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Tuesday, August 10, 2010

निराशा



(1)



खिलना चाहता था कहीं सुदूर व्योम में,



बनना चाहता था समिधा किसी होम में।



धूप में भी तो कभी नहीं वो हंस पाया


हवा ओ अंधेरे ने जो 'प्रदीप' बुझाया।।





(2)



थरथराता धुआं



जब मां मेरी बेरोजगारी पर आंसू बहाया करती है,



चुपके से अपनी ही ओढ़नी में आंखें छुपाकर।।



तब इक तीली की तरह ही जलती है उम्मीदें



तन्हा रह जाता है 'प्रदीप' जैसे थरथराता धुआं।।















(3)



बिन 'आका' वाली तेरी लेखनी













आंधी के दीए जितनी ही उम्मीद बचती है,



बिन 'आका' वाली तेरी लेखनी के लिए।



शायद स्याही ने भी छोड़ दिया है 'प्रदीप'



कागज़ों पर उजली सच्चाई बयां करना।।

Tuesday, January 5, 2010

मैं कलम! बस थोड़ा सा जीना चाहती हूं


मैं कलम! बस थोड़ा सा जीना चाहती हूं
गहरे है ज़ख्म तनिक सीना चाहती हूं


हावी अधिकार, बंटता मजहब मरते लोग
गौण कर्तव्य, मौन स्वधर्म, नहीं ईश से योग
सब हंसे, सब सुखी वो मीना चाहती हूं
मैं कलम...


बिकती बहनों, भूखी मांओं, नंगे बच्चों
लुटती पांचाली, वधित क्रौंचों को देख
गरल सारे जहान का मैं पीना चाहती हूं
मैं कलम...


संबंध ओ अनुबंध है परिभाषाएं मांगते
स्वप्न सोए सारे नयनों की भाषाएं मांगते
लिखुं तो छलनी हो वो सीना चाहती हूं
मैं कलम...


निशब्दों के बोल बनूं, आंसुओं की आशा
चेतना के स्वर बन, बनुं उजाले की भाषा
खुद में 'प्रदीप' जलाकर जीना चाहती हूं
मैं कलम...

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