानी हो

गीत ग़ज़ल छंदों का मौसम, चुका हुआ सा लगता हैं,
मन में ही रहें चाहतें, जब घर में बहन सयानी हो

जब बढ़े अँधेरा, घटे उजाला और चेतना की भी चाह,
कोई बधेतर आस नहीं, बस आँखों में ग्लानी हो

मंदिर बने या मस्जिद? यहाँ इस पचड़े में कौन पड़े,
एक पागल सा खुसरो चाहूं, इक मीरां दीवानी हो

मेरी माँ सी अनिंद्य सुन्दरी इस दुनियां में दूजी कौन,
धरी रहे उपमाएं सारी, जब 'प्रदीप' ने ये ठानी हो

Tuesday, February 2, 2010

अभिलाषा नहीं पुष्प होने की


अभिलाषा नहीं रही पुष्प होने की
चाह होती हैं बस घुटकर रोने की

क्यों चढ़ाया ही जाऊं उस शीश पर
जो सलामी में झुका खोटे सोने की

क्यों जाऊं उन केशों में वेणी बनकर
जहाँ बदबू सी हैं परफ्यूम होने की

उस शहादत के पथ की भी चाह नहीं
कोशिश हैं जहाँ स्याही से लहू धोने की

कुम्हलाता हूँ सफेदपोशों के गले में घुट-घुट
राजनीती हैं देश में बस जादू - टोने की

उजाले की चाह ओ चेतन स्वर कहाँ
सब कोशिश में हैं अँधेरा बोने की

आरज़ू हैं माँ के चरणों में लिपटकर रोऊँ
जुस्तजू हैं 'प्रदीप' वजूद खोने की 

Sunday, January 31, 2010

तेरी कीमत बता गए

हमें सोते हुए से वे कुछ यूँ जगा गए,
फूलों ने दिए थे ज़ख्म वे उन पर नमक लगा गए

कहते थे बहुत समझदार हैं छुटपन से,
बस लाड प्यार में उनके जरा कदम डगमगा गए

टूटा कईयों का झूठा यकीं तो कोई बात नहीं,
मुझसे लिया था उधर देकर मुझी को दगा गए

कहते थे जाने नहीं देंगे ज़माने से दूर हमें,
खुद जाकर शहर में हमारी बोली लगा गए

कहते दुनिया बड़ी जालिम और खुद बड़े भोले
पर कमीने थे वे मुझ को  सोते से जगा गए

बिकने से बचाया था कभी मैंने बाज़ार में
आज वे 'प्रदीप' तेरी कीमत बता गए

Wednesday, January 20, 2010

माँ शारदे, माँ शारदे, माँ शारदे ...


माँ शारदे, माँ शारदे, माँ शारदे ...
नेत्र तुम्हारे मोती जैसे
वर्ण तुम्हारा जैसे कंचन
मेरी जिह्वा तू विराजे
चेतना  दे जीवन तार दे
माँ शारदे, माँ शारदे, माँ शारदे ...

तेरे सुयश को गा सकूँ
हर जन्म तुझको पा सकूं
पद कमल को नहला सकूँ
इतना मुझे अधिकार दे
माँ शारदे, माँ शारदे, माँ शारदे ...

मात मेरी तू मै पुत्र तेरा
तेरे बिन जीवन में अँधेरा
कलम सूखे गर तू न तूठे
इस 'प्रदीप' को तू प्यार दे
माँ शारदे, माँ शारदे, माँ शारदे ...
 
बसंत पंचमी पर सभी कलमकारों को बधाइयाँ

- प्रदीपसिंह

Monday, January 18, 2010

तू कवि है तेरे घाव कैसे भर पाएंगे


तू कवि है तेरे घाव कैसे भर पाएंगे



टूटे रिश्ते बिखरे सम्बंध मांग रहे हैं जीवन की परिभाषा
उनके आकुल होठ नहीं समझते मेरे नयनों की भाषा


स्याह रात की खामोश उदासी लगती सदा आंसू झेलती
उसकी पीड़ा से छोटा लगता विंध्याचल का आंचल
जब भूख देती है दलीलें तो दर्द कैसे समझ पाएगा
तेरे आगे मर रहा है राष्ट्र तेरा तू कैसे सह पाएगा
अनजानी आशंकाएं, काटें और बाधाएं

ये सब मिलकर
मुश्किल तेरा जीना कर जाएंगे
तू कवि है तेरे घाव कैसे भर पाएंगे...


कभी अम्बर पिघलाने वाली वे व्याकुल सांसें देख
पाश्चात्य परिधानों पर मिटती हुईं ये आंखें देख
देख आंसूओं के मोल पर मुस्कानों के सौदे होते
फूलों के लिए गैरों के पथ में देख उन्हें तू कांटे बोते

लुटती मां बहिनों के चीर
हर संस्कृति वधिक के तीर
छलनी तेरा सीना कर जाएंगे
तू कवि है तेरे घाव कैसे भर पाएंगे...


कलरव गर सौंपे सूनापन, अभाव सौंपे तुझको भाव
पीड़ा तुम्हें मुस्कुराहट देती, हंसते फूल दिलाते घाव
नदियों की धीमी गतियों में, सुन तू सदा आशा के गीत
पहाड़ों पर झरते निरझर में, तू देख सदा जीवन-संगीत

पीड़ा की इस पाठशाला में,
वेदना की खारी हाला में
देख लिया गर अखबार आज का
तेरे छोटे बच्चे डर जाएंगे
तू कवि है तेरे घाव कैसे भर पाएंगे...


दर्द गर सौंपे खुशियां तो चहकने में है क्या बुराई
छोड़ चिन्ता, जुटा रह कर्म में भले हो जग में हंसाई
घावों से बहता रक्त, पीड़ा का दामन भर जाएगा
क्या तेरा है क्या मेरा है कहते कहते मर जाएगा

सूखे घावों को और हरा तू होता देख
जीवन के मूल्य पर चाहत-आशा खोता देख
चाह औषधि, कर भले अनगिनत जतन
पुराने भर गए तो वे हरे कर जाएंगे

तू कवि है तेरे घाव कैसे भर पाएंगे...

Monday, January 11, 2010

विवेकानंद जयंती

स्वामी जी की वह रचना मुझे बहुत अच्छी लगी जिसमे कहा गया


सर्प अपने फन तभी फैलाता है,  जब उसे चोट लगती है।
अग्नि तभी धधक कर जलती है जब वह बुझने को होती है।

शेर की गर्जना तभी लोगो को कम्पित करती है,
जब वह खुले रेगिस्तान में दहाड़ता है।

बादलों से बरसात तभी होती है,
जब बादलों के ह्रदय में बिजली तड़पती है।

वैसे ही एक इन्सान की उत्तमता तभी सामने आती है,
जब वह अपने अंतरात्मा से काम लेता है ।
अतः ------
चाहे आँखें धुधली हो जाय, चाहे कान बहरे हो जाय।
चाहे दोस्ती टूट जाए, चाहे प्यार तबाह हो जाए।
चाहे भाग्य तुम्हे हजार ग़मों के कुएं में धकेल दे,
चाहे प्रकृति तुमसे नाराज हो जाए,
और तुम्हे तहस नहस कर दे,
यदि तुम स्वयं को जानते हो,
तो तुम ईश्वरीय हो, तुम्हे कोई नहीं हरा सकता।
क्या मुमकिन क्या नामुमकिन बगैर किसी परवाह के,
आगे बड़े चलो,  बड़े चलो,  बड़े चलो
और जीत कर दिखा दो पुरी दुनिया को,
इस भारतीय आत्मा की महान शक्ति को।

Tuesday, January 5, 2010

मैं कलम! बस थोड़ा सा जीना चाहती हूं


मैं कलम! बस थोड़ा सा जीना चाहती हूं
गहरे है ज़ख्म तनिक सीना चाहती हूं


हावी अधिकार, बंटता मजहब मरते लोग
गौण कर्तव्य, मौन स्वधर्म, नहीं ईश से योग
सब हंसे, सब सुखी वो मीना चाहती हूं
मैं कलम...


बिकती बहनों, भूखी मांओं, नंगे बच्चों
लुटती पांचाली, वधित क्रौंचों को देख
गरल सारे जहान का मैं पीना चाहती हूं
मैं कलम...


संबंध ओ अनुबंध है परिभाषाएं मांगते
स्वप्न सोए सारे नयनों की भाषाएं मांगते
लिखुं तो छलनी हो वो सीना चाहती हूं
मैं कलम...


निशब्दों के बोल बनूं, आंसुओं की आशा
चेतना के स्वर बन, बनुं उजाले की भाषा
खुद में 'प्रदीप' जलाकर जीना चाहती हूं
मैं कलम...

Wednesday, December 9, 2009

मैं आंसू



मैं आंसू
हृदय की अंतरतम् विवशता का सत्कार
विरह-वेदना का सशक्त हस्ताक्षर

साक्षात पीड़ा का अनुभाविक प्रतिनिधि
दु:ख और दर्द का मौन साक्षात्कार

भावाभिव्यक्ति का मूक माध्यम तो कभी
अनिवर्चनीय खुशी का खामोश प्रतिबिम्ब

कभी कलेजे तो कभी आंखों से
चुपचाप बहता हूं
कभी निश्चल तो
कभी चंचल होकर
गहरी बात कहता हूं

दुनिया में बहुत हैं
इसे पीने वाले
कम नहीं
इसके साथ जीने वाले भी

हां कई ऐसे भी है
जो मुझे मार डालते हैं
अपनी आंखों में ही घोटकर

बनावटभरी इस दुनिया में
बनावट ओ साज सिंगार किया है
हंसी और खुशी दोनों ने।

मैं आज भी नहीं बदला
न ही बदला
मेरा रूप, रंग, स्वाद और अर्थ
मैं रंगहीन रहा,
लेकिन अर्थहीन नहीं।

करता हूं उनकी मदद
जब वो खामोश
और निशब्द होते हैं

जिनकी आत्मा के शब्द
ज़बां का साथ नहीं देते

मैं चुपचाप केवल तब
केवल और तभी बहता हूं
जब बहरे और स्वार्थी कानों से
कहना चाहता हूं बहुत कुछ
मौन होकर।

या उस समय जब
जब नहीं होते
किसी के पास शब्द
अपनी पीड़ा, विरह, वेदना,
दर्द, हंसी, खुशी और भावों
को कहने के।

तब मौन होकर धीरे-धीरे
आंखों से गालों पर दिखता हूं
विवश और मूक ज़बां की भाषा
खारे पानी से लिखता हूं।

Tuesday, December 8, 2009

कुछ निराशावादी लाइनें जिनकी आस नहीं थी...

निराशा
(1)
खिलना चाहता था कहीं सुदूर व्योम में,
बनना चाहता था समिधा किसी होम में।
धूप में भी तो कभी नहीं वो हंस पाया
हवा ओ अंधेरे ने जो 'प्रदीप' बुझाया।।


(2)
थरथराता धुआं
जब मां मेरी बेरोजगारी पर आंसू बहाया करती है,
चुपके से अपनी ही ओढ़नी में आंखें छुपाकर।।
तब इक तीली की तरह ही जलती है उम्मीदें
तन्हा रह जाता है 'प्रदीप' जैसे थरथराता धुआं।।


(3)
बिन 'आका' वाली तेरी लेखनी

आंधी के दीए जितनी ही उम्मीद बचती है,
बिन 'आका' वाली तेरी लेखनी के लिए।
शायद स्याही ने भी छोड़ दिया है 'प्रदीप'
कागज़ों पर उजली सच्चाई बयां करना।।

Wednesday, November 25, 2009

पैसे खाए तो जाएंगे जेल

कल के अखबार में
सीएम सर का शीर्षक छपा
पैसे खाए तो जाएंगे जे



एक होटल के बार में बैठे
पैसे खाने वालों ने पढ़ा

जेल में भेज देंगे तो
चले जाएंगे।
है तो वहां भी है मौज

'सत्यम्' वाले 'राजू' के लिए
जेल में चिकन आ सकता है
तो अपन का कुनबा भी
दारू मीट मंगवा सकता है।

रियल इस्टेट वाला बोला
भाई! देखो अपन तो
पैसे नहीं खाते हैं
जो भी माल है अपना
सीधे माल से बनाते हैं।
सिर्फ और सिर्फ डामर,
कंकरीट और सीमेंट खाते हैं।

Friday, November 20, 2009

मेरी मां

मैं तुम्हे लफ्ज-लफ्ज पढ़ना चाहता हूं

देखना चाहता हूं कि तुम क्या हो
चाहता हूं तुम्हें अक्षर-अक्षर समझना

तब तुम मुझे मिलती हो गीता के श्लोकों में
कुरान की आयातों में
बाइबिल की शिक्षाओं में गुरु ग्रंथ के शबदों में
तुलसी की चौपाइयों में
सूर के छन्दों में, मीरां के गीतों में

तब सोचना चाहता हूं कि
तू सब रिश्तों में सबसे बड़ी क्यों है
क्यों मैं सदियों से तुझे सबसे बड़ा बताता हूं

तुझ पर कविताएं रचता हूं
कहानियां लिखता हूं,
क्यों तू मेरे लिए उससे भी झगड़ पड़ती है
जो तेरा परमेश्वर है

जितना सोचता हूं उतना उलझता हूं
उस उलझन का उपाय खोजते-खोजते
थक जाता हूं तो तेरा आ¡चल ही क्यों सुकूं देता है।

इन सवालों के जवाब ढूंढते-ढूंढते
क्यों गुजार चुका हूं कई सदियां
शायद इसलिए क्योंकि तू दुनिया की सबसे सुन्दर कृति है
तेरी भावनाओं को समझ पाना मेरे बस की बात नहीं

पर तू मुझे परख लेती है
क्योंकि तेरी ही गोद से ले चुका हूं मैं हजारों जन्म
तू इस सृष्टि में लाने का हेतु है और तू ही सहारा।

तब जवाब मिलता है कि तू उस शक्ति का स्वरूप है
जो इस सृष्टि का कारण है
इसलिए तो तुम शक्तिस्वरूपा मेरी मां हो।

Friday, October 16, 2009

जले दीप खुशहाली के

अकाल का मौसम होने के बावजूद चेहरे पर मुस्कराहट। यही जीवंतता है इस देश की। देशभर में दीपावली का त्योहार मनाया जा रहा है। नन्हे-नन्हे दीपक उजास का संदेश देते हुए तमस से लड़ने का आuान कर रहे हैं। दीपक प्रतीक है जीवंतता का। चैतन्यता का। कैसा जीवंत दर्शन है कि मिट्टी से बनने वाला दीपक अपने जीवन को जलकर सार्थक करता है। मिट्टी से दीपक बनने और मिट्टी में मिलने तक के सफर को जानें तो समझ आएगा कि दीपक अपना जीवन सहज में ही पूरा नहीं करता है। मिट्टी से उठाकर गधे पर लादा जाता है तो शर्म आती होगी। वहां से लाकर उसे कूटा जाता है तो पीड़ा होती होगी। पानी में गलाया जाता है तो वेदना होती होगी। चाक पर चलाते वक्त चक्कर आते होंगे। उतारते वक्त डोरे से काटकर मिट्टी से अलग कर दिया जाता है और एक सुंदर रूप मिलता है। इस पर रंग होता हैं तो आत्मश्लाघा का भाव भी आ सकता है, लेकिन तुरंत बाद इसे आग में तपाया जाता है और उसका रूप निखरता है। जन्म होता है एक दीपक का। इसके बाद मोलभाव और बिकने का दौर। अब साथियों से बिछुड़ने का विरह। खरीदकर घर लाया जाता है। गृहस्वामिनी द्वारा इन्हें धोने के बाद तेल और बाती से मुलाकात और फिर एक लौ के माध्यम से इसकी जवानी और जिंदगी दोनों जलते हैं। तेल पूरा होता है तो एक अंतिम भभक और जीवन समाप्त। सुबह उठाकर सड़क पर फेंक दिया जाता है कोई वाहन दीपक पर से गुजरता है और जीवन समाप्त।
यह कहानी है एक दिए की। शर्म, पीड़ा, प्रताड़ना, आत्मश्लाघा और गौरव समेत सारे भावों को अपने में संजोकर जीने वाला दीपक अपने जीवन को जिस तरह पूरा करता है। उसी तरह एक इंसान के जीवन में भी ये क्षण और भाव आते हैं जब उसे पीड़ा, ताड़ना, शर्म, वेदना अथवा विरह महसूस करना पड़ता है।

इसलिए कहा है
देता रहे जीवन ज्योति तू कण-कण को जला के।
अस्तित्व मिटा के।
तूफान भी मचलेंगे हिलेगी शमां भी
बुझ जाएंगे दीपित दीप ओ छाएगी तमा भी।
किंचित न बुझे जलता ही रहे जीवन को जला के।
अस्तित्व मिटा के।

इसी दीपावली पर हम संकल्प लें इन्हीं दीपकों की तरह अवरोधों से लड़ने का। दीपक का निर्दोष उजाला हमारे जीवन चरित्र को इतना उज्ज्वल बनाए कि हम हर बार किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति से निकलें और हम अपना स्वधर्म निभाएं। हमारा यही स्वधर्म राष्ट्र को प्रगति के पथ पर अग्रसर करे और खुशहाली के दीप जलें।

अलग-अलग हैं दीप मगर सबका है एक उजाला,
सबके सब मिल काट रहे हैं अंधकार का जाला।
किसी एक के भी अंतर का स्नेह न चुकने पाए,
तम के आगे ज्योति पुंज का दीप न बुझने पाए॥

Total Pageviews

Recent Post

View My Stats