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Wednesday, March 2, 2011

हम तकरार में, वे गालियों के सार में




खुश थे जब डाले झूठ-झूठ के ही हार गले में
आइना सच का दिखाया तो तकरार में आ गए

बिकने से बचाते रहे उनको अक्सर नीलामी में
कीमत लगाने हमारी वे खुद बाजार में आ गए

भूख अब हमारे घर के दरवाजे पर ही सोती है
आजादी के बाद आरक्षण के बुखार में आ गए

घुटनों के बल चला करते थे रोते-लडख़ड़ाते
‘खेल’ क्या हुए वे सरकारी कार में आ गए

कभी नारे-जयकारे खुद के लगवाते नहीं थकते
आज बात वतन की चली तो उतार में आ गए

पहले दो-चार नारे लगा जिताया था दूसरों को
खान-पम्प-ठेके मिले, फिर व्यापार में आ गए

भीख मांगने की अदावत कहें कि देश का नसीब
जम्हूरियत में सिर गिना अब सरकार में आ गए

चार कलम घसीटिए दोस्त क्या हुए जनाब के 
हुजूर के सिर के कीड़े भी अखबार में आ गए

कभी स्वागतम्, अब घर पे लिख प्रवेश निषेध
साहब के साथ-साथ कुत्ते भी दरबार में आ गए

तकनीक भी लगी इनके दामन उजले करने में
ब्लॉग-फेसबुक-ट्विटर के अशरार में आ गए

हमारी ही कहते रहे तो बनेंगे मुंह मियां मिट्ठू
उनकी क्या कहें वे गालियों के सार में आ गए


Tuesday, July 27, 2010

मुझे क्या होना चाहिए?


मैं दर्द होता तो
आपकी आंखों से बहकर
अपना अस्तित्व समाप्त करना चाहता
उस खारे आंसू की तरह जो
देश दुनिया की फिक्र से दूर बच्चों की
आंखों से निश्चल बहा करता है।


मैं खुशी होता तो
आपकी मुस्कुराहट के रूप में
होठों पर बिखरना चाहता
उसी स्वच्छंद
रूप में जब कोई नन्हा शावक
मृगया कर लौटी शेरनी का मुंह चाटता है।


मैं संगीत होता तो
खनखनाकर बजना चाहता
किसी भिखारी के कटोरे में गिरने वाले
उस सिक्के की तरह जिसका कोर्पोरेट जगत
में तो कोई मोल नहीं, लेकिन उस बदहाल
कटोरे के मालिक के लिए बहुतेरा है।


मैं खामोशी होता तो
हमेशा दिखना चाहता कभी
उन नेताओं उशृंखल के चेहरों पर जो
शिक्षकों और उनकी बीवियों पर अश्लील कटाक्ष
करते वक्त भूल जाते हैं अपनी औकात।


मैं क्या हूं
शायद सवाल बहुत बड़ा है
और शब्दों का अस्तित्व थोड़ा।
अब आप थोड़ा सा बता दीजिए
मुझे क्या होना चाहिए।

Saturday, May 1, 2010

अंधेरे में उजले अक्षरों की तलाश


नजारा-एक
छोटू जरा चाय लाना!
आज श्रमिक दिवस है। चाय की एक थड़ी पर जमा चार लोग अखबार में छपी एक कृशकाय बच्चे की तस्वीर पर चर्चा कर रहे हैं। यह बच्चा बाल श्रमिक है, जो जवाहरात के नाजुक लेकिन खतरनाक काम को अपनी नन्ही अंगुलियों से बखूबी अंजाम दे रहा है। चारों की अलग-अलग राय है। एक बच्चे की स्थिति पर संबोधित है तो दूसरा लोकतंत्र की बदहाली को कोस रहा है। तीसरे का कहना है कि नन्हे बच्चों से इतना खतरनाक काम करने वाले लोगों को जेल में डाल देना चाहिए। यह बहस लम्बी और बोरियत भरी न हो इसके लिए चौथा व्यक्ति आवाज लगाता है, छोटू जरा चाय लाना!

नजारा-दो
क्या सोचता है छोटू

कहने को तो ‘छोटू’ हिन्दुस्तान का भविष्य के नाम से भी पुकारा जाता है, लेकिन उसे नहीं मालूम कि उसका भविष्य कैसा होगा। बस वर्तमान में जैसे-तैसे जी रहा है। चाय के गिलासों में घूमती उसकी नन्ही अंगुलियां शायद ही किसी उड़ते पंछी को कागज पर कलम से आकार दे पाती हो। बस धुन गिलास धोने और भगोने मांजने की है। समूह में घूमकर प्लास्टिक की थैलियां बीनने की होड़ वाले उसके जैसे ही कुछ और बच्चे, जिनके मुंह में सस्ता गुटखा या पान मसाला भरा हुआ है और भी अधिक बेखबर हैं। जि़ंदगी में कभी कोई नूरानी लम्हा आएगा तो किस रूप में। यह कभी सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली। वह बस तो साहब के ऑर्डर की ओर चल देता है।

नजारा-तीन
साहब क्या कहते हैं
ऐसा क्यों होता है। इस विषय पर चिन्तन करने से पहले तीसरे नजारे पर नजर डालते हैं। एक साहब बाल श्रम अधिकारी हैं। पोस्टिंग औद्योगिक इकाइयों के लिहाज से एक बड़े शहर में है। सर्वे करते-करते हालत खराब होने लगती है। उनकी मैडम सरकारी मुलाजिम हैं। लिहाजा घर का काम करने के लिए कोई चाहिए। साहब आज एक औद्योगिक प्रतिष्ठान में बाल श्रमिकों के बारे में जानकारी लेने आए हैं। मालिक से मुखातिब होते हुए कहते हैं ‘सरजी! कोई ढंग का छोरा बताइए ना जो घर का काम बेहतर तरीके से कर सके।’

तीनों स्थितियों पर गौर किया जाए तो ये हमारे आस-पास ही नजर आ जाएंगी। नरेगा कार्र्यों में बाल श्रमिक लगाए जाने की खबरें भी समाचार पत्रों के माध्यम से आई, लेकिन श्रम विभाग ने कभी भी निरीक्षण की जहमत नहीं उठाई। देश में बाल श्रमिकों की स्थिति कैसी है इसकी एक नज़ीर ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ ने प्रस्तुत की और फिल्म ऑस्कर अवार्ड से नवाजी गई। उन्होंने झुग्गी-झोंपडिय़ोंवाला हिन्दुस्तान दिखाया और विदेशियों को पसंद आया। फिल्म अवार्ड ले गई, लेकिन सरकार ने ऐसे बच्चों को चिह्निïत करने की दिशा में विशेष कदम नहीं उठाया।

क्यों नहीं होते मामले दर्ज
देश में श्रम विभाग की ओर से दर्ज बाल श्रम के मामलों में चाय की थडिय़ों और होटलों पर दर्ज बाल श्रम के अधिकांश मामलों में कार्रवाई नहीं हो पाती। इनके मालिक बाल श्रम अधिनियम की धारा 3 के प्रावधान को हथियार बनाते हैं। इसके तहत बच्चों को अभिभावकों की देखरेख में काम करने की अनुमति है। बाल श्रमिकों को नियोजित करने वाले लोग अपने मजदूरों को अपना ही पुत्र बताकर केस रफा-दफा करवा लेते हैं।

भौंचक रह गया देश
पुलिस, श्रम विभाग और संगठन प्रथम की मदद से प्रशासन ने बाल श्रम बचाव के लिए 21 नवम्बर 2005 को दिल्ली के 100 अवैध बेलबूटा कारखानों के 488 बच्चों को बचाया था। ताज्जुब करने लायक बात तो यह थी कि इन बच्चों की उम्र पांच-छह वर्ष से अधिक नहीं थी। ये कारखाने सीलमपुर की गंदी बस्ती में चल रहे थे। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की नाक के नीचे हो रहे बाल श्रम ने सरकार की आंखें खोलकर रख दी। भारत में ज्यादातर नन्हे बच्चे महीन काम करने में लगाए जाते हैं। इसका कारण उनकी अंगुलियां छोटी होना होता है। जरी, हाथ कढ़ाई, मखमल से सम्बन्धित काम, चमड़े के बेग बनाने, लाख की जड़ाई और जवाहरात आदि कामों में नन्हे बच्चों का उपयोग होता है। यूनिसेफ के अनुसार दुनिया में दो वर्ष से 17 वर्ष तक की उम्र के 250 मिलियन बच्चे श्रमिक के तौर पर काम कर रहे हैं।

सच भी लगे हैरानी जैसा
पाली की औद्योगिक इकाइयों में भी बाल श्रमिकों की संख्या जीरो। बात कुछ हजम नहीं होती, लेकिन सरकारी कारकूनों के अनुसार यह बात सौ फीसदी सच है। ऐसे में तीसरी तस्वीर जो साहब क्या सोचते हैं हमारे जेहन में आती है। पाली में साड़ी फोल्डिंग के काम, प्रिंटिंग मशीन आदि पर काम करने वाले श्रमिकों का हिसाब शायद श्रम विभाग ने कभी नहीं लिया। चूंकि श्रम विभाग की ओर से सर्वे किए हुए एक लम्बा अरसा बीत चुका है, ऐसे में चाय की थडिय़ों, होटलों और निजी संस्थानों में बाल श्रमिक होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

राजस्थान पत्रिका के पाली संस्करण में 1 मई २०१० को प्रकाशित

Sunday, February 28, 2010

हैप्पी होली हैप्पी होली हैप्पी होली


अल सुबह सूरज ने आँख खोली
धरती के माथे कुंकुम  और रोली
भँवरे गायें तो कलियाँ भी बोली
ब्रज में घूमे रसिओं की टोली

अब आपके चेहरे पर भी तो
मीठी मुस्कराहट हिल डोली  तो
बोलो हैप्पी होली, हैप्पी होली

सभी ब्लॉगर बांधवों और पाठकों को होली की हार्दिक मंगलमयी शुभकामनायें

Sunday, February 14, 2010

मदन महोत्सव पर भी कुछ लिखो-पढो बंधुओं

अक्सर प्रश्न उठता है कि प्रेम क्या है। आज तक प्रेम की कोई सर्वसम्मतपरिभाषा नहीं निकल पाई। इतना जरूर है कि प्रेम को ढाई अक्षरों का नाम देकर किताबों में समेट कर रखा नहीं जा सकता।
जब सोणी ने महिवाल का हाथ थामा होगा अथवा हीर ने रांझे को चाहा होगा, तब कबीर लिखते हैं `ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय…।´

किसने सोचा था कि अरब के अरबपति शाह अमारी का बेटा `कैस´ और नाज्द के शाह की बेटी लैला में दशमिक के मदरसे में पढ़ाई के दौरान उपजा प्रेम लैलामंजनूं के इश्क के रूप में दुनिया में मशहूर होगा और उन दोनों की कब्र दुनियाभर के प्रेमियों की इबादतगाह होगी।
किसने सोचा था कि द्वापर में कृष्ण की उपेक्षा से आहत हुई माधवी नाम की एक गोपी कलिकाल में मीरांबाई बनकर प्रेम के नए अध्याय के रूप में आलौकिक प्रेम को जन्म देगी। यहाँ राधा और मीरां में तुलना करें तो पाएंगे कि राधा को कान्हा के खो देने का डर था और मीरां को विश्वास था कि वह कृष्ण के लिए ही बनी है।
राधा कृष्ण को पाना चाहती थीं और मीरां खुद को सौंपना चाहती थी। इन दोनों में कौन जीता यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन मीरां ने कृष्ण में समाकर साबित कर दिया कि प्रेम में धैर्य, आयास और समर्पण का भाव हो तो ईश्वर को पाना भी मुश्किल नहीं।
 आज की दुनिया संत वेलेंटाइन को प्रेम का आदर्श मानती है। कहते हैं कि जमाना विरह के गीत लिखने का नहीं, फंडू व शायरी वाले एसएमएस-ईमेल का है। युवा पीढ़ी बिछुड़ने की वेदना के अहसास को स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहती। प्रेम केवल एक स्त्री का पुरुष अथवा पुरुष का स्त्री के प्रति का अहसास या भाव नहीं होता।

उनमें आकर्षण होना स्वाभाविक है, लेकिन अब वह जमाना नहीं रहा कि किसी शकुन्तला की वेदना पर कोई कालीदास अभिज्ञानशाकुन्तलम जैसे महाकाव्य की रचना कर बैठे। न वे भाव रहे कि चिमटा न होने के कारण रोटी बनाते समय किसी हामिद की बूढ़ी दादी की जली हुई उंगलियों के दर्द को महसूस कर कोई प्रेमचंद कहानी करे। किसी शबरी के झूठे बेरों की मिठास से प्रभावित होकर कोई तुलसी चौपाइयां लिखे। किसी नन्हें कान्हा के ठुमक-ठुमक कर चलने पर कोई सूरदास छन्द रचे। न तो प्रेम की पीर का कोई घनानंद बचा है और न ही विरह की मारी दरद दीवानी मीरां। आज के वलेंटाइन-डे को वैदिक संस्कृति में मदन महोत्सव के रूप में जाना जाता रहा है, लेकिन न तो आज के लिए लेखकों के लिए वैदिक संस्कृति में वर्णित प्रेम पर कुछ लिखने की सोच है और न ही आज के युवाओं को पढ़ने की फुर्सत।


मिथ्या जीवन के कागज़ पर सच्ची कोई कहानी लिख ,
नीर क्षीर तो लिख ना पाया पानी को तो पानी लिख ।

सारी उम्र गुजारी यूँ ही रिश्तों की तुरपाई में,
दिल का रिश्ता सच्चा रिश्ता बाकि सब बेमानी लिख ।।

हार हुई जगत दुहाई देकर ढाई आखर की हर बार,
राधा का यदि नाम लिखे तो मीरां भी दीवानी लिख।

इश्क मोहब्बत बहुत लिखा है लैला-मंजनूं, रांझा-हीर,
मां की ममता, प्यार बहिन का इन लफ्जों के मानी लिख।।

पोथी और किताबों ने तो अक्सर मन पर बोझ दिया
मन बहलाने के खातिर ही बच्चों की शैतानी लिख

कोशिश करके देख पोंछ सके तो आंसू पोंछ
बांट सके तो दर्द बांटले पीर सदा बेगानी लिख।।


राजस्थान पत्रिका के जालोर एडिशन में १४ फ़रवरी २००८ को प्रकाशित
प्रेम पर दुसरे आर्टिकल के लिए क्लिक करें

Friday, February 12, 2010

जग हित शिव का ज़हर पीना जरूरी है

 
लोग कहते हैं जिंदगी तो हुई मौत से बदतर
जीवन प्रतिमान तय करे वो मीना जरूरी है॥

शान ए अमीरी चाहे औरों को नहीं दिखे
गर फट जाए कपड़ा तो सीना जरूरी है॥

जख्म भले कितने भी दर्दभरे और गहरे
जीवन सार है यही कि सीना जरूरी है॥

नीन्द चाहिए शाम को चादर तान करके तो
दिनभर की मेहनत का पसीना जरूरी है॥

साफ लोग दिखते नहीं दुनियावी भीड़ में
गली में रहने वाला क्यों कमीना जरूरी है?

कब तलक चेतना यूँ ही तडफडाती रहेगी
अंधेरों को अब उजाले से हार खाना जरूरी हैं॥

अब स्याह दिनों सी झूठी श्रद्धा नहीं चाहिए
सच्ची इक शिवरात्रि मन जाना जरूरी हैं॥

चाहे पार्वतियां कंठ पकड़ बैठी रहें रात-दिन
जग हित शिव को ज़हर भी पीना जरूरी है॥

बेटों के ही हाथों लुट रही है मेरी मातृभूमि
वतन की फिक्र करें तो 'प्रदीप' जीना जरूरी हैं॥

सभी पाठकों और ब्लॉगर बन्धु बांधवों को शिवरात्रि की सुभकामनाएँ

Thursday, February 11, 2010

बायां री बंशी बाजैला, अलगोजो ठण्डो भायां रो...

 जिला परिषद एवं पंचायत समिति चुनाव में महिलाओं का दबदबा


बायां री बंशी बाजैला, अलगोजो ठण्डो भायां रो।
मोट्यारां नीची मूंछ करो, आयो राज लुगायां रो॥
जालोर। पचास प्रतिशत आरक्षण का तोहफा मिलने के बाद इस बार जालोर जिले के पंचायतीराज चुनावों में नारी सशक्त होकर उभरी है। पन्द्रह सीटों पर आरक्षण होने के बावजूद जालोर जिला परिषद में सत्रह सीटों पर महिलाओं ने जीत दर्ज की है। वहीं पंचायत समितियों की कुल 162 सीटों में से 77 पर महिला आरक्षण होने के बावजूद महिलाएं अपने खाते में 85 सीटें डालने में सफल रही हैं। परिणामों को देखें तो कहना गलत नहीं होगा कि पचास प्रतिशत आरक्षण की अनिवार्यता के साथ लोगों ने जनप्रतिनिधि के रूप में महिलाओं को अधिक पसन्द किया है। ऐसे में पंचायतीराज की आधी से अधिक कमान महिलाओं के हाथ है। चूंकि नारी जाति सृजनात्मकता और रचनाधर्म से पूरित होती हैं ऐसे में पंचायतीराज के तहत जिले में विकास कायोZ को गति मिलेगी। जनादेश के माध्यम से जालोर जिले की जनता ने यही अपेक्षा की है।

कम थीं पर भारी पड़ी
जालोर की आठों पंचायत समितियों में सीटों की संया विषम होने का फायदा पुरुषों को मिला। प्रत्येक पंचायत समिति में पुरुषों की सीट महिला से एक अधिक रही। आठ सीटें अधिक होने के बावजूद चुनावों में जनता ने इस विषमता को नकारते हुए महिला जनप्रतिनिधियों पर विश्वास किया और उनकी झोली में दस प्रतिशत सीटें अधिक डालीं।

पुरुषों से जीतीं महिलाएं
जिला परिषद में दो और पंचायत समिति के चुनाव में छह महिलाओं ने बिना महिला आरक्षण वाली सीटों पर पुरुष प्रत्याशियों को हराया। जिला परिषद के चुनाव में सामान्य सीट से चुनाव लड़ते हुए वार्ड 15 से कांग्रेस की सरोज ने भाजपा के गंगासिंह को 1835 वोटों से हराया। वहीं वार्ड 22 से कांग्रेस की जसवन्त कंवर ने भाजपा के आसूराम को 2628 वोटों से शिकस्त दी।
दूसरी ओर जालोर पंचायत समिति के वार्ड 17 पर एससी की सीट पर भाजपा की सीमा ने कांग्रेस के विमल कुमार को 545 वोटों से हराया। आहोर पंचायत समिति के वार्ड 22 से कांग्रेस की मंजूश्री ने निर्दलीय झापुराराम को 19 वोटों से हराया। इसी तरह रानीवाड़ा पंचायत समिति के वार्ड 4 से कांग्रेस की राधा देवी ने भाजपा के अर्जुनसिंह को 371 वोटों से और वार्ड 5 से कांग्रेस की दीवाली देवी ने भाजपा के वनेसिंह को 410 वोटों से हराया। सांचौर पंचायत समिति में कांग्रेस की प्यारी देवी ने निर्दलीय पूराराम को 48 वोटों से हराया। चितलवाना पंचायत समिति के वार्ड 15 में कांग्रेस की सोनी ने भाजपा के रामचन्द्र को 1770 वोटों से शिकस्त दी।

आरक्षण के बिना जीतीं
जालोर पंचायत समिति के वार्ड 14 से कांग्रेस की सूरज कंवर ने सामान्य सीट से निर्दलीय रतन कंवर को 76 वोटों से हराया। आहोर पंचायत समिति के वार्ड 21 से राजुल कंवर ने कांग्रेस की कमला को 652वोटों से हराया।

तस्वीर समितियों की

पंचायत समिति                        महिला
 (सीटें)                                 आरक्षित | विजयी
_____________________________|_______
जालोर(17)                                 8         10
___________________________________
आहोर (23)                               11        13
____________________________________
सायला (25)                              12        12
____________________________________
भीनमाल (23)                            11       11
____________________________________
जसवन्तपुरा (17)                        8         8
____________________________________
रानीवाड़ा (19)                             9        11
____________________________________
सांचौर (21)                                10       11
____________________________________
चितलवाना (17)                          8         9
-------------------------------------------------
कुल (162)                                 77         85

राजस्थान पत्रिका के जालोर अंक में १० फ़रवरी को प्रकाशित

Tuesday, February 9, 2010

चाहत...

 
सावन की सी बारिशों में नित भीगने की अब चाह कहाँ,
पुष्प खिले, धरा फले ओ भीगे कंठ इतना सा तो पानी हो

दुनिया जीतने का जज्बा, आसमां चीरने का भी जोश,
कहाँ जाता हैं जब नन्ही सी बेटी से हार खानी हो

ऑस्कर, बुकर और पुलित्ज़र जैसे तमगे किसे चाहिए,
जो सीधे दिल तक उतरे ऐसी मेरी कविता-कहानी हो

रचना यह किसकी? भले कहानी के पात्र हैं कौन?
कोई फरक नहीं पड़ता जब कहने वाली नानी हो

गीत ग़ज़ल छंदों का मौसम, चुका हुआ सा लगता हैं,
मन में ही रहें चाहतें, जब घर में बहन सयानी हो

जब बढ़े अँधेरा, घटे उजाला और चेतना की भी चाह,
कोई बधेतर आस नहीं, बस आँखों में ग्लानी हो

मंदिर बने या मस्जिद? यहाँ इस पचड़े में कौन पड़े,
एक पागल सा खुसरो चाहूं, इक मीरां दीवानी हो

मेरी माँ सी अनिंद्य सुन्दरी इस दुनियां में दूजी कौन,
धरी रहे उपमाएं सारी, जब 'प्रदीप' ने ये ठानी हो

Tuesday, February 2, 2010

अभिलाषा नहीं पुष्प होने की


अभिलाषा नहीं रही पुष्प होने की
चाह होती हैं बस घुटकर रोने की

क्यों चढ़ाया ही जाऊं उस शीश पर
जो सलामी में झुका खोटे सोने की

क्यों जाऊं उन केशों में वेणी बनकर
जहाँ बदबू सी हैं परफ्यूम होने की

उस शहादत के पथ की भी चाह नहीं
कोशिश हैं जहाँ स्याही से लहू धोने की

कुम्हलाता हूँ सफेदपोशों के गले में घुट-घुट
राजनीती हैं देश में बस जादू - टोने की

उजाले की चाह ओ चेतन स्वर कहाँ
सब कोशिश में हैं अँधेरा बोने की

आरज़ू हैं माँ के चरणों में लिपटकर रोऊँ
जुस्तजू हैं 'प्रदीप' वजूद खोने की 

Friday, October 16, 2009

भूख के घर दीवाली नहीं मनती है


सीधी रस्सी पर चलती हुई
चलते चाकू से टलती हुई
नन्हे बदन सहित छोटे से
चक्कर में से निकलती हुई
उस बच्ची पर नजर टिकी
लगी नहीं हुई फिसलती हुई


बैठे पिता के आदेश पर
खड़ी मां के आवेश पर
उसके चंचल पैर बड़े सधे से
रस्सी पर चल रहे थे
जैसे दो नन्हे सितारे
आकाशगंगा पर टहल रहे थे


अचानक
हड़बड़ा गई
पिता की कठोर आवाज
कड़कड़ा गई
रस्सी पर लड़खड़ा गई
कहां मरी जा रही है
ढंग से चल नहीं तो
एक तमाचा पड़ेगा


(फिर खुद सोचा)
पूरी रस्सी पार नहीं तो
भूखे ही सोना पड़ेगा
वह फिर सीधी चलने लगी
लड़खड़ाई टांगे संभलने लगी
जैसे तैसे पूरी रस्सी हो गई पार
दर्शक वर्ग से तालियों की बौछार


आज का खेल हुआ खतम
जो टुकड़ों में आया वह
पैसा हुआ हजम।
रात को सोते वक्त नन्हे
भाई ने पूछ ही लिया
दीदी तुम आज लड़खड़ा क्यों गई थी
रस्सी पर एक बार हड़बड़ा क्यों गई थी
तुम तो मां से भी सधे कदमों से चलती हो
गिरने की स्थिति में भी संभलती हो
बापू भी कहते हैं यह है जब तक
रोटी का जुगाड़ होता रहेगा तब तक


बोली आज मेरी चाल गड़बड़ा गई थी
पहली बार मैं हड़बड़ा गई थी क्योंकि
मैंने आज रस्सी पर से ही देखा था
कुछ नन्हे बच्चों को अपनी मांओं के साथ
जो लाए थे दीवाली के ढेर से पटाखे
बैग लटकाए कुछ बच्चे जा रहे थे स्कूल
इसलिए एकबारगी मैं खेल को गई भूल
मेरी चाल लड़खड़ा गई
और पहली बार मैं हड़बड़ा गई


आज का खेल कहीं खराब होता
तो मां मुझे खूब मारती, मैं रोती
रोटी ना मिलने की याद ने संभाला
वरना मैं तो गिर गई होती।


अब भाई बोला
तुम इतने पैसे बापू को कमाकर देती हो
उसके बदले में अपने लिए दीवाली पर
कुछ पटाखे क्यों नहीं लेती हो।


वह बोली मुन्नु हम दीवाली नहीं मनाते
छोटा बोला हम क्यों नहीं मनाते हैं
जो हिन्दु नहीं है वे भी मनाते हैं
फिर हम भी तो हिन्दुओं में आते हैं


वह बोली हमारा धर्म क्या है जानेगा
हम हिन्दु मुस्लिम सिख इसाई कुछ नहीं
भूख से लड़ने का स्वर्धम निभाते हैं
शायद इसीलिए दीवाली नहीं मनाते हैं


रोशन दीवाली अंधियारे से लड़ती है
पर हम तो रोज दिवाले से लड़ते हैं
पैसा नहीं हो तो दीवाली नहीं होती
मेरे भाई हम भूख में रोज पेट ऐंठते हैं
जिन घरों में दिवाला विराजित हो
वहां दीवाली के देव कहां बैठते हैं?


जमाने में भूख और उजाले की कब बनती है
इसीलिए भूख के घर दीवाली नहीं मनती है

Monday, June 22, 2009

एक चुटकी रेत

सिर्फ़ एक चुटकी रेत
उस घर के कच्चे आंगन
याद दिलाती है एक चुटकी रेत
जब लिफाफे वाले पत्र को खोलने से
उसके मुहाने पर चिपके गोंद
हवा से उड़कर लगे
चुटकीभर से कम मिट्टी के बारीक कणों में
मन खुशबू की टोह लेता है।
उस चुटकीभर खुशबू से पूरे मन को
सुगन्धित करने का भाव खोज लेता है।
या फिर चुटकीभर रेत का वह भाव
जो राजस्थान की किसी सुदूर ढाणी में
किसी रमणी के मन में होता है।
जिससे वे हाथ अंतिम बार तब अनायास ही छुए थे
जब चुटकीभर सिंदूर से जीवन में पहली बार
उसके बालों के बीच वाली किनारी को
सिंदूर से रंगा था।
चुटकीभर उस लाल रंग की अतुलनीय खुशी
भुला देती है सीमा पर डटे पति का बिछोह।
वह वेदना तब चुटकीभर आंसू ढुळकाती है
जब वहां से आए किसी अन्तर्देशीय
खत के बीच वाले मोड़ में
चुटकीभर से भी कम रेत होती है

जो शायद पत्र को पूरा करते समय उसमें अटक जाती है
दो देशों को बांटने वाली तारबंदी के पास वाली
उस चुटकीभर रेत में उसे

अपने मिलन का संसार नजर आता है।

Thursday, May 21, 2009

वीरमदेव चौकी से


मैं वीरमदेव चौकी। वीर वीरमदेव द्वारा राज्य पर नज़र रखने के उद्देश्य से बनवाई गई, लेकिन उसके बाद सदा उपेक्षित रही। मैं क्या सारा दुर्ग ही तो उपेक्षित है। दुर्ग को सुधारने की बात आती है तो कई अधिकारी और राजनीति उस सूरमा के बलिदान दिवस पर यहां आते हैं, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि केवल दुर्ग को जानने और सहेजने के लिहाज से कोई आए तो कुछ कहने का मन हो गया। स्वर्णगिरी राजस्थान के श्रेष्ठ गिरी दुर्गों से एक है ऐसा दुर्ग में प्रवेश करते ही लिखा है, लेकिन पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित दुर्ग सुरक्षित नहीं है।
दुर्ग की टूटती दीवारें, असामाजिक तत्वों द्वारा नुकसान पहुंचाई जा रही संपदा और राजनैतिक-प्रशासनिक उदासीनता का शिकार स्वर्णगिरी अपने अस्तित्व के लिए न्याय मांगता है।जालोर दुर्ग में प्रवेश करते समय पुरातत्व विभाग की ओर से लिखवाए गए सूचना के मुताबिक हालांकि दुर्ग पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित तो है, लेकिन देखा जाए तो इसे सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। एक ओर कभी दुर्ग तक अपना नाम लाने के लिए खिलजी को महीनों घेरा डालना पड़ा वहीं दूसरी ओर आज किले की दीवारों कई मनचलों ने कोयलों से ही नाम लिख दिए हैं। उपेक्षित धरोहरों में किले पर स्थित शिव मंदिर भी है।
इतिहास के मुताबिक यहां का शिवलिंग सोमनाथ का एक हिस्सा है, लेकिन उसके साथ भी प्रशासन और राजनीति ने कभी न्याय करने की कोशिशभर नहीं की। वहीं जौहर स्थल, झालरा बावड़ी, दहिया की पोल, कीर्ति स्तंभ और जैन मंदिर ऐसे स्थान है, जिन्हें देखकर पर्यटक ठिठककर रह जाए, लेकिन उन्हें यह बताए कौन? इन सबको देखकर क्या नहीं लगता कि अपने अंदर इतिहास के इन क्षत-विक्षत भग्नावशेषों को स्वर्णगिरी दुर्ग में ही उसकी उपेक्षित और मसोसी हुई धड़कनें सिमटी हुई नजर आती हैं। इतिहास का ज़र्रा-ज़र्रा, इस माटी का कण-कण और समय पट्ट का धागा-धागा यह कहता है कि इस दुर्ग के पत्थर कभी बोलते थे।


यहां आने वाले हर राहगीर से पत्थर आह्वान करते नजर आते हैं कि यदि मनुष्य की भावनाओं के जौहरी हो तो आकर पहचानो कि उसके पत्थर बड़े कि कारीगर। मेरा आह्वान इतना है कि हर बार राजनैतिक कथन होते हैं और इस बार प्रशासनिक प्रयास की उम्मीद है इसमें जालोर का प्रत्येक नागरिक अपना योगदान दें। बहुत कुछ कहना चाहा है, लेकिन फिर भी कुछ रह गया। शायद ये पंक्तियां पूरा कर देंगी।
सुनने की मोहलत मिले तो आवाज है पत्थरों में
कहीं उजड़ी हुईं बस्तियों से आबादियां बोलती हैं
- प्रदीपसिंह बीदावत
१५ जनवरी २००८ को लिखा

Friday, April 3, 2009

एक पाती वीरम चौकी से

कहने को तो मैं एक सूरमा द्वारा कुछ प
त्थरों से बनवाई गई वह चौकी हूं, जहां से वह अपने राज्य पर नजर रखता था। यहीं से उसे आने वाले खतरे की खबर होती थी। कहा जाए तो मैं उसकी खबरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थान थी। पता नहीं क्यों आज काल की निर्दय शमां पर चढ़े उस मासूम परवाने के बलिदान दिवस के मौके एक खतरे की खबर तुम्हें देने का मन हो आया। मेरा तो आगाह करने का कर्तव्य ठहरा। इसलिए ये कुछ शब्द तुम तक पहुंच जाएं तो मैं तुम्हें खतरे से आगाह करने के अपने कर्तव्य की इतिश्री मानूंगी।समय की बेदर्द आंख का दर्दीला आंसू वह वीरम अपनी भावनाओं से परम्परा और कुल लज्जा को बड़ा मानता था। उसने भावना को सदैव कर्तव्य की दासी बनाकर रखा। विधर्मी के साथ विवाह अस्वीकार करने से मर्यादा उसे दुरगादास, महाराणा प्रताप और राव चन्द्रसेन जैसे वीरों की श्रेणी में रखती है, लेकिन खबर तो लीजिए कि आज जालोर क्या कर रहा है। उसके मुहाने कौनसे खतरे ने अपने पैर पसारे हैं। मर्यादित आचरण और कुल लज्जा को आज का जालोर क्या उतना ही महžव देता है, जितना उसके समय देता था। शायद नहीं, तभी तो यहां आए दिन लज्जाभंग के मामले बढ़ रहे हैं। मुझे याद है जब वह दिसावर (दिल्ली में खिलजी के दरबार) गया था तो बहुत सा नाम और इज्जत कमाकर लौटा था। अब आज का जालोर दिसावर से धन के साथ कौनसी बीमारी कमा ला रहा है। इस बीमारी को अपनाने के कारणों पर बिना किसी का नाम लिए नजर डालें तो सबसे ज्यादा कारण कुल पर आघात लगाकर ही लाई जा रही है। यह बीमारी घेर लेगी तो इज्जत तो अपने-आप चली जाएगी। बाकी बची जान। जिसका भी कोई ठिकाना नहीं कब सांसों की डोर टूट जाए। चार सौ का कुल घोषित आंकड़ा है जिले में, जिनके आगे मौत नाच रही है। अघोषित का पता नहीं। कहते हैं इसका उपचार नहीं है। इसका इलाज तो वीरम बहुत पहले बता गया। जो आज तक समझ में नहीं आया। सरकार व नेताओं की तोता रटन्त भाषाओं को छोड़कर कोई वीरम की भाषा में क्यों नहीं कहता कि मर्यादित आचरण के बिना इसके बढ़ते कदमों को थामना मुमकिन नहीं। संभल लो अन्यथा आने वाली पीढ़ियां कभी क्षमा नहीं करेगी। मेरा कर्तव्य तो खबर करने तक का था। उस वीर पुरुष के बलिदान दिवस पर इतना जरूर याद रखना कि वह मर्यादा पर बलिदान हुआ था, तब लोग उसको याद कर रहे हैं। हमारा बलिदान यदि यह बीमारी लेगी तो आने वाली पीढ़ियां आपके नाम पर किस क्वालिटी का चूना लगाएगी आप सोच लीजिए।हां एक बात ओर मुझ पर मूर्ति लगवाने का वायदा करते नेताओं को भी चार साल बीतने को आए। एक वादा आज भी हुआ। ये वादे कब पूरे हो न तो मुझे पता और शायद उन्हें। बदलते वक्त के दौर में सारे वादे समय पर पूरे हो जाए संभव नहीं लगता। उस वीर पुरुष की मूर्ति मुझ पर लगती तो मैं तो गौरवान्वित होउंगी ही, जालोर का गौरव भी निश्चित बढ़ेगा।
लेकिन सोचकर डर यह लगता है-

मिलता नहीं प्यार अदब, सलीका कहीं,
दिल सभी के यहां मतलबों के दुकां है।
ऐतबार करना मगर जरा संभल के
कब वादों से मुकर जाए ये जुबां हैं।।

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