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Monday, April 18, 2016

भगवान बूढ़े भी हैं और बच्चे भी...


एक 6 साल का छोटा सा बच्चा अक्सर भगवान से मिलने की जिद किया करता था। उसे भगवान् के बारे में कुछ भी पता नही था पर मिलने की तमन्ना, भरपूर थी।उसकी चाहत थी की एक समय की रोटी वो भगवान के सांथ खाये।
1 दिन उसने 1 थैले में 5 ,6 रोटियां रखीं और परमात्मा को को ढूंढने निकल पड़ा।
चलते चलते वो बहुत दूर निकल आया संध्या का समय हो गया।
उसने देखा नदी के तट पर 1 बुजुर्ग माता बैठी हुई हैं,जिनकी आँखों में बहुत गजब की चमक थी, प्यार था,और ऐसा लग रहा था जैसे उसी के इन्तजार में वहां बैठी उसका रास्ता देख रहीं हों।
वो 6 साल का मासूम बालक बुजुर्ग माता के पास जा कर बैठ गया, अपने थैले में से रोटी निकाली और खाने लग गया।
फिर उसे कुछ याद आया तो उसने अपना रोटी वाला हाँथ बूढी माता की ओर बढ़ाया और मुस्कुरा के देखने लगा, बूढी माता ने रोटी ले ली , माता के झुर्रियों वाले चेहरे पे अजीब सी ख़ुशी आ गई आँखों में ख़ुशी के आंसू भी थे,,,,
बच्चा माता को देखे जा रहा था , जब माता ने रोटी खा ली बच्चे ने 1 और रोटी माता को दी।
माता अब बहुत खुश थी। बच्चा भी बहुत खुश था। दोनों ने आपस में बहुत प्यार और स्नेह केे पल बिताये।
,,,,
जब रात घिरने लगी तो बच्चा इजाजत ले घर की ओर चलने लगा
वो बार बार पीछे मुड  कर देखता ! तो पाता बुजुर्ग माता उसी की ओर देख रही होती।

बच्चा घर पहुंचा तो माँ ने अपने बेटे को आया देख जोर से गले से लगा लिया और चूमने लगी,
बच्चा बहूत खुश था। माँ ने अपने बच्चे को इतना खुश पहली बार देखा तो ख़ुशी का कारण पूछा,
तो बच्चे ने बताया!

माँ,....आज मैंने भगवान के सांथ बैठ क्ऱ रोटी खाई, आपको पता है उन्होंने भी मेरी रोटी खाई,,,माँ भगवान् बहुत बूढ़े हो गये हैं,,,मैं आज बहुत खुश हूँ माँ

उस तरफ बुजुर्ग माता भी जब अपने घर पहूँची तो गाव वालों ने देखा माता जी बहुत खुश हैं,तो किसी ने उनके इतने खुश होने का कारण पूछा????
माता जी बोलीं,,,,मैं 2 दिन से नदी के तट पर अकेली भूखी बैठी थी,,मुझे पता था भगवान आएंगे और मुझे खाना खिलाएंगे।
आज भगवान् आए थे, उन्होंने मेरे सांथ बैठ के रोटी खाई मुझे भी बहुत प्यार से खिलाई,बहुत प्यार से मेरी और देखते थे, जाते समय मुझे गले भी लगाया,,भगवान बहुत ही मासूम हैं बच्चे की तरह दिखते हैं।

इस कहानी का अर्थ बहुत गहराई वाला है।
असल में बात सिर्फ इतनी है की दोनों के दिलों में ईश्वर के लिए प्यार बहुत सच्चा है ।

और ईश्वर ने दोनों को ,दोनों के लिये, दोनों में हीI( ईश्वर)खुद को भेज दिया।

जब मन ईश्वर भक्ति में रम जाता है तो
हमे हर एक में वो ही नजर आता है।

ईश्वर सदा हमारे करीब है बहुत ज्यादा करीब है,हमारे आस पास वो ही वो रहता है।
जब हम उसके दर्शन को सही मायनो में तरसते है तो हमे हर जगह वो ही वो दिखता है,हर एक में वो ही दिखता है ...
चाहे वो हमारा दुश्मन ही क्यूँ न हो|

Sunday, April 17, 2016

हठीलो राजपूत यौद्धा : जोरजी चंपावत


जोरजी चंपावत कसारी गांव के थे,जो जायल से 10 किमी खाटू सान्जू रोड़ पर है। जहां जौरजी की छतरी भी है।
एक दिन की बात है जोधपुर के महाराजा नें विदेश से एक बन्दूक मंगाई और दरबार मे उसका बढ चढ कर वर्णन कर रहे थे। संयोग से जोरजी भी दरबार मे मौजूद थे।दरबार ने जोरजी से कहा-' देखो जोरजी, ये बन्दूक हाथी को मार सकती है।जोरजी ने कहा-'इसमे कौनसी बड़ी बात है हाथी तो घास खाता है।'
दरबार ने फिर कहा- ' ये शेर को मार सकती है।जोरजी ने कहा-' शेर तो जानवर को खाता है।' इस बात को लेकर जोरजी और जोधपुर दरबार मे कहा सुनी हो गयी।तब जोरजी ने कहा-' मेरे पास अगर मेरे मनपसंद का घोड़ा और हथियार हो तो मुझे कोई नही पकड सकता चाहे पूरा मारवाड़ पीछे हो जाय।
तभी जोधपुर दरबार ने कहा-' आपको जो अच्छा लगे वो घोड़ा ले लो और ये बन्दुक ले लो।' तभी जोरजी ने वहां से अपने मनपसंद का एक घोड़ा लिया और एक बन्दुक ले कर निकल गये और मारवाड़ मे जगह जगह डाका डालते रहे।इस प्रकार उन्होने जोधपुर दरबार के नाक मे दम कर दिया। दरबार ने आस- पास की रियासतो से भी मदद ली पर जोरजी को कोई पकड़ नही पाये।तब ये दोहा प्रचलित हुआ-
"चम्पा थारी चाल औरा न आवे नी,
बावन रजवाडा लार तू हाथ ना आवेनी।"
फिर दरबार ने जोरजी पर इनाम रखा की जो उनको पकड़ के लायेगा उन्हे इनाम दिया जायेगा । इनाम के लालच मे आकर जोरजी के मौसी के बेटे भाई खेरवा ठाकर ने धोखे से जोरजी को खेरवा बुलाकर जोरजी को मार डाला। जोरजी ने मरते मरते ही खेरवा ठाकर को मार गिराया । जब जोधपुर दरबार को जोरजी की मौत के बारे मे पता चला तो बहुत तब वे बहुत दुखी हुए और बोले ऐसे शेर को तो जिन्दा पकड़ना था। ऐसे शेर देखने को कहा मिलते है। जोरजी बन्दूक और कटारी हर समय साथ रखते थे।जब खेरवा मे रात को वे सो रहे थे तब उन्होने अपनी बन्दुक को खूंटी मे टांग दिया और कटारी को तकिये के नीचे रखथ दिया।जब जोरजी को निन्द आ गयी तो खेरवा ठाकर ने बन्दुक को वहां से हटवा दी और जोरजी के घोड़े को गढ़ से बाहर निकाल कर दरवाजा बन्द कर दिया तो घोड़ा जोर जोर से हिनहिनाने लगा।घोड़े की हिनहिनाहट सुनकर जोरजी को कुछ अनहोनी की आशंका हुई वो उठे और बन्दुक की तरफ लपके पर वहां बन्दुक नही थी। तभी जोरजी को पूरी कहानी समझ मे आ गयी ओर कटारी लेकर चौक मे आ गये और मार काट शुरू कर दी। देखते ही देखते उन्होने उन सैनिको को मार गिराया। खेरवा ठाकर ढ्योढी मे बैठा था, उसने वहां से गोली मारी।जिससे जोरजी घायल शेर की तरह उछल कर नीचे गिर पडे मगर वे अपने साथ ठाकर को भी ढ्योढी से नीचे मार गिराया और जोरजी घायल अवस्था मे अपने खुन से पिण्ड बना कर पिण्डदान करते करते प्राण त्याग दिये ।
( उस समय जो राजपुत खुद अपने खुन से पिण्डदान करे तो उनको मोक्ष की प्राप्ति होती है ऐसी कुछ धारणा थी।)
राजस्थान के गाँवों मे जोरजी के लिये होली पर गाया जाने वाला वीर-रस पूर्ण गीत :-
लिली लैरया ने लिलाड़ी माथे हीरो पळके वो
के मोडो बतलायो ओ जोरजी सिंघनी को जायो रे
के मोड़ो बतलायो.....
मेहला से उतरता जोरजी लोड़ालाडी बरजे वो
ढोड्या से निकलता जोरजी थाने मांजी बरजे वो के मत खैरवे ओ खैरवो भाया को बैरी रे..
के मत जा खैरवे....
पागडी़ये पग देता जोरजी डाई कोचर बोली वो
जिवनी झाड्.या मे थाने तितर बरजे वो
के मत जा खैरवे..
गॉव से निकलता जोरजी काळो खोदो मिलयो वो जिवनी झाड़्या मे थाने स्याळ बरजे वो
के मत जा खैरवे....
ओ खैरवो भाया को बैरी रे.........
जोरजी रा घुड़ला कांकड़ - कांकड़ खड़िया वो
जोरजी रो झुन्झरियो भरीयोड़ो हाले वो
के मत जा खैरवे..
जोरजी रा घुड़ला सुंवा बजारा खडि़या वो....
खाटू आळे खाण्डेय डूगंर खाली तोपा हाले वो
खैरवा ठाकर घोड़ा आडा दिना वो
खाटू रा सिरदारा थाने धान किकर भावे वो
जोरजी रो मोरियो जोधाणे हाले वो
के मत जा खैरवे...
भरियोड़ी बोतलड़ी ठाकर जाजम माते ढुळगी वो राम धर्म न देय न दरवाजा जड़िया वो
के मोड़ो बतलायो ओ जोरजी सिंघनी रो जायो रे के मोड़ो बतलायो.....
ढाल न तलवार ठाकर महल माते रेगी रे
के भरियोड़ी बन्दुक बैरन धोखो देगी रे
के मत जा खैरवे....
जोरजी चाम्पावत थारे महल माथे मेड़ी वो
अर मेड़ी माते मोर बोले मौत नेड़ी वो
के मत जा खैरवे ओ खैरवो भाया को बैरी वो
के मत जा खैरवे.......

Friday, November 12, 2010

सैल्यूट नन्हे मास्टर


कल रात एक बालक ने बड़ा प्रभावित किया। यही तीन-चार वर्ष का रहा होगा। पिता बड़े ओहदेदार, माताजी सलीकेदार। माता-पिता की नजरों में यह उसकी उद्दण्डता अथवा जिद कही जा सकती है, लेकिन किनारे खड़े स्वतंत्र समीक्षक की भांति यही कहना चाहूंगा कि बच्चे के भाव उसकी आत्मा के भाव थे। उसका प्रभावित करना उसकी बाल सुलभ चपलता थी।

उस पर आज्ञाएं थोपी नहीं जानी चाहए, भले ही वे किसी के पैर छूने की क्यों न हों। यहां न तो उनके माता-पिता का परिचय दूंगा और न ही बच्चे का। यह स्थिति लगभग सभी के साथ आती हैं। माता-पिता कहीं भी जाते हैं तथाकथित बड़े और मीडिया से बनाए हुए आदर्शों का चोला पहने लोग मिलते हैं, खुद प्रणाम करते हैं। मजबूर हैं। मीडिया से जुड़े होने के कारण हम जैसे कई मजबूर हैं उन्हें हीरो बनाने के लिए। उनके महिमामंडन के लिए। पता नहीं क्यों? मन तो नहीं करता, लेकिन बुभुक्षुम् किम् करोति न पापम्। विश्वामित्र याद आ जाते हैं जब द्वापर में भूख लगने पर कुत्ते का मांस खाया था।

लेकिन बच्चे की गर्दन पकडक़र झुकाना ठीक नहीं।


पर यह बच्चा नहीं झुका। पिताजी ने अच्छे बच्चे होने का हवाला दिया। माताजी ने पढऩे वाला राजा बेटा होने की बात भी कही, लेकिन बच्चा पैर छूने की बजाए हाथ मिलाकर आया। यह बात प्रभावित कर गई कि हिन्दुस्तान का भविष्य अब करवट बदल रहा है। चैतन्यता का उज्ज्वल प्रवाह नई पीढ़ी की धमनियों में आने लगा है। भले यह पीढिय़ों से अर्जित किया हुआ धन है अथवा वर्तमान समय की जरूरत। बच्चे का स्वाभिमान उसने जीवित रखा।

उसे यदि हम किसी को प्रणाम करने के लिए कहते हैं तो वह प्रणाम क्यों करे? जिस व्यक्ति को वह चरण स्पर्श कर रहा है वह दुनिया में उससे पहले आ गया यह कोई कारण नहीं है। उसका व्यक्तित्व किसी का आदर्श होने लायक है।


बड़े दार्शनिक रजनीश ने इसे ढंग से व्याख्यित किया है : आपके घर में छोटा बच्चा है, घर में कोई मेहमान आते हैं, आप उससे कहते हैं, चलो पैर पड़ो। और वह बिलकुल नहीं पड़ना चाह रहा है। लेकिन आपकी आज्ञा उसे माननी पड़ेगी।


मैं किसी के घर में जाता हूँ, माँ-बाप पैर पड़ते हैं, और अपने छोटे-छोटे बच्चों को गर्दन पकड़कर झुका देते हैं! वे बच्चे अकड़ रहे हैं, वे इन्कार कर रहे हैं। उनका कोई संबंध नहीं है, उनका कोई लेना-देना नहीं है, और बाप उनको दबा रहा है!


यह बच्चा थोड़ी देर में सीख जाएगा कि इसी में कुशलता है कि पैर छू लो। इसका पैर छूना व्यक्तित्व का हिस्सा हो जाएगा। फिर यह कहीं भी झुककर पैर छू लेगा, लेकिन इसमें कभी आत्मीयता न होगी। इसकी एक महत्वपूर्ण घटना जीवन से खो गई। अब यह किसी के भी पैर छू लेगा और वह कृत्रिम होगा, औपचारिक होगा। और वह जीवन का परम अनुभव, जो किसी के पैर छूने से उपलब्ध होता है, इसको नहीं उपलब्ध होगा।


अब इसका पैर छूना एक व्यवस्था का अंग है। यह समझ गया कि इसमें ज्यादा सुविधा है। यह अकड़ कर खड़े रहना ठीक नहीं। पिता झुकाता ही है, और पिता को नाराज करना उचित भी नहीं है, क्योंकि वह पच्चीस तरह से सताता है, और सता सकता है। तो इसमें ही ज्यादा सार है, बुद्धिमान बच्चा झुक जाएगा। समझ लेगा।



मगर यह झुकना यांत्रिक हो जाएगा। और खतरा यह है कि किसी दिन ऐसा व्यक्ति भी इसको मिल जाए, जिसके चरणों में सच में यह झुकना चाहता था तो भी यह झुकेगा, वह कृत्रिम होगा। क्योंकि वह सच इतने पीछे दब गया, और व्यक्तित्व इतना भारी हो गया है।

अधिक कुछ न कहते हुए तहेदिल से उस नन्हे बालक के उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं करता हूं।

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