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Tuesday, August 10, 2010

निराशा



(1)



खिलना चाहता था कहीं सुदूर व्योम में,



बनना चाहता था समिधा किसी होम में।



धूप में भी तो कभी नहीं वो हंस पाया


हवा ओ अंधेरे ने जो 'प्रदीप' बुझाया।।





(2)



थरथराता धुआं



जब मां मेरी बेरोजगारी पर आंसू बहाया करती है,



चुपके से अपनी ही ओढ़नी में आंखें छुपाकर।।



तब इक तीली की तरह ही जलती है उम्मीदें



तन्हा रह जाता है 'प्रदीप' जैसे थरथराता धुआं।।















(3)



बिन 'आका' वाली तेरी लेखनी













आंधी के दीए जितनी ही उम्मीद बचती है,



बिन 'आका' वाली तेरी लेखनी के लिए।



शायद स्याही ने भी छोड़ दिया है 'प्रदीप'



कागज़ों पर उजली सच्चाई बयां करना।।

Wednesday, December 9, 2009

मैं आंसू



मैं आंसू
हृदय की अंतरतम् विवशता का सत्कार
विरह-वेदना का सशक्त हस्ताक्षर

साक्षात पीड़ा का अनुभाविक प्रतिनिधि
दु:ख और दर्द का मौन साक्षात्कार

भावाभिव्यक्ति का मूक माध्यम तो कभी
अनिवर्चनीय खुशी का खामोश प्रतिबिम्ब

कभी कलेजे तो कभी आंखों से
चुपचाप बहता हूं
कभी निश्चल तो
कभी चंचल होकर
गहरी बात कहता हूं

दुनिया में बहुत हैं
इसे पीने वाले
कम नहीं
इसके साथ जीने वाले भी

हां कई ऐसे भी है
जो मुझे मार डालते हैं
अपनी आंखों में ही घोटकर

बनावटभरी इस दुनिया में
बनावट ओ साज सिंगार किया है
हंसी और खुशी दोनों ने।

मैं आज भी नहीं बदला
न ही बदला
मेरा रूप, रंग, स्वाद और अर्थ
मैं रंगहीन रहा,
लेकिन अर्थहीन नहीं।

करता हूं उनकी मदद
जब वो खामोश
और निशब्द होते हैं

जिनकी आत्मा के शब्द
ज़बां का साथ नहीं देते

मैं चुपचाप केवल तब
केवल और तभी बहता हूं
जब बहरे और स्वार्थी कानों से
कहना चाहता हूं बहुत कुछ
मौन होकर।

या उस समय जब
जब नहीं होते
किसी के पास शब्द
अपनी पीड़ा, विरह, वेदना,
दर्द, हंसी, खुशी और भावों
को कहने के।

तब मौन होकर धीरे-धीरे
आंखों से गालों पर दिखता हूं
विवश और मूक ज़बां की भाषा
खारे पानी से लिखता हूं।

Friday, March 13, 2009

विवेकानंद वसुन्धरा के, गांधी यूपीए के और सुभाष किससे?


सबसे पहले उन लोगों को बधाई, जिन्होंने सुभाष, गांधी और विवेकानंद जैसे महापुरुषों के चेहरों पर सफेदी पोत दी। वाकया एक जगह का नहीं राजस्थान भर के उन स्कूलों और दफ्तरों का है, जिन्होंने चुनावी आचार संहिता की अंध पालना में कई महापुरुषों समेत देवी देवताओं की तस्वीरों पर या तो सफेदी पोत दी या उन पर अखबार चिपका दिया। अब आप पूछेंगे कि कारण क्या रहा? अजी कारण तो छोडि़ए डर गए थे बिचारे। आप कहेंगे डर किस बात का? तो जनाब इन लोगों को कहा गया था कि सरकार का विज्ञापन करने वाले किसी भी पोस्टर या फोटो को नहीं छोड़ना है।
दफ्तरों के बाबू और स्कूलों के मास्टरजी लगे आदेश की पालना में और सारी तस्वीरों को या तो उतारकर उल्टी धर दी या सफेदी पोत दी अथवा अखबार चिपका दिया। एक स्कूल की दीवार पर स्वामी विवेकानंद का बड़ा चित्र उकेरा हुआ था। उस पर मास्टरजी ने अखबार चिपका दिया। अब एक बच्चे ने पूछ लिया सर अखबार किस लिए। मास्टरजी का कहना था कि अखबार तो अखबारवालों से डरकर चिपकाया है। यदि यह नहीं चिपका तो मेरी `सीआर´ पर `17 सीसी´ चिपक जाएगी। बच्चा बोला सर रात को अखबार वाले आ गए और इस अखबार को हटाकर फोटो खींच ले गए तो?
मास्टरजी को बच्चे की बात तर्कसंगत लगी। फिर क्या था। एक ईंट मंगवाई और लग गए विवेकानंद के चेहरे पर घिसने। यकीन मानिए घरवाली के कहने पर उन्होंने कभी तुरंत लोटा भी नहीं भरा होगा, लेकिन उस दिन पन्द्रह मिनट में स्वामीजी के चित्र की ऐसी कम तैसी कर दी। दूसरे बच्चे तो समझ ही नहीं पा रहे थे। आदर्श माने जाने वाले विवेकानंद आज मास्टरजी के लिए विलेन कैसे बन गए। मास्टरजी को डर था कि स्कूल में लगा विवेकानंद का फोटो चुनावी पर्यवेक्षक भाजपाइयों का प्रचार न मान लें। इसी तरह कई मास्टरों को गांधी की तस्वीर द्वारा कांग्रेस का प्रचार करने का डर सताया। कइयों को तो सुभाष से भी डर लगा उनकी भी हटा दी। हालांकि कांग्रेसियों ने अपने इतिहास में से ही सुभाष को मिटा दिया, जबकि कोई समय वे उसके अध्यक्ष रहे थे। अब कांग्रेस के इतिहास में ही सुभाष का नाम नहीं। केन्द्र सरकार ने कहा कि देश की आजादी में सुभाष का कोई योगदान नहीं। तो फिर फोटो स्कूल में क्या काम की? कई जगह हटा दी गई, कई जगह पोत दी गई और कई जगह रगड़ दी गई।
सरकारी आदेशों की अंध पालना में मास्टरों द्वारा दी जा रही यह रगड़मपट्टी की प्रेरणा राज ठाकरे पैदा नहीं करेगी तो क्या करेगी? जब देश के लिए कुरबानी देने वालों की रगड़मपट्टी हो जाती है तो अपना तो क्या है। ऐसे में गांधी की रामराज्य की कल्पना का क्या होगा?
खैर छोडि़ए जी! केवल भावुकता से देश नहीं चलता। जब बिना दिल के दिल्लीवालों का कहना है कि देश में राम का अस्तित्व नहीं था। तो रामराज्य की कैसी कल्पना । गठबंधन की आड़ में ठगबंधन का राज चल रहा है। कहीं राणी रियाण पर ताण दिखा रही है तो कहीं जादूगर टमाटर पर कमाकर खा रहा है और हां कन्टीन्यू यही चलता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं जब इन महापुरुषों के चेहरों पर सफेदी की जगह कालिख पोत दी जाएगी।

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