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Friday, December 31, 2010

स्वागत है नव मिहीर तुम्हारा...


स्वागत है नव दशक के मिहीर तुम्हारा
उजले चैतन्य स्वर गुंजाए संदेश हमारा

तिमिर हर, प्रकाश भर, जगमग जीवन
खुशियों से आंचल भर नाचे जग सारा

पुष्पाच्छादित हों राह, पूरी हों सब चाह
सभी के लिए स्वीकारें यही शुभत्व प्यारा

मरे महंगाई डायन ओ जले भ्रष्ट आचार
हर गली कोने गूंजे भारतीयता का नारा

सबमें स्नेह भाव औ सहयोग सदा ही रहे
मधुरम हो जाए दुश्मनी का सागर खारा

हर कदम रहे सफलता की उजली राह
सिर उठाए तिमिर तो जले ‘प्रदीप’ प्यारा


ब्लॉग लेखन करने वाले सभी कलम धनिकों और पाठकों को नव दशक के आगमन पर कोटिश: शुभकामनाएं।

-प्रदीप बीदावत, राजस्थान पत्रिका, पाली
09983831415

Monday, January 11, 2010

विवेकानंद जयंती

स्वामी जी की वह रचना मुझे बहुत अच्छी लगी जिसमे कहा गया


सर्प अपने फन तभी फैलाता है,  जब उसे चोट लगती है।
अग्नि तभी धधक कर जलती है जब वह बुझने को होती है।

शेर की गर्जना तभी लोगो को कम्पित करती है,
जब वह खुले रेगिस्तान में दहाड़ता है।

बादलों से बरसात तभी होती है,
जब बादलों के ह्रदय में बिजली तड़पती है।

वैसे ही एक इन्सान की उत्तमता तभी सामने आती है,
जब वह अपने अंतरात्मा से काम लेता है ।
अतः ------
चाहे आँखें धुधली हो जाय, चाहे कान बहरे हो जाय।
चाहे दोस्ती टूट जाए, चाहे प्यार तबाह हो जाए।
चाहे भाग्य तुम्हे हजार ग़मों के कुएं में धकेल दे,
चाहे प्रकृति तुमसे नाराज हो जाए,
और तुम्हे तहस नहस कर दे,
यदि तुम स्वयं को जानते हो,
तो तुम ईश्वरीय हो, तुम्हे कोई नहीं हरा सकता।
क्या मुमकिन क्या नामुमकिन बगैर किसी परवाह के,
आगे बड़े चलो,  बड़े चलो,  बड़े चलो
और जीत कर दिखा दो पुरी दुनिया को,
इस भारतीय आत्मा की महान शक्ति को।

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